Wednesday, September 21, 2022

मैं अब भी सोचता हूँ...

जानता हूँ, अब पहले की तरह न सोच पाऊंगा, न ही लिख पाऊंगा लेकिन टूटे-फूटे ख्यालात तो आते ही रहते हैं... 

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ठंड के वक़्त,
रज़ाई में दुबक कर
लिखी गयी कविताएँ
अक्सर गर्मियों में
पिघल जाया करती हैं…
 
इसलिए
मैंने लिखी हैं कुछ नज़्में
जिनके अंदर छिपी हैं
मेरे दिल की चिंगारियाँ…

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जब रात को बहुत तेज नींद आती है न, तो मैं चाय में चाँद घोर कर पी जाया करता हूँ…

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मैं चुपचाप हूँ,
इसलिए नहीं कि
कहने को कुछ नहीं,
बल्कि इसलिए कि
कुछ कहे-सुने
के दरम्यान
मेरी धड़कनें खो जाती है….

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इन दिनों ज़िंदगी में धूप बहुत ज्यादा है, सूरज को पीठ दिखाता हूँ तो सीने तक उसकी जलन महसूस होती है...

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लिखना कोई काम नहीं है, बस एक सफ़र है… उन रास्तों से गुजरने जैसा जहां बैठे बैठे मन कई ख़याल बुनता है…
कुछ ख़याल हवा हो जाते हैं, कुछ कुलाँचे भरते हुए दूसरों के मन को भी अपने साथ लिए चलते हैं… मेरे शब्दों के साथ चलने वालों का कारवाँ बहुत पुराना है… जो लोग मेरे साथ नए जुड़े हैं और मेरा लिखा नहीं पढ़ा कभी उन्हें ये किसी लतीफ़े से कम नहीं लगता…
 
मेरे मन के नुक्कड़ पर,
तुम भी तो लिखो कुछ नज़्में
जो मेरी पलकों के सिरे को
थामें और ले चलें कहीं और,
जहाँ चाँदनी हो, समंदर हो,
तितलियाँ हो, और हों मेरे सपने..
 
जाने क्यूँ,
उदास सा है मन,
बिना कुछ लिखे,
बिना कुछ पढ़े….

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मेरे बटुए में सबसे ज़्यादा
शनिवार के सिक्के हैं,
खनकते हैं और पुराना वक़्त
छितरा के गिर पड़ता है…
 
ये सिक्के बटोरते बटोरते
जाने कब मेरी ज़िंदगी
बुधवार हो गयी…

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सबने सोचा तो होगा कई बार न
कि काश पीछे जाकर
सही कर सकते कुछ चीज़ों को,
अब जब के पीछे नहीं जा सकते,

चलो आगे चलें…

Tuesday, April 13, 2021

एकालाप...

मैं अब लेखक नहीं रहा, शायद कभी था भी नहीं... बस एक इंसान की ज़िद थी जो मुझे इतने सालों तक लेखक बनाए रखा था.. अब जब मुझे पता नहीं कि वो मेरा लिखा पढ़ भी रहा है या नहीं तो लिखने का कारण समझ नहीं आता...

कहते हैं कि  हमेशा खुद के लिए लिखना चाहिए किसी और के लिए नहीं, लेकिन मेरे साथ ऐसा हो ही नहीं पा रहा, लगता है कि  अचानक से उसकी आवाज़ आए जो कहे कि  Wow  ! तुम दुनिया के सबसे बेहतरीन राइटर हो,  and I am so lucky that you write for me.

मुझे बेस्ट नहीं होना था, ऐसा कोई सपना नहीं था ये तो उसी का ख़्वाब था जो मैं इतने साल जीता रहा... 

अजीब है ना, मुझे उस वक्त लिखने में कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं थी तो लगातार लिखता रहा और अब जब मैं लिखना चाहता हूँ तो लिखने को कुछ समझ नहीं आता...

ये बहुत बड़ा राइटर ब्लॉक हो गया है, बस उम्मीद करता हूँ कि जल्द ख़त्म हो जाए.. घुटन सी होने लगी है, बिना मन के ग़ुबार को बाहर निकाले हुए... 

Saturday, January 16, 2021

पलायन...

"तुमने लिखना क्यों छोड़ दिया... "
"पता नहीं... शायद अब लिखने को कुछ बचा नहीं.... और अब मैं कुछ लिखना भी नहीं चाहता, अनजाने लोगों के दिल के तार छेड़ने के लिए इंसान कब तक लिख सकता है... पता है, मेरे पास पढ़ने वालों की कभी कमी नहीं रही.. लेकिन अब शायद वक़्त आ गया है कि ज़िन्दगी के इस परिवर्तन को स्वीकार कर लिया जाए... " 
"लेकिन तुम तो कहते थे कि लिखना कभी नहीं छूटना चाहिए, ये लाइफलाइन है...."
"हम्म्म्म... लाइफलाइन तो थी, लेकिन अब वो बेचैनी नहीं होती कुछ लिखने की... "
"फिर लेखक बनने का ख्वाब ?? "
"लेखक तो मैं आज भी हूँ, हमेशा रहूंगा... हाँ... एक किताब का क़र्ज़ है, वो लिखूंगा ज़रूर कभी जब लहरें शांत हो जाएँ आस-पास... और छोटा-मोटा तो लिखता ही रहूंगा, बस इस उम्मीद में कि वो पढ़कर कहीं कोई WOW कहके मुस्कुराते हुए ताली बजा रहा होगा... "
" ..... "
" और एक बात, अब मेरी लिखाई और फोटोग्राफी में वो पहले वाली बात नहीं रही,  बहुत कोशिश करने के बाद भी I am not able to create a masterpiece anymore... "
"पर, पलायन करना तो उपाय नहीं है ना..."
"पता है, कल ही एक फ़िल्म देख रहा था 'तृभंग', उसमें अरविन्दो कहता है कि जो हुआ वो होना निश्चित था, जो हो रहा है वो लिखा हुआ है और जो होने वाला है वो होकर ही रहेगा, तो वक्त को बेहतर करने की कोशिश ज़रूरी है लेकिन उसे जस के तस मान लेना पलायनवाद नहीं है... तो अगर और लिखना, अवश्यम्भावी होगा तो लिखूंगा ही..."

मैं इस बहते पानी के पन्ने पर,
लिखना चाहता हूँ, 
उसी तरह जैसे 
पहले हवाओं और ओस की बूँदों पर 
लिख दिया करता था... 
बेख़याली में भी लिखे शब्दों की 
क़समें खाकर 
आशिक़ आह भरा करते थे... 

पर मेरी कविताएं 
कमज़ोर हो गई हैं इन दिनों,
अब इन कविताओं के फेफड़ों में,
उन साँसों की खुशबू नहीं आती.... 

Monday, November 02, 2020

सपने...

सबकी ज़िंदगी के अपने अपने लक्ष्य होते हैं, आज के बदलाव भरे समय में अगर कोई एक बात है जो सबकी नींदें उड़ा रही है तो वो है नए तरह के सपने... 

पहले के सपने भी लोगों की सोच की तरह ही mediocre होते थे, साधारण सी ज़िंदगी के साधारण से सपने...

शायद मेरे भी ऐसे ही थे, मैं अकैडमिक्स में बहुत एवरेज रहा हमेशा, तो लगता था कुछ mediocre ही कर पाऊंगा... 2010 में engineering ख़त्म करने के बाद भी मुझे यही लगता था कि साधारण सी नौकरी चाहिए बस... 

फिर जब बैंगलोर आया तो सपने देखने सीखे, लगा कि अब तक कुएँ के मेढक की तरह जी रहा था, ऐसे इंसानों से मिला जो मेरे से उम्र में छोटे थे लेकिन अपने दम पर कुछ बड़ा करने का जज़्बा कहीं ज़्यादा था, महज़ 21-22 साल की उम्र में अपने सपने, अपने पैसे से पूरे करने की भूख... चाहे लड़का हो या लड़की. Infact लड़कियाँ ज़्यादा desperate थीं career और जॉब के लिए... CDAC का कोर्स चल ही रहा था फिर भी सब interview और exam देते ही रहते थे... 

मैंने तो नहीं दिया, लेकिन ऐसे कई interviews और exam का हिस्सा रहा... 

अजीब सुख था वो, एक इंसान जिसे किसी भी क़ीमत पर अपने दम पर कुछ करना था, उसका support system बनने का सुख... 

इस पूरे वक्त में मुझे लगने लगा था कि शायद समय का पहिया घूम चुका है, और अब कोई टाइम पास नहीं करना चाहता, workaholic होना ही ट्रेंड है.. 

अभी भी कुछ लोगों से मिलता हूँ तो अच्छा लगता है, उनका जज़्बा देखकर अच्छा लगता है.. अच्छा लगता है अगर कोई आगे बढ़े, अपने सपने खुद पूरे करे... लेकिन उसके लिए पहले सपने देखने पड़ते हैं... अगर सपने नहीं हैं तो उन्हें पूरा करने की भूख भी नहीं होगी...

Sunday, September 20, 2020

मैं अँधेरा लिखता हूँ...

मेरी ज़िन्दगी है 
सफ़ेद सफ़हे में लिपटे 
मेरे कुछ बेतरतीब हर्फ़, 

और मृत्यु
मेरी वो किताब है
जो कभी नहीं लिक्खी गयी... 

मैं बवंडर हूँ 
तबाही मचाता हूँ 
उड़ा ले जाता हूँ 
सबके घर, सबके सपने,

मैं वो अग्नि हूँ 
जिसे बुझाया नहीं जा सकता... 

मैं अँधेरा हूँ 
जिससे डरते हो तुम 
अकेले में,

मैं वो काली रात हूँ 
जिसकी कोई सुबह 
सुनिश्चित नहीं... 

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