Monday, November 02, 2020

सपने...

सबकी ज़िंदगी के अपने अपने लक्ष्य होते हैं, आज के बदलाव भरे समय में अगर कोई एक बात है जो सबकी नींदें उड़ा रही है तो वो है नए तरह के सपने... 

पहले के सपने भी लोगों की सोच की तरह ही mediocre होते थे, साधारण सी ज़िंदगी के साधारण से सपने...

शायद मेरे भी ऐसे ही थे, मैं अकैडमिक्स में बहुत एवरेज रहा हमेशा, तो लगता था कुछ mediocre ही कर पाऊंगा... 2010 में engineering ख़त्म करने के बाद भी मुझे यही लगता था कि साधारण सी नौकरी चाहिए बस... 

फिर जब बैंगलोर आया तो सपने देखने सीखे, लगा कि अब तक कुएँ के मेढक की तरह जी रहा था, ऐसे इंसानों से मिला जो मेरे से उम्र में छोटे थे लेकिन अपने दम पर कुछ बड़ा करने का जज़्बा कहीं ज़्यादा था, महज़ 21-22 साल की उम्र में अपने सपने, अपने पैसे से पूरे करने की भूख... चाहे लड़का हो या लड़की. Infact लड़कियाँ ज़्यादा desperate थीं career और जॉब के लिए... CDAC का कोर्स चल ही रहा था फिर भी सब interview और exam देते ही रहते थे... 

मैंने तो नहीं दिया, लेकिन ऐसे कई interviews और exam का हिस्सा रहा... 

अजीब सुख था वो, एक इंसान जिसे किसी भी क़ीमत पर अपने दम पर कुछ करना था, उसका support system बनने का सुख... 

इस पूरे वक्त में मुझे लगने लगा था कि शायद समय का पहिया घूम चुका है, और अब कोई टाइम पास नहीं करना चाहता, workaholic होना ही ट्रेंड है.. 

अभी भी कुछ लोगों से मिलता हूँ तो अच्छा लगता है, उनका जज़्बा देखकर अच्छा लगता है.. अच्छा लगता है अगर कोई आगे बढ़े, अपने सपने खुद पूरे करे... लेकिन उसके लिए पहले सपने देखने पड़ते हैं... अगर सपने नहीं हैं तो उन्हें पूरा करने की भूख भी नहीं होगी...

Sunday, September 20, 2020

मैं अँधेरा लिखता हूँ...

मेरी ज़िन्दगी है 
सफ़ेद सफ़हे में लिपटे 
मेरे कुछ बेतरतीब हर्फ़, 

और मृत्यु
मेरी वो किताब है
जो कभी नहीं लिक्खी गयी... 

मैं बवंडर हूँ 
तबाही मचाता हूँ 
उड़ा ले जाता हूँ 
सबके घर, सबके सपने,

मैं वो अग्नि हूँ 
जिसे बुझाया नहीं जा सकता... 

मैं अँधेरा हूँ 
जिससे डरते हो तुम 
अकेले में,

मैं वो काली रात हूँ 
जिसकी कोई सुबह 
सुनिश्चित नहीं... 

Friday, September 11, 2020

फकैती वाले दिन (2)...

जब व्यस्त था
वो मज़दूर
हमारे बीच एक
ऊंची दीवार बनाने में,
हमने बदल लिए थे बिस्तर... 

एक संदूक रख छोड़ा था 
तुम्हारे वाले हिस्से में, 
उस संदूक में 
जितनी मेरी याद बची है 
मैं उतना ही ज़िंदा हूँ.... 

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याद नहीं मुझे 
अपनी पहली मौत, 

मेरी आखिरी मौत से पहले 
मुझे एक बार और जला देना... 

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मुझे नहीं पता फर्क 
रेत और पानी का,
कवितायें लिखनी है 
मुझे इंसानों और मछलियों पर.... 

मुझे रहना है 
मछलियों के घर में 
अपने गलफड़ों से सांस लेते हुए, 
पकड़नी है मछलियां 
फेंककर रेत में जाले को...  

फकैती वाले दिन...

मुझे ये चाँद बेचना है,
पर सारे खरीददार मुझे
बिखरे हुए प्रेमी लगते हैं,  
चाँद खरीदना उनका अधूरा सा ख्वाब है 
जो वो खुद को बेचकर 
पूरा करना चाहते हैं... 

मैं ढूँढ रहा हूँ कब से 
कि मिले कोई 
जिसे रहा हो 
इस चाँद से सच्चा प्रेम... 

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मैं कविताएं लिखना चाहता हूँ 
तुम्हारी भाषा में,
वो भाषा जिसका अनुवाद
बस हम दोनों के पास है,

ये जो बेवजह 
मेरी नज़्मों का किनारा खो गया 
उसे अपनी मुस्कुराहटों की भाषा में 
इठलाते हुए पढ़ लेना... 

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मैं फिर से लापरवाह हो जाना चाहता हूँ 
कुछ भी लिखते वक़्त,
लगता है 
लबालब भर गया हूँ शब्दों से,

मुझे धकेलना है इन शब्दों को 
किसी कूड़ेदान में 
और हो जाना है  
बिलकुल खाली... 

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एक चिंगारी है
मेरे तलवे के नीचे,
वो सिगरेट जो फेक दी किसी ने
आखिरी कश लेने से पहले,

मेरे पास माचिस भी है
और पानी भी  
मैं बुझता भी हूँ तो 
आखिर फिर से जलने के लिए.... 

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Monday, August 10, 2020

Wonder... A Wonderful film....

कहते हैं फिल्म समाज का आईना होती हैं...

पर सवाल है किस समाज का, पृथ्वी पर करोड़ों तरह के समाज हैं, सबकी मान्यताएं अलग-अलग हैं... हम अपने आस-पास के समाज को तो जानते ही हैं, और अधिकतर लोग उसी को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं..

मैं हमेशा से ऐसी फिल्में देखना पसंद करता हूँ जो ऐसे समाज से अवगत कराती हों, मैं जिसका हिस्सा नहीं हूँ... कॉलेज के वक़्त ईरानी, पर्शियन, कोरियन ये सारी फिल्में देखीं, कुछ एक तो बिना Subtitles के भी...

कई सारी फिल्मों को देखते हुए जाना कि हम एक भारतीय के तौर पर जिन संस्कार और संस्कृति की बात करते हैं वो कमोबेश बाकी देशों में भी ऐसे ही हैं, कुछ-एक जगह शायद हमसे बेहतर भी... खैर सर्वश्रेष्ठ कहलाने की इस लालसा के बारे में फिर कभी...

आज बात एक फिल्म की, "Wonder"...

ये फिल्म है एक बच्चे की(Auggie) जो Treacher Collins syndrome से जूझ रहा है और लोगों की घूरती नज़रों से बचना चाहता है, ये फिल्म है उसके माता-पिता की जो उसे सामान्य ज़िन्दगी और सामान्य समाज का हिस्सा बनाना चाहते हैं, ये फिल्म उसकी बड़ी बहन की भी है जो ये जानती है कि उसके भाई को, उसके पेरेंट्स की ज्यादा अटेंशन चाहिए... फिर भी वो उन्हें मिस करती है कि काश वो उससे भी उतनी ही बातें करें जितना वो उसके भाई से करते हैं...

ये फिल्म है एक और लड़के की जो उसका दोस्त नहीं बनना चाहता, फिर बनना चाहता है लेकिन बाकी दोस्त क्या कहेंगे उससे भी डरता है...

ये फिल्म एक लम्बी लड़ाई है सभी किरदारों के लिए, लड़ाई किसी "एबनॉर्मल" से इंसान को "So called Normal" समाज का हिस्सा बनाने के लिए...

हम खुद इंसान हैं लेकिन इंसानी रिश्तों को समझना और उसे फिल्मों में उतारना शायद उतना मज़बूत Genre नहीं है... लेकिन इसपर जितनी फिल्में बनी हैं वो सभी कुछ न कुछ सिखाती ही हैं...

फिल्म के आखिरी में Auggie कहता है.... "Be kind, for everyone is fighting a hard battle. And if you really want to see what people are, all you have to do is look".

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फिल्म कहाँ देखें... अगर आपके पास एयरटेल मोबाइल कनेक्शन है तो https://www.airtelxstream.in/movies पर लॉगिन करके.. 
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