Saturday, October 09, 2010

सुनहरी यादें ....

                  बीते हफ्ते ना जाने कितनी रचनायें पढ़ीं , कोशिश थी कि अच्छी से अच्छी रचना आपके लिए लायी जाए... ऐसा लगा जैसे मैंने बहुत ही कठिन कार्य ले लिया हो, लेकिन सच में बहुत अच्छा लगा इतनी खुबसूरत रचनायें पढ़कर...
                  तो वादे के मुताबिक सुनहरी यादों के झरोखे से इस शनिवार मैं आपके लिए लाया हूँ आदरणीय रश्मि प्रभा जी की दो रचनायें...
                  पहली रचना जो उन्होंने 16 जनवरी  2008 को प्रकाशित की थी... माँ बनने के बाद एक स्त्री की सोच और ज़िन्दगी कितनी बदलती है उसका बहुत ही प्यारा सा वर्णन है... कविता का शीर्षक है ....
                                                             " मायने बदल जाते हैं.."
जब मासूम ज़िन्दगी अपने हाथों में,
अपनी शक्ल में मुस्कुराती है
तो जीवन के मायने बदल जाते हैं...
बचपन नए सिरे से दौड़ लगाता है!
कहाँ थे कंकड़, पत्थर?

कहाँ थी काई ?
वर्तमान में जीवंत हो जाते हैं॥
नज़रिये का पुनर्आंकलन
मासूम ज़िन्दगी से जुड़ जाते हैं...
जो हिदायतें अभिभावकों ने दी थी
वो अपनी जुबान पर मुखरित हो जाते हैं!
हमने नहीं मान कर क्या खोया
समझने लगते हैं
नज़र, टोने-टोटके पर विश्वास न होकर भी
विश्वास पनपने लगते हैं!
"उस वृक्ष पर डायन रहती है...."
पर ठहाके लगाते हम
अपनी मासूम ज़िन्दगी का हाथ पकड़ लेते हैं
"ज़रूरत क्या है वहाँ जाने की?"
माँ की सीख, पिता का झल्लाना
समय की नाजुकता समय की पाबंदी
सब सही नज़र आने लगते हैं!
पूरी ज़िन्दगी के मायने
पूरी तरह बदल जाते हैं |...
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दूसरी रचना कुछ नयी है, उम्मीद आप में से काफी लोगों ने पढ़ी होगी, यह उन्होंने १० जुलाई २००९ को प्रकाशित की थी..इस कविता में उन्होंने ज़िन्दगी में आने वाली परेशानियों का शुक्रिया अदा किया है.... यह कविता उन लोगों के लिए अमृत का काम करेगी जो ज़िन्दगी के दुखों से हताश हैं... कविता का शीर्षक है.....
                                                                   "  शुक्रगुज़ार "

दर्द ने मुझे तराशा है,
दर्द देनेवालों की
मैं शुक्रगुजार हूँ........
यदि दर्द ना मिलता
तो सुकून का अर्थ खो जाता,
खुशियों के मायने बदल जाते,
अपनों की पहचान नहीं होती,
गिरकर उठना नहीं आता,
आनेवाले क़दमों में
अनुभवों की डोर
नहीं बाँध पाती.........
मैं शुक्रगुजार हूँ,
उन क्रूर हृदयों का
जिन्होंने मुझे सहनशील होना सिखाया,
सिखाया शब्दों के अलग मायने
सिखाया अपने को पहचानना ........
तहेदिल से मैं शुक्रगुजार हूँ,
दर्द की सुनामियों की
जिसने मुझे डुबोया
और जीवन के सच्चे मोती दिए...........
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उम्मीद है आपको यह दोनों रचनायें पसंद आयी होंगी... अपने विचार और सुझावों से मुझे जरूर अवगत कराएं....

Tuesday, October 05, 2010

संघर्ष .....

                  पिछले कुछ दिनों से लिखने से ज्यादा पढने में व्यस्त था | इसलिए कुछ लिखना संभव ना हो सका, इसलिए आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ १९९९ में लिखी मेरी एक कविता | यह कविता यहाँ पहले भी प्रकाशित हो चुकी है, लेकिन उस समय मेरा ब्लॉग शायद ही कोई पढता था | अगर आपको इसमें कोई त्रुटि लगे तो उसे ज़रूर सुधारेंगे क्यूंकि उस समय की मेरी उम्र के हिसाब से यह रचना शायद थोड़ी भारी भरकम है........
अंतहीन समंदर,
आती जाती तेज़ लहरें,
एक आशंका लिए कि,
मझधार यह कहाँ ले जाएगी,
ज़िन्दगी से लड़ते- लड़ते मौत दे जाएगी,
एक किनारे की तलाश में,
निगाहें समेटना चाहती हैं समंदर,
मायूसी की घटा है चेहरे पर,
बयां करती एक दास्तान,
दरम्यान यह ज़िन्दगी मौत का
एक पल के झरोखे में मिटा जाएगी
डूबना होगा अगर मुकद्दर मेरा,
लाख कोशिश न रंग लाएगी,
एक साहिल की तलाश में
यह ज़िन्दगी बीत
जाएगी...
क्या करूँ ? ? 
मान लूं हार या करूँ संघर्ष
आखिरी क्षण तक, 
क्या होगा अंजाम 
यह तो तकदीर ही बताएगी......

Monday, October 04, 2010

आपकी रचना...

          कल रात यूँ ही बिस्तर पर लेटे लेटे एक ख्याल मन में आया | सभी ब्लॉगर्स दूसरे की रचनायें पढ़ते हैं लेकिन क्या वो अपनी पुरानी रचनाओ को पढ़ते हैं  ? ? ? शायद नहीं |
          इसलिए मेरे ब्लॉग पर हर शनिवार की शाम ऐसी रचनायें प्रकाशित की जायेंगी, जो हैं तो आपकी लेकिन शायद आपने बहुत दिनों से नहीं पढ़ीं.... आप इसे दोबारा यहाँ पढ़ सकते हैं | और हाँ इसका ज़िक्र आप अपने ब्लॉग पर भी कर सकते हैं ताकि आपके वो पाठक और प्रशंसक जिनका शायद मेरे ब्लॉग पर नियमित आना नहीं हैं वो भी इसका आनंद उठा सकें....
तो फिर सोच क्या रहे हैं कृपया अपने विचार जल्दी से जल्दी मुझे भेजें ताकि इसी शनिवार से काम शुरू हो जाए आपकी ही रचना को आपसे ही बांटने का....आपके जवाब के इंतज़ार में.....
## किसी की अनुमति के बिना उनकी रचना यहाँ प्रकाशित नहीं होगी..... इसलिए अपनी हामी जरूर भरें....

Thursday, September 30, 2010

माँ...

आज के दिन हमारे बिहार में एक पर्व मनाया जाता है, " जीवित्पुत्रिका व्रत "..... आम भाषा में कहें तो "जिउतिया" | इस पर्व में माँ अपनी संतानों की मंगलकामना और लम्बी उम्र हेतु उपवास रखती है.... समय के अभाव में कुछ नया लिख नहीं पाया इसलिए दुनिया की हरेक माँ के चरणों में अपनी एक पुरानी कविता समर्पित कर रहा हूँ..... 
मेरी सारी दौलत , खोखले आदर्श,
नकली मुस्कराहट
सब छीनकर,
दो पल के लिए ही सही
मेरा बचपन लौटा देती है माँ...
कभी डाँटकर, कभी डपटकर
कभी माथे को सहलाकर,
अपने होने का एहसास दिलाती है माँ...
जब डरा सहमा सा,
रोता हूँ मैं
मेरे आंसू पोंछकर,
अपने आँचल में छुपा लेती है माँ...
जब रात्रिपहर में निद्रा से दूर
करवट बदलता रहता हूँ मैं,
अपनी गोद में सर रख कर
लोरी सुनाती  है माँ...
परेशान वो भी है अपनी ज़िन्दगी में बहुत,
पर हँसी के परदे के पीछे,
अपने सारे गम छुपा जाती है माँ .......

Thursday, September 16, 2010

नज़्म ...

आज यूँ ही फेसबुक पर घूमते घूमते ये पंक्तियाँ मिलीं, अच्छी लगी इसलिए आपके साथ बांटना चाहूँगा..... 
अगर इन पंक्तियों के बारे में आपको जानकारी हो तो जरूर बताएं.......  


हर ख़ुशी है लोगों के दामन में,
लेकिन एक हँसी के लिए वक़्त नहीं.

दिन रात दौड़ती दुनिया में,
ज़िन्दगी के लिए ही वक़्त नहीं.

माँ की लोरी का एहसास तो है,
पर माँ को माँ कहने का वक़्त नहीं.

सारे रिश्तों को तो हम मार चुके,
अब उन्हें दफ़नाने का भी वक़्त नहीं.

आखों में है नींद बड़ी ,
पर सोने का ही वक़्त नहीं.

दिल है ग़मों से भरा हुआ,
पर रोने का भी वक़्त नहीं.

पराये एहसासों की क्या क़द्र करें,
जब अपने सपनो के लिए वक़्त नहीं.

तू ही बता ए ज़िन्दगी इस ज़िन्दगी का क्या होगा ,
कि हर पल मरने वालों को जीने के लिए भी वक़्त नहीं....
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