Thursday, July 29, 2010

प्यार......

प्यार को परिभाषित करना कितना कठिन होता है...अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए....वैसे भी परिभाषा का अर्थ ही है की स्थिति या बात को इस तरह गढ़ना कि दूसरों को उसका अर्थ आसानी से समझ में आ जाए ... खुद को वह बात समझ में आ चुकी होती है तभी तो हम उसे परिभाषित करने के लायक बनते हैं | पर प्यार आपके लिए क्या मायने रखता है, यह कैसी सुखद अनुभूति है यह बात दूसरों को समझाना कठिन कार्य है खासकर ऐसे लोगों को जिन्होंने इस अनुभूति को छुआ न हो ...
जबकि स्वयं तो इस एहसास से गुजरने के बाद, इसके छोटे छोटे पर अहम् भावों को महसूस करने के बाद, अपने भीतर इसे इस तरह समा लेते हैं कि वह हमारा ही एक हिस्सा बन जाता है और उसके बाद कोई चीज कोई व्यक्ति मायने नहीं रखता है ...
लेकिन किसी दूसरे के साथ अपने इन मनोभावों को बांटना _ _या सिर्फ बताना कितना मुश्किल है इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता...

तुम ख़याल बनकर,
मेरी अधजगी रातों में उतरे हो,
मेरे मुस्काते लबों से लेकर,
उँगलियों कि शरारत तक,
तुम सिमटे हो मेरी करवट कि सरसराहट में...
कभी बिखरे हो खुशबू बनकर,
जिसे अपने देह से लपेट
आभास लेता हूँ तेरे आलिंगन का,
जाने कितने रूप छुपे हैं तेरे,
मेरी बंद पलकों के कोनो में,
स्वप्न से लेकर..... उचटती नींद तक,
मेरे सर्वस्व पर तुम्हारा आधिपत्य है....

Thursday, May 20, 2010

हाँ मुसलमान हूँ मैं.....

                    यह कविता मेरे उन मुसलमान भाईयों के लिए है जो उनकी कौम के  चंद गुनाहगारों कि वजह से दुनिया भर में शक की नज़र से देखे जाते हैं.....
क्यूँ इतना तिरस्कृत, इतना अलग,
हर बार यह निगाह मेरी तरफ क्यूँ उठती है....
क्यूँ हर जगह मुझसे मेरा नाम पूछा जाता है..
क्यूँ भूल जाते हैं सब कि इंसान हूँ मैं,
इस देश कि मिटटी का अब्दुल कलाम हूँ मैं,
गर्व से कहता हूँ... हाँ, मुसलमान हूँ मैं...
आतंक फैलाना मेरा काम नहीं,
ये श़क भरी दृष्टि मेरा इनाम नहीं,
इस धरती को मैंने भी खून से सीचा है,
मेरे भी घर के आगे एक आम का बगीचा है,
हँसते हँसते जो इस देश पर मर गया,
वो क्रांतिकारी अशफाक अली खान हूँ मैं,
गर्व से कहता हूँ, हाँ मुसलमान हूँ मैं,
क्या हुआ जो चंद अपने बेगाने हो गए,
गलत रास्ता चुनकर, खून कि प्यास के दीवाने हो गए,
यह खुबसूरत वादियाँ हमारी भी जान हैं,
यह देश का तिरंगा हमारी भी शान है,
हरी-भरी धरती से सोना उगाता किसान हूँ मैं,
गर्व से कहता हूँ, हाँ मुसलमान हूँ मैं.....

Wednesday, May 12, 2010

जाने क्यूँ उदास है मन.....

जाने क्यूँ उदास है मन,
जाने किस बात का है गम,
यादों के झरोखों से कुछ,
धुंधली तस्वीरें दिखती हैं,
गर्मियों के मौसम में भी,
आखें शीतल पाषाण सी लगती हैं,
ह्रदय कि कोमल धरा पर,
काँटों जैसा कुछ चुभता है,
किसी को व्यथित देखकर ,
जाने मेरा मन क्यूँ दुखता है,
इस बेबसी का अर्थ है क्या,
क्या कहते हैं ये रेत के कण,
जाने क्यूँ उदास है मन.....
जाने किस बात का है गम....

Tuesday, April 13, 2010

वो लम्हें जो शायद याद न हों......

वो पहली बार,
जब माँ  ने गले से लगाया,
वो लम्हा जब पापा ने गोद में उठाया,
वो पहली मासूम सी हँसी,
वो पहली नींद की झपकी,
दादी की प्यार भरी पप्पी,
वो पहले लड़खड़ाते से कदम,
वो अनबुझ पहेली सा बचपन...
ढेर सारे खिलौने,
गुड्डों और गुड़ियों की दुनिया,
स्कूल में वो पहला दिन,
वो प्यारे पलछिन,
और भी ऐसा बहुत कुछ......
इस ज़िन्दगी की आपाधापी से,
इन वाहनों के शोर से,
कहीं दूर, कहीं एकांत में,
आओ बैठें, समेटे उन लम्हों को,
वो लम्हे जो बीत गए....
वो लम्हें जो शायद याद न हों......

Saturday, April 10, 2010

LIFE......


















Many a times we feel that...
Things are "Perfect..."
We pray to God...
"Please keep things like this only, forever..."
"Touch-wood"- This word comes in our mind, again and again...
But...
Life has its own "surprises"
It has its own "ups & downs"
As it is said...
"Morning comes after the dark night"
The opposite also exists...
"The dark, scary night also comes after the bright days..."
Things are never the same in one's life...
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