Tuesday, December 14, 2010

वो लम्हें जो याद न हों......

वो पहली बार,
जब माँ ने गले से लगाया,
वो लम्हा जब पापा ने गोद में उठाया,
वो पहली मासूम सी हँसी,
वो पहली नींद की झपकी,
दादी की प्यार भरी पप्पी,
वो पहले लड़खड़ाते से कदम,
वो अनबुझ पहेली सा बचपन...
ढेर सारे खिलौने,
गुड्डों और गुड़ियों की दुनिया,
स्कूल में वो पहला दिन,
वो प्यारे पलछिन,
और भी ऐसा बहुत कुछ......
इस ज़िन्दगी की आपाधापी से,
इन वाहनों के शोर से,
कहीं दूर, कहीं एकांत में,
आओ बैठें, समेटे उन लम्हों को,
वो लम्हे जो बीत गए....
वो लम्हें जो याद न हों......

Wednesday, December 08, 2010

मेरा नया बसेरा ....

             कल कंप्यूटर के किसी महाज्ञानी ने मेरे पुराने ब्लॉग में सेंध लगाते हुए उसे मिटा दिया | काफी कोशिश करने के बावजूद भी मैं उसे दोबारा नहीं पा सका | पता नहीं किसी को यूँ बेवजह दूसरे की चीजें हैक करने में कितनी ख़ुशी मिलती है...
इस दुःख से उबरने में मेरे कई दोस्तों ने मेरी मदद की, जिसके लिए मैं उनका शुक्रगुजार हूँ | 
             आज फिर से एक नयी उर्जा के साथ अपना नया ब्लॉग आपके हवाले कर रहा हूँ | उम्मीद करता हूँ मेरे उस पुराने आशियाने की तरह ही मेरा ये नया बसेरा भी आपको पसंद आएगा |
             इस ब्लॉग पर रचनाओं का सिलसिला अगले सोमवार यानि १३ दिसंबर से शुरू हो जायेगा... आपसे बस यही गुजारिश है कि जल्द से जल्द मेरे इस नए बसेरे को अपनी उपस्थिति से हरा भरा कर दें....

Tuesday, December 07, 2010

पहचान कौन चित्र पहेली :- ७ के विजेता और एक कविता....

                  आपका ये चहेता ब्लॉग मित्र शेखर सुमन हाज़िर है पहचान कौन चित्र पहेली :- ७ के विजेताओं के साथ | बड़ा ही अफ़सोस है कि इस पहेली का सही उत्तर सिर्फ २ लोगों ने दिया|
                  इस पहेली के विजेता हैं प्रकाश गोविन्द जी.. ( १०० अंक )  

                और उपविजेता हैं वंदना महतो जी ( ९९ अंक )


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            आप सभी विजेताओं को हार्दिक बधाई और जिनके जवाब गलत रहे उन्हें अगली पहेली के लिए शुभकामनाएं |
                      चलते चलते आप सबको जयशंकर प्रसाद जी की ये कविता याद दिलाता चलूँ....
                                                         अरुण यह मधुमय देश हमारा ...

अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को
मिलता एक सहारा।
 

सरस तामरस गर्भ विभा पर
नाच रही तरुशिखा मनोहर।
छिटका जीवन हरियाली पर
मंगल कुंकुम सारा।।

लघु सुरधनु से पंख पसारे
शीतल मलय समीर सहारे।
उड़ते खग जिस ओर मुँह किए
समझ नीड़ निज प्यारा।।

बरसाती आँखों के बादल
बनते जहाँ भरे करुणा जल।
लहरें टकरातीं अनंत की
पाकर जहाँ किनारा।।

हेम कुंभ ले उषा सवेरे
भरती ढुलकाती सुख मेरे।
मदिर ऊँघते रहते जब
जग कर रजनी भर तारा।।


- जयशंकर प्रसाद
       

Monday, December 06, 2010

हिंदी साहित्य के एक महान कवि ...

                    आपका ये चहेता ब्लॉग मित्र शेखर सुमन हाज़िर है पहचान कौन चित्र पहेली :- ७ के उत्तर के साथ |  


                    महाकवि के रूप में सुविख्यात जयशंकर प्रसाद (१८९० -१९३७) हिंदी साहित्य में एक विशिष्ट स्थान रखते हैं। तितली, कंकाल और इरावती जैसे उपन्यास और आकाशदीप, मधुआ और पुरस्कार जैसी कहानियाँ उनके गद्य लेखन की अपूर्व ऊँचाइयाँ हैं। काव्य साहित्य में कामायनी बेजोड कृति है। कथा साहित्य के क्षेत्र में भी उनकी देन महत्त्वपूर्ण है। भावना-प्रधान कहानी लिखने वालों में वे अनुपम थे। आपके पाँच कहानी-संग्रह, तीन उपन्यास और लगभग बारह काव्य-ग्रन्थ हैं।
                    इनका जन्म ३० जनवरी १८९० को वाराणसी में हुआ । प्रारम्भिक शिक्षा आठवीं तक किंतु घर पर संस्कृत, अंग्रेज़ी,पालि, प्राकृत भाषाओं का अध्ययन किया। इसके बाद भारतीय इतिहास, संस्कृति, दर्शन, साहित्य और पुराण कथाओं का एकनिष्ठ स्वाध्याय  |     
                    छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक माने जाते हैं । एक महान लेखक के रूप में प्रख्यात रहे। विविध रचनाओं के माध्यम से मानवीय करूणा और भारतीय मनीषा के अनेकानेक गौरवपूर्ण पक्षों का उद्घाटन किया। इन्होने अपने ४८ वर्षो के छोटे से जीवन में कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास और आलोचनात्मक निबंध आदि विभिन्न विधाओं में रचनाएं की हैं।
१४ जनवरी १९३७ को वाराणसी में इनका निधन हो गया |
                     आप सभी ने इनकी लिखी कविता अरुण यह मधुमय देश हमारा जरूर पढ़ी होगी...

Friday, December 03, 2010

सुनहरी यादें :- ६

                  इस बार सुनहरी यादों में शामिल है ऋचा जी  की रचना ,जो भेजी है रश्मि प्रभा  जी ने | ये रचना उन्होंने २ नवम्बर २००९ को प्रकाशित की थी |
                  इस सप्ताह की हमारे सर्वश्रेष्ठ पाठिका हैं  रश्मि प्रभा जी  | उनकी भेजी और ऋचा जी की लिखी इस प्यारी सी रचना का शीर्षक है  |


                                                              एक टुकड़ा ज़िन्दगी 
 
            ये ज़िन्दगी भी कितनी "अन्प्रेडिकटेबल" होती है... है ना ? अगले ही पल किसके साथ क्या होने वाला है कुछ नहीं पता... सच कहें तो हमें लगता है |

            ज़िन्दगी का ये "अन्प्रेडिकटेबल" होना इसे और भी खूबसूरत बना देता है... ज़िन्दगी के प्रति एक आकर्षण, एक रोमांच बना रहता है... अगर हमें अपने आने वाले कल के बारे में पता हो तो उसकी चिंता में शायद हम अपने आज को भी ठीक से ना जी पायें...
वैसे भी आज ज़िन्दगी के लिये तमाम सुख सुविधाएं जुटाने की जद्दोजहद में हम अपनी ज़िन्दगी को जीना ही भूल गए हैं, जो हर गुज़रते पल के साथ कम होती जा रही है, हमसे दूर होती जा रही है...  पैसों से खरीदे हुए ये बनावटी साज-ओ-सामान हमें सिर्फ़ चंद पलों का आराम दे सकते हैं पर दिल का सुकून नहीं... इसलिए भाग-दौड़ भरी इस ज़िन्दगी से आइये अपने लिये कुछ लम्हें चुरा लें... कुछ सुकून के पल जी लें... उनके साथ जो हमारे अपने हैं... आज हम यहाँ है कल पता नहीं कहाँ हों... आज जो लोग हमारे साथ हैं कल शायद वो साथ हों ना हों और हों भी तो शायद इतनी घनिष्टता हो ना हो... क्या पता... इसीलिए आइये ज़िन्दगी का हर कतरा जी भर के जी लें...
ये ज़िन्दगी हमें बहुत कुछ देती है, रिश्ते-नाते, प्यार-दोस्ती, कुछ हँसी, कुछ आँसू, कुछ सुख और कुछ दुःख... कुल मिलाकर सही मायनों में हर किसी की ज़िन्दगी की यही जमा पूंजी है... ये सुख दुःख का ताना-बाना मिलकर ही हमारी ज़िन्दगी की चादर बुनते हैं, किसी एक के बिना दूसरे की एहमियत का शायद अंदाजा भी ना लग पाए...
अभी हाल ही में हुए जयपुर के हादसे ने हमें सोचने पे मजबूर कर दिया... सोचा कि इस हादसे ने ना जाने कितने लोगों कि ज़िन्दगी अस्त-व्यस्त कर दी, कितने लोगों को इस हादसे ने उनके अपनों से हमेशा हमेशा के लिये जुदा कर दिया और ना जाने कितने लोगों को ये हादसा कभी ना भर सकने वाले ज़ख्म दे गया... पर इस हादसे को बीते अभी चंद दिन ही हुए हैं... आग अभी पूरी तरह बुझी भी नहीं है और ये हादसा अखबारों और न्यूज़ चैनल्स कि सुर्खियों से गुज़रता हुआ अब सिर्फ़ एक छोटी ख़बर बन कर रह गया है... शायद यही ज़िन्दगी है... कभी ना रुकने वाली... वक़्त का हाथ थामे निरंतर आगे बढ़ती रहती है... जो ज़ख्म मिले वो समय के साथ भर जाते हैं और जो खुशियाँ मिलीं वो मीठी यादें बन कर हमेशा ज़हन में ज़िंदा रहती हैं...


ग़म की चिलकन, सुख का मरहम

उदासी के साहिल पे हँसी की इक लहर

कुछ उम्मीदें

कुछ नाकामियां

कुछ हादसे

कुछ हौसले

कभी ख़ुदा बनता इंसान

कभी खुद से परेशान

कभी बच्चों की हँसी में खिलखिलाती मासूमियत

कभी दादी-नानी के चेहरों की झुर्रियां

इन सब में है थोड़ी थोड़ी

इक टुकड़ा ज़िन्दगी

-- ऋचा
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