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Saturday, October 06, 2018

ये माँ भी मेरी न जाने कितने कमाल करती है...

ये माँ भी मेरी न जाने कितने कमाल करती है,
में ठीक तो हूँ न, हर रोज़ यही सवाल करती है

शाम हो गयी है देखो, अंधेरा भी हो गया है
आँचल में समेटकर वो मुझको, हिम्मत बहाल करती है

माँ भूखी है. व्रत रखा उसने मेरी लम्बी उम्र के लिए,
माँ की भूख से मिली ये उम्र मुझसे ही सवाल करती है

मैंने सजाया है दस्तरखान जाने कितने पकवानों से
पर जब तक माँ न खिला दे, ये भूख बेहाल करती है...

ये माँ भी मेरी न जाने कितने कमाल करती है,
में ठीक तो हूँ न, हर रोज़ यही सवाल करती है...


Sunday, July 05, 2015

माँ, मैंने आपकी खामोशियाँ पढ़नी सीखी हैं...

वैसे तो कहा जाये तो हम तीनों भाइयों मे से सबसे ज्यादा वक़्त मैंने ही माँ के साथ बिताया है, लेकिन एक वर्किंग मदर अपने बच्चे को कितना वक़्त दे पाती है वो तो सबको पता ही है... उस कम वक़्त में भी जब माँ के पास कहने के लिए ज्यादा कुछ नहीं होता था, बस उनके चेहरे के हाव-भाव पढ़ने की ज़रूरत अपने आप महसूस हो गयी, फिर न जाने कब मैं इस काम में इतना दक्ष हो गया कि आज भी माँ कुछ कहे न कहे शब्द अपने आप बुनने लगते हैं... 

जब फोन करता हूँ उधर से आई एक हेलो की आवाज़ से सब कुछ पता चल जाता है... हो सकता है ये गुण सब बच्चे अपने हिसाब से डेव्लप कर लेते हों, और ऐसा कर लेने पर खुशी भी मिलती हो... 

आज भी आपको अपने प्रमोशन के बारे में  बताने के लिए फोन किया तो आपकी वो खामोश सी खुशी हौले हौले से मेरे दिल में उतर गयी... आपका कुछ कहना, न कहना कोई माने नहीं रखता क्यूंकी आपकी खामोशियों के शब्द तो तभी मेरे अंदर आ गए थे जब आप मुझे ये दुनिया दिखाने के लिए तैयार कर रही थीं... 

Tuesday, October 14, 2014

कुछ त्योहार सालो भर भी तो होने चाहिए न !!!!

चाहे जेठ की दुपहरी हो
या फिर पूस की रात
सावन की बारिश में भीगते हुये भी
इंतज़ार बैठा रहता था
ओसारे पर, दरख्तों पर ,

एक झलक माँ की,
लौटा देती थी हलक में जान फिर से...

कई त्योहार आते हैं-बीत जाते हैं,
कुछ पल देते हैं याद रखने को
और दिये जाते है साल भर का इंतज़ार....

तुमसे मिलना भी
अब बस एक त्योहार ही है माँ
साल में एक बार ही आता है,
कुछ देर ही ठहरता है, ज्यादा देर नहीं....

इन सादे लफ्जों में,
कुछ-एक त्योहार और मांगता हूँ,
कुछ त्योहार सालो भर भी तो होने चाहिए न !!!!

Friday, September 27, 2013

माँ भूखी क्यूँ रहती है...

आज जिउतिया (जीवित पुत्रिका व्रत) है....  बड़ा अजीब त्योहार है जी... जब छोटा था तब शायद अच्छा लगता होगा, लेकिन अब ये सोच कर अजीब लगता है कि क्यूँ आखिर मेरी सलामती के लिए मेरी माँ उपवास करे... श्रद्धा या विश्वास का पता नहीं क्यूँ, लेकिन माँ से पूछने पर तो यही कहती हैं कि हमेशा से करते आए हैं, तो अब छोडने का क्या मतलब है...

कल जब उन्होने आज के बारे में बताने के लिए फोन किया था तो ऐसे उत्साह से बातें कर रही थीं जैसे आज पहली बार व्रत रखा हो... पता नहीं कहाँ से उनमे इतनी ऊर्जा आ जाती है ऐसे मौकों पर...

बड़े शहरों में
अपने घर से दूर बसे लोग, 
अक्सर ढूंढते हैं 
अपनी माँ के हाथों की रोटियाँ
उन्हें नहीं अच्छा लगता 
कहीं और का बना खाना...
फिर अगले पल उन्हें खयाल आता है
कि इन्हीं बाहर बनी 
रोटियों को कमाने की खातिर
वो अपना घर छोड़ आए हैं....

जब दिन भर की भागदौड़ के बाद
तमाम थकान से 
चकनाचूर होकर भी,
रात को नींद नहीं आती 
उन महंगे गद्दों पर
तब उन्हें फिर ये खयाल आता है
इन गद्दों की ही खातिर तो
वो माँ की गोद छोड़ आए हैं.... 

Friday, September 06, 2013

मेरे मम्मी-पापा तो टीचर हैं... Happy Teacher's Life... :-)

करीब 7-8 साल पहले की बात है... पटना में रहता था, छुट्टियों में घर जा रहा था... उन दिनों पटना से कटिहार के लिए जनशताब्दी एक्सप्रेस चलती थी, चेयर यान होता था.. रिजर्वेशन काउंटर पर स्पेशल रिक्वेस्ट से विंडो सीट ली थी, बाहर के खूबसूरत मौसम का लुत्फ़ उठाने के इरादे से... बमुश्किल फतुहा स्टेशन क्रोस हुआ होगा कि सामने की सीट पर होते शोर से ध्यान भंग हुआ...
4-5 लड़के अपनी-अपनी डीगों की दूकान खोल कर बैठे थे... बात मोबाईल के टॉपिक से शुरू हुयी, उन दिनों किसी भी मोबाईल का होना अपने आप में ही स्टेटस सिम्बल था... 
दो शिक्षक मेरी ज़िन्दगी के...
"अरे हम नया मोबाईल खरीदे नोकिया 6600...."
"क्या बात कर रहा है ???? "
"हाँ बे इसमें कैमरा भी है, विडियो भी चलता है मस्त...."
"अबे दिखा न.."..
फिर एक-आध घंटे तक सब गाने और विडियो इंजॉय करते रहे... फिर उसके बाद सब अपने अपने खानदान के रुतबे के बारे में बात करने लगे.. किसी ने कहा मेरे पापा डॉक्टर हैं, कोई अपने चाचा को सरकारी अफसर बता रहा था तो कोई बैंक मनेजर... उनके सो काल्ड रिश्तेदारों की कितनी पहुँच और पहचान है वो भी बता रहे थे... किसी को पूरा गाँव जानता था तो किसी को पूरा जिला.. उन डीगों पे जाऊँगा तो पूरा पन्ना इसी में लग जाएगा... बस समझ लीजिये कि गुंडे-मवालियों से लेकर मंत्री तक से पहचान थी उनकी...
इसी बीच उनमें से  किसी लड़के ने दबी आवाज़ में कहा कि "मेरे पापा तो टीचर हैं... "
थोड़ी देर की ख़ामोशी के बाद एक लड़के ने कहा, मस्त है यार, जो भी हो यार मास्टरी में बहुत आराम है लेकिन... आराम से जाओ कोनो काम नहीं, दिन भर गप्पें मारो, स्वेटर बुनना है तो वो भी कर लो... बच्चों को दो-तीन ठो सवाल दे दो हल करने को और दिन खतम... 
फिर सिलसिला शुरू हुआ अपने अपने रिश्तेदारों के काम गिनाने का... 
"भई हमरे पापा को तो कभी कभी रात-रात को अस्पताल जाना पड़ता है..."
"अरे मत पूछ हमरे चाचा के घर में तो दिन भर कोई न कोई आता ही रहता है, रविवार को भी कोई छुट्टी नहीं..."
"अरे अभी क्लोजिंग चल रहा है न तो पापा तो बैंके में रहते हैं हमेशा..."
वो बेचारा लड़का चुपचाप उनकी बातें सुन रहा था... और वो अपनी कहानियां सुनाये जा रहे थे... मेरा दिल किया मैं इस वार्तालाप में कुछ बोलूँ, लेकिन बेवजह फटे में टांग डालने का मन नहीं था मेरा...
इसी बीच बरौनी आ गया, उन दिनों वहां इंजन चेंज होता था तो करीब ४५ मिनट रूकती थी ट्रेन... सब नीचे उतरकर इधर उधर टहला करते थे... प्लेटफोर्म पर टहलते हुए मैंने उस लड़के को देखा, पता नहीं क्या मन हुआ उसके पास गया और बस इतना ही बोला...
"अरे टेंशन मत लीजिये, हमरे पापा भी टीचर हैं और ई सब लड़का लोग जानता नहीं है कि एकरा डॉक्टर, अफसर, मनेजर सब पढ़ा कोनो न कोनो टीचरे से है..."   
ये बोलकर मैं बिना उसका रिएक्शन देखे आगे बढ़ गया... जब ट्रेन में वापस आया तो वो मुझे देखकर मुस्कुरा रहा था, शायद उसे अपने पापा की अहमियत समझ में आ गयी थी...

खैर ये तो था एक बीता किस्सा, लेकिन निजी तौर पर भी मुझे वाकई इस बात पर गर्व होता है कि मेरे माँ-पापा दोनों शिक्षक के रूप में सेवानिवृत हुए...

पता नहीं आपमें से कितने लोगों ने दो-दूनी चार फिल्म देखी हो... एक मिडल क्लास शिक्षक की कहानी है.. थोड़ी कॉमेडी भी है और थीम भी अच्छा है... आपको पसंद आएगी... :-)

चलते-चलते...
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ये पोस्ट देर से सिर्फ इसलिए पोस्ट कर रहा हूँ क्यूंकि वो सिर्फ एक दिन याद करने लायक नहीं है... वो तो हमेशा आपके साथ हैं जब भी आप ज़िन्दगी में किसी भी दिन कुछ भी कुछ हासिल करते हैं... :-)
याद रखिये, दुनिया में सिर्फ और सिर्फ शिक्षक के पास ही ऐसी जादुई क्षमता है कि एक अच्छे खासे इंसान को मुर्गा बना सके... एंड ऑन अ सीरियस नोट, एक गधे को इंसान बना सके...

Happy Teacher's Day Life... :)

Friday, October 12, 2012

ज़िन्दगी के कुछ कतरे ये भी हैं...

जब भी मौका मिलता है कहीं न कहीं कुछ न कुछ लिखता ही रहता हूँ, आजकल डायरी से ज्यादा फेसबुक सब कुछ सहेजने का काम करता है.. ऐसे ही कुछ कतरे जो अलग अलग मूड में लिखे गए हैं... कुछ डायरी के पन्नों से और कुछ फेसबुक की दीवार से...

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स्कूल से मेरी छुट्टी पहले हो जाया करती थी, घर आकर मैं इधर-उधर टहलता... उस समय घर में कोई नहीं होता था, मैं थोड़ी ही देर में कपडे बदलकर छत पर चले जाया करता... हर मिनट नज़र घर के सामने की सड़क पर चली जाती थी, वहां तक देखने की जी तोड़ कोशिश करता जहाँ तक देख सकूं... ये मेरा हर रोज का रूटीन था... हर शाम मेरी उन छोटी आखों में ढेर सारा इंतज़ार होता था... अजीब बात है न, जबकि पता था कि माँ साढ़े चार बजे से पहले नहीं आएगी.. फिर भी इसी उम्मीद में रहता था कि काश आज थोडा पहले देख लूं उन्हें... बहुत गहरा उतर चुका था वो इंतज़ार... आज १७-१८ साल बाद ज़िन्दगी बहुत आगे निकल आई है... साल भर से ज्यादा होने को आये हैं उन्हें देखे हुए... ऐसा पहली बार हुआ है जब इतने दिनों तक माँ-पापा से नहीं मिला... हालांकि उनसे मिलकर भी उनसे ऐसी कुछ ख़ास बातें नहीं होती हैं... बस एक सुकून सा मिलता है... कलैंडर की तरफ देखता हूँ तो अभी भी दिवाली में एक महीना बाकी है...:-/

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सुबह बाहर गहरा कोहरा था, सड़क पर सूखे पत्ते ओस की बूंदों से लिपटे ठिठुर रहे थे... मैंने खिड़की से झाँका तो देखा, सुबह सुबह कचरे उठाने वालों के अलावा कोई नहीं था... ऐसा लगा उनकी ज़िन्दगी की शेल्फ के हिस्से यूँ ही सड़कों पर खुले रखे हैं... वो बाहर अपना काम कर रहे हैं वो भी ऐसे मौसम में जब अपनी रजाई से निकलकर एक ग्लास पानी पीने के लिए भी मुझे सौ बार सोचना पड़ा था... घडी की तरफ देखा तो ७ बज चुके थे, दफ्तर तो १० बजे निकलना है ये सोच कर वापस रजाई में दुबक गया.. लेकिन नींद आखों के पैमाने से छलक कर कहीं दूर जा चुकी थी... मैं खुद में बहुत छोटा महसूस कर रहा था... ज़िन्दगी के कैनवास पर कई रंग छिड़क चुके हैं लेकिन फिर भी कहीं न कहीं कोई अधूरापन ज़रूर है मुझे पसंद नहीं आता.. कभी कभी ये आईडीयलिस्ट वाली फिल्में देखकर और नोबेल पढ़ के दिमाग दूसरी काल्पनिक सतहों पर काम करने लगता है... फिर उस समय मैं जो सब कुछ सोचता हूँ, कहता हूँ, लिखता हूँ उसे मेरे सभी दोस्त और जाननेवाले एक सिरे से खारिज कर दिया करते हैं... ये सब बातें उन्हें बकवास लगती हैं... फिर थोड़ी देर बाद उस कल्पनिद्रा से बाहर आने पर मुझे भी एहसास होता है शायद कुछ चीजें वास्तविक नहीं हो सकतीं...

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याद है जब कल सुबह मैं तुमसे मिला था, हमने एक साथ बैठ के कितनी ढेर सारी बातें की... तुम्हें अपने उस सपने के बारे में भी बताया जिसमे तुम्हारे नहीं होने के कारण मैं कितना बेचैन हो गया था... अभी अभी थोड़ी देर पहले मुझे एहसास हुआ कि तुम्हारा यूँ मेरे साथ बैठना एक सपना था और तुम्हारी गैरमौजूदगी एक हकीकत.. सच ही तो है कभी-कभी सपने और हकीकत में फर्क करना कितना मुश्किल हो जाता है...

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ये दूरियों का गणित है, दूरियां ग़मों से, दूरियां उस बेचैनी से, दूरियां हर उस चीज से जो तुम्हें इस खूबसूरत दुनिया की नजदीकियों का एहसास करने से रोक लेती हैं हर एक बार... जब ठंडी हवा के हलके हलके थपेड़े तुम्हारे होंठों की मुस्कराहट बनना चाहते हैं, जब ये हलकी हलकी बारिश उन आखों की नमी को छुपाने की कोशिश करती नज़र आती है, जब कभी कभी तुम्हारा दिल भी एक मुट्ठी आसमान मांगता है... इस गणित से आज़ाद होकर चलो वहां, जहाँ एक उड़ान तुम्हारा इंतज़ार कर रही है...

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जब हम खुद को अपने आप से आज़ाद कर लेते हैं तो सुकून के ऐसे दौर में पहुँचते हैं जहाँ उस महीन सी आवाज़ को भी सुन लेते हैं जब ओस की बूँदें घास से टकराती हैं...इन आवाजों से मैं तुम्हें भी रूबरू कराना चाहता हूँ... ये ऐसी जगह है जहाँ कुछ भी सही नहीं, कुछ भी गलत नहीं बस एक लापरवाह सी आजादी है... 

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मेरे एक हिन्दू मित्र ने मुझसे पुछा था कि मैं भगवान् को क्यूँ नहीं मानता...????
मैंने उससे बस इतना ही पूछा क्या तुम अल्लाह, ईसा या नानक को मानते हो... कभी मस्जिद में जाकर नमाज़ पढ़ी है, या कभी चर्च में जाकर प्रेयर में शामिल हुए हो ????
मैं भगवान् के इस वर्गीकरण को नहीं मानता.... भगवान् अगर मन में है तो उसका एक रूप होना चाहिए.... भगवान् का अस्तित्व मन से बाहर निकालकर मंदिर, मस्जिद या और किसी इमारत में बसाने का विरोध मैं करता आया हूँ और हमेशा करता रहूँगा....
 

Sunday, May 13, 2012

मेरी माँ थोड़ी अलग सी है...

            जानता हूँ इस पोस्ट का शीर्षक कई लोगों को अजीब सा लगेगा, आखिर ऐसी क्या अलग बात है मेरी माँ में... लेकिन माँ की जो सूरत अपने आस पास के लोगों से देखी, जैसी ममता, जैसे अपनेपन की बात सभी करते हैं वैसा कुछ भी मैंने अपनी निजी ज़िन्दगी में महसूस किया हो ऐसा नहीं है... हालांकि माँ तो सभी की अपने बच्चों से उतना ही प्यार करती है, लेकिन सभी अपना प्यार जतला सकें ऐसा नहीं है...
            मेरी माँ भी कुछ ऐसी ही हैं, उनके वर्किंग वुमेन होने का असर हमारे लिए मिलने वाले समय पर पड़ा... कभी फुर्सत में बैठ के बातें करना, दुलारना, पुचकारना शायद हमारी किस्मत में नहीं था... अलग दुनियादारी, अलग जिम्मेदारियां और ढेर सारा काम... मैं भी हमेशा अपने आस पास अपने दोस्तों की माओं को देखता था तो मेरा भी मन करता था कि कभी मेरी माँ भी इसी तरह मुझे प्यार से बेटा कह कर गले से लगा ले, आखिर किसका मन नहीं करता लेकिन ऐसा कोई पल कभी मेरी ज़िन्दगी में न आ सका... कितनी ही बार मन किया माँ की गोद में सर रख कर सो जाऊं... लेकिन कभी कभी ज़िन्दगी अपनी कुछ परिभाषाएं छुपा लेती है, और इसे मेरी बदकिस्मती समझूं या फिर नियति ज़िन्दगी का सबसे खुबसूरत एहसास ही छुप गया मुझसे... आखिर ज़िन्दगी का होना और उसका यूँ फलना-फूलना माँ के प्यार के बिना भला क्या मायने रखता है... लगता था मेरी माँ मुझे प्यार ही नहीं करती... शायद इसी डर से कि कहीं वो मुझसे दूर न चली जाए मैं ह्मेशा उनका आँचल पकडे चला करता था...
           जब धीरे धीरे बड़ा हुआ, थोडा समझदार(?) हुआ तब लगा कि वो प्यार तो ज़रूर करती होंगी लेकिन उन्हें जतलाना नहीं आता... फिर भी इस बात को कई सालों तक मैं एक्सेप्ट नहीं कर सका, आज भी कभी कभी जब अपने आस पास किसी माँ को अपने बच्चे से प्यार से गले लगाते हुए देखता हूँ तो आखें नम हो जाती हैं... कभी माँ के बारे में कुछ लिखने का सोचता हूँ तो वो एहसास नहीं ला पाता अपने शब्दों में, वो कुछ मैं महसूस ही नहीं कर सका कभी...कई बार माँ की बहुत याद आती है और रह रह कर लिखता भी रहा उनके बारे में...
           आज मदर्स डे पर और कुछ  कहने को नहीं है बस यही बात कि माँ मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ, लेकिन आपके प्यार के लिए हमेशा तरसता रहा... हैप्पी मदर्स डे.... 

Sunday, January 22, 2012

आज मदर्स डे नहीं है, फिर भी....

यही एक तस्वीर मिली जिसमे आपने मुझे पकड़ा हुआ है...
       माँ, पता नहीं क्यूँ आज आपकी बहुत याद आ रही है, मुझे पता है आपसे मिलकर भी आपसे कुछ नहीं बोलूँगा... लेकिन फिर भी बस आपको देखने का मन कर रहा है... मुझे यूँ टुकड़ों में बिखरता देखकर शायद एक बार, बस एक बार मुझे गले से लगा कर कह दो, कोई बात नहीं विक्रम.. सब ठीक हो जाएगा, मैं हूँ न... मुझे यूँ रात रात भर जागता देखकर शायद आपका दिल भी पिघल जाए, और अपनी गोद में सर रख कर मुझे सोने दो... मुझे तो याद भी नहीं आपकी गोद में सर रखकर पिछली बार कब सोया था, कभी सोया भी था या नहीं... जानता हूँ आप उन माओं की तरह नहीं जो अपने बच्चों से अपना प्यार जतलाती रहती हैं, लेकिन फिर भी... शायद मेरी उचटती नींद को मनाने के लिए एक बार, बस एक आखिरी बार मुझे फिर से उसी सुकून से सोने दो...
        मेरा बचपन तो बस यूँ देखते देखते ही गुज़र गया, याद है माँ, मैं हमेशा आपका आँचल पकड़े पकड़े चलता था, सब कहते थे मैडम इसको कब तक यूँ ही चिपका कर चलते रहिएगा... आखिर एक दिन आपने मुझसे अपना आँचल छुडवा ही लिया... मुझे आज भी याद है मैं उस दिन कितना रोया था, तब से आज तक बस रोता ही रहा हूँ... न जाने कितनी जगह वही सुकून, वही छावँ ढूँढता हूँ, लेकिन ऐसा कहीं हो सका है भला... यहाँ तो चारो तरफ बड़ी तेज धूप है, मेरा शरीर मेरी आत्मा सब कुछ झुलसी जा रही है...
      या खुदा तू इस फेसबुक से कुछ सीखता क्यूँ नहीं, देखो न ये कितने परिवर्तन लाता रहता है... और ये टाईम-लाईन  का ऑप्शन तो हमलोग को भी मिलना चाहिए... मुझे देखना है वो वक़्त जब माँ मुझे अपनी गोद में उठाए घूमती होगी, जब पापा की ऊँगली थामे मैंने चलना सीखा होगा... जब मेरे रोने की आवाज़ सुनकर सब मुझे दुलारने लगते होंगे... जब दुनिया की इन समझदारी भरी बातों से मेरा कोई वास्ता नहीं था, जब खुशियों का मतलब केवल माँ की वो मुस्कराहट थी...
       मुझे शिकायत है तुम्हारी ज़िन्दगी की इस बनावट से... इसमें बैक डोर से इंट्री का कोई ऑप्शन क्यूँ नहीं... ओ खुदा  तुमने "क्यूरियस केस ऑफ़ बेंजामिन बटन" नहीं देखी क्या ?? ऐसा ही कुछ संशोधन अपनी किताब में भी लाओ न... मैं भी यहाँ से रिवर्स में जीना चाहता हूँ... बस अब बहुत हुआ, अब और आगे नहीं जाना... मुझे फिर से माँ की वही गोद चाहिए, पापा के कंधे की सवारी और आस पास मेरा ख्याल रखने वालों की भीड़...
     
       माँ आपकी फेवरेट प्रार्थना याद है न आपको...
हम न सोचें हमें क्या मिला है,
हम ये सोचें किया क्या है अर्पण,
फूल खुशियों के बांटें सभी को,
सबका जीवन ही बन जाए मधुवन...
अपनी करुणा का जल तू बहाके,
कर दे पावन हर एक मन का कोना..
       ए भगवान् अगर सबको एक न एक दिन मरना ही है तो, मेरी एक आखिरी ख्वाईश कबूल कर लो न प्लीज.... माँ का आँचल पकडे ही मैं अपनी सांस की आखिरी गिरह खोलना चाहता हूँ...

Thursday, September 30, 2010

माँ...

आज के दिन हमारे बिहार में एक पर्व मनाया जाता है, " जीवित्पुत्रिका व्रत "..... आम भाषा में कहें तो "जिउतिया" | इस पर्व में माँ अपनी संतानों की मंगलकामना और लम्बी उम्र हेतु उपवास रखती है.... समय के अभाव में कुछ नया लिख नहीं पाया इसलिए दुनिया की हरेक माँ के चरणों में अपनी एक पुरानी कविता समर्पित कर रहा हूँ..... 
मेरी सारी दौलत , खोखले आदर्श,
नकली मुस्कराहट
सब छीनकर,
दो पल के लिए ही सही
मेरा बचपन लौटा देती है माँ...
कभी डाँटकर, कभी डपटकर
कभी माथे को सहलाकर,
अपने होने का एहसास दिलाती है माँ...
जब डरा सहमा सा,
रोता हूँ मैं
मेरे आंसू पोंछकर,
अपने आँचल में छुपा लेती है माँ...
जब रात्रिपहर में निद्रा से दूर
करवट बदलता रहता हूँ मैं,
अपनी गोद में सर रख कर
लोरी सुनाती  है माँ...
परेशान वो भी है अपनी ज़िन्दगी में बहुत,
पर हँसी के परदे के पीछे,
अपने सारे गम छुपा जाती है माँ .......

Tuesday, March 16, 2010

माँ...

मेरी सारी दौलत , खोखले आदर्श,
नकली मुस्कराहट
सब छीनकर,
दो पल के लिए ही सही
मेरा बचपन लौटा देती है माँ...
कभी डाँटकर, कभी डपटकर
कभी माथे को सहलाकर,
अपने होने का एहसास दिलाती है माँ...
जब डरा सहमा सा,
रोता हूँ मैं
मेरे आंसू पोंछकर,
अपने आँचल में छुपा लेती है माँ...
जब रात्रिपहर में निद्रा से दूर
करवट बदलता रहता हूँ मैं,
अपनी गोद में सर रख कर
लोरी सुनाती  है माँ...
परेशान वो भी है अपनी ज़िन्दगी में बहुत,
पर हँसी के परदे के पीछे,
अपने सारे गम छुपा जाती है माँ .......
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