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Saturday, October 11, 2014

मेरी लंबी उम्र के लिए हमारा प्यार ही काफी होगा....

आज करवाचौथ पर फेसबुक पर तरह-तरह के स्टेटस देखे, कुछ बेहद कड़वे कुछ प्यार में पूरी तरह से डूबे हुये, किसी भी इस तरह के स्टेटस पर अपनी राय देने से बचा... जब भी इस तरह का कोई भी पर्व आता है अजीब तरह की कशमकश होती है...
इस बाजारवाद को अगर एक किनारे कर भी दें लेकिन एक बात तय है कि अगर कोई मेरी सलामती के लिए एक पूरा दिन भूखे रहने का निर्णय ले तो मेरे लिए इससे बड़ी दुख की बात और कुछ नहीं हो सकती...
हालांकि माँ हर साल जीतिया के नाम पर ये करती आई हैं, लेकिन चूंकि उनका विरोध कर सकूँ उतना सामर्थ्य नहीं है और मैं अकेला भाई भी नहीं कि ऐसे कह दूँ... माँ साफ साफ ये कह के निकल जाएंगी कि केवल तुम्हारे लिए थोड़े ही रखा है....
लेकिन इतनी बात पक्की है कि शादी के बाद अगर मेरी पत्नी ये कहे कि उसे मेरी लंबी उम्र लिए भूखे रहना है तो इसका विरोध मैं ज़रूर करूंगा... उम्मीद करूंगा ऐसा कोई दिन न आए और हम स्वेच्छा से इस नौटंकी से दूर रह सकें... 3 महीने पहले हुयी Prashant Priyadarshi भैया की शादी के बाद जब आज वहाँ करवाचौथ का Boycott हुआ तो उम्मीद जगी हम इन नौटंकियों से आज़ाद होंगे कभी न कभी....
काश आने वाले समय मैं उसे ये समझा सकूँ कि यकीन मानो मेरी लंबी उम्र के लिए सिर्फ हमारा प्यार ही काफी है, किसी को भूखे रहने की कोई ज़रूरत नहीं... अगर मेरी लंबी उम्र चाहती ही हो तो चलो मिल कर कुछ अच्छा खाने का बनाते हैं और साथ मिल कर खाते हैं..

Tuesday, October 15, 2013

इन्सानों की बलि...

दृश्य 1
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गेंदे का पौधा आज बहुत उदास था उसने गुलदावदी से कहा यार तुम्हारी खुशबू मेरी खुशबू से अच्छी है क्या ??? गुलदावदी इतराते हुये बोली, हाँ और नहीं तो क्या.... गेंदे ने बुझे मन से अपना ऑफिस बैग उठाया और दफ्तर की ओर चल पड़ा... पीछे से गुलदावदी ने आवाज़ लगाई आज दफ्तर से जल्दी आना, शाम को मंदिर जाना है... आते वक़्त रास्ते से इन्सानों के कुछ अच्छे बाल तोड़ लाना.... घने देख के ही लेना... और उनमे डैंड्रफ और जुएँ भी न हों.... 
शाम को लौटते वक़्त गेंदे ने देखा सभी इंसान गंजे ही हैं...
"कमबख्त पूजा वाले दिन बालों की बड़ी किल्लत होती है, साले सब सुबह सुबह ही सारे बाल काट ले जाते हैं... "
बड़ी देर बाद खोजने पर एक 4-5 साल की बच्ची दिखी, गेंदे ने सोचा "यार बिना बालों के ये कितनी बेरंग दिखेगी, फिर सोचा अगर इसके बाल नहीं लिए तो आज की पूजा अधूरी रह जाएगी...
फिर फटाफट उसके छोटे-छोटे बाल तोड़कर वो घर की तरफ चल पड़ा... 
"ये बाल चढ़ाने से पूजा ज़रूर सफल हो जाएगी.... "

दृश्य 2
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लंच का समय है, कैंटीन की कुर्सियों पर बैठे बकरे, ऊंट और भैंस अपनी अपनी घास खा रहे हैं... भैंसे ने बात शुरू की,  "अरे दोस्तो  **** पूजा आ रही है, कैसे मनाना है, कुछ सोचा है ??? "
"सोचना क्या है..."
"अरे पिछली बार जो हमने **** जाति के इन्सानों की बलि चढ़ाई थी, सब बेकार हुआ... देवी माँ खुश ही नहीं हुईं... गजब सूखा पड़ा था, साली हरी घास खाने को तरस गए थे... इस बार तो **** की ही बलि चढ़ाएँगे, मैंने पढ़ा है वो इंसान की सबसे ऊंची ब्रीड है.... इस बार माँ जरूर प्रसन्न होंगी..."
बकरे ने बात आगे बढ़ाई,
"यार इस बार तो अपने त्योहार पर हमने करीब 10000 हाई ब्रीड इन्सानों को इकट्ठा करके बांध रखा है... "
"वाह, क्या बात है..."
"हाँ, इस बार **** जरूर खुश होगा, जन्नत नसीब होगी हमारे बकरों को...."
ऊंट के चेहरे पर गजब का तेज़ आ गया,
"भाईजान, हमने भी तो 10000 गोरे इंसान मंगवाएँ हैं विदेश से, सुना है उसकी बलि देने पर सारी मिन्नतें पूरी हो जाती हैं...."
"वाह इसका मतलब मरने के बाद हम सबको ही स्वर्ग मिलेगा..."
ये बोलकर तीनों ठहाका लगाते हैं, और पूरा कैंटीन उनकी हंसी से गूंज पड़ता है..

लेखक की चिप्पी ...
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क्या किसी भी धर्म में ऐसा कोई त्योहार है जिसमे धार्मिक कारणों से छायादार पेड़ लगाने, फूल-पत्तियों के पौधे लगाने, या फिर पशु-पंछियों को आज़ाद करने की रस्म हो ??? इंसान द्वारा किया गया कोई भी धार्मिक अनुष्ठान बिना फूलों को तोड़े हुआ पूरा नहीं होता.... कई अनुष्ठानों में अलग अलग पशुओं की बलि देने की भी प्रथा है... मैं यहाँ किसी धर्म विशेष को उचित या अनुचित ठहराने के लिए नहीं आया, बस सवाल इतना सा है कि उस ऊपर वाले के नाम की धार्मिक गतिविधियों में हम इसे धरती का भला क्यूँ नहीं कर सकते.... धर्म की पूर्ति के लिए पर्यावरण विध्वंस क्यूँ ???

ये उस युग की बात हो सकती है जब पेड़-पौधे और पशुओं की प्रजातियों की सभ्यता ने विकसित रूप ले लिया होगा... सोचिए अगर भैंस, बकरे और ऊंट भी इतने ही विकसित और धार्मिक होते और वे अपने काल्पनिक इष्ट जनक को खुश करने के लिए इंसानों की बलि दिया करते तब इंसानों तुम्हें कैसा लगता ???
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