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Friday, May 24, 2013

शौर्य क्या है ???

शौर्य क्या है?
थरथराती इस धरती को रौंदती फ़ौजियों की एक पलटन का शोर,
या सहमे से आसमान को चीरता हुआ बंदूकों की सलामी का शोर।

शौर्य क्या है?
हरी वर्दी पर चमकते हुए चंद पीतल के सितारे,
या सरहद का नाम देकर अनदेखी कुछ लकीरों की नुमाइश।

शौर्य क्या है?
दूर उड़ते खामोश परिंदे को गोलियों से भून देने का एहसास,
या शोलों की बरसात से पल भर में एक शहर को शमशान बना देने का एहसास।

शौर्य,
बहती बियास में किसी के गर्म खून का हौले से सुर्ख हो जाना,
या अनजानी किसी जन्नत की फ़िराक में पल पल का दोज़ख बनते जाना,
बारूदों से धुंधलाए इस आसमान में शौर्य क्या है?

वादियों में गूंजते किसी गाँव के मातम में शौर्य क्या है?
शौर्य,
शायद एक हौसला शायद एक हिम्मत हमारे बहुत अंदर,
मज़हब के बनाए नारे को तोड़ कर किसी का हाथ थाम लेने की हिम्मत,
गोलियों के बेतहाशा शोर को अपनी खामोशी से चुनौती दे पाने की हिम्मत,
मरती मारती इस दुनिया में निहत्थे डटे रहने की हिम्मत।

शौर्य,
आने वाले कल की खातिर अपने हिस्से की कायनात को आज बचा लेने की हिम्मत।

शौर्य क्या है?

------------------------------------------------------------------------ जावेद अख्तर (फिल्म-शौर्य )

Saturday, March 23, 2013

आखिरी ख़त उस दीवाने का...

                                                                                                                             22 मार्च 1931
साथियो,
   स्वाभाविक है कि जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे  नहीं चाहता । लेकिन मैं एक शर्त पर जिन्दा रह सकता हूँ कि  मैं कैद होकर या  पाबन्द होकर जीना नहीं चाहता ।
   मेरा नाम हिन्दुस्तानी क्रान्ति का प्रतीक बन चुका  है और क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊंचा उठा दिया है-- इतना ऊंचा कि  जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊंचा मैं हरगिज़ नहीं हो सकता ।
   आज मेरी कमजोरियाँ जनता के सामने नहीं हैं ... अगर मैं फाँसी  से बच गया तो वे जाहिर हो जाएँगी और क्रान्ति का प्रतीक चिन्ह मद्धिम पड़  जाएगा या संभवतः मिट भी जाए .. लेकिन दिलेराना ढंग से हँसते-हँसते मेरे फांसी चढ़ने की सूरत में हिन्दुस्तानी माताएं अपने बच्चों के भगत सिंह बन्ने की आरज़ू किया करेंगी और देश की आजादी के लिए कुर्बानी देनेवालों की तादाद इतनी बढ़ जायेगी कि  क्रान्ति को रोकना साम्राज्यवाद या शैतानी शक्तियों के बूते की बात नहीं रह जायेगी ।
   हाँ, एक विचार आज भी मेरे  में आता है कि  देश और मानवता के लिए जो कुछ करने की हसरतें मेरे दिल में थीं, उसका हजारवां भाग भी पूरा नहीं कर सका .. अगर स्वतंत्र, जिंदा रह सकता तब शायद इन्हें पूरा करने का अवसर मिलता और मैं अपनी हसरतें पूरी कर सकता ।
   इसके सिवाय मेरे मन में कभी कोई लालच  फाँसी  से बचे रहने का नहीं आया .. मुझसे अधिक सौभायशाली कौन होगा ? आजकल मुझे स्वयं पर बहुत गर्व है ... अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतज़ार है .. कामना यह की ये और नज़दीक हो जाए

                                                                                                                              आपका साथी,
                                                                                                                              भगत सिंह ...

उसे यह फ़िक्र है हरदम नया तर्ज़े-जफ़ा क्या है,
हमें ये शौक है देखे सितम की इंतहा क्या है।

दहर से क्यूँ ख़फा  रहें, चर्ख़ का क्यूँ गिला करें,
सारा जहां अदू सही, आओ मुकाबला करें ।

कोई दम का मेहमाँ हूँ ए अहले-महफ़िल,
चराग़े-सहर हूँ बुझा चाहता हूँ ।

हवा में रहेगी मेरे ख़याल  की बिजली,
ये मुश्ते-ख़ाक है फानी, रहे रहे न रहे ।

                                                       अच्छा रुखसत, खुश रहो अहले-वतन; हम तो सफ़र करते हैं ...

Thursday, May 24, 2012

आखिर आज का युवा कैरियर के तौर पर राजनीति को क्यूँ नहीं देखता...

           आज कल बेरोजगारी अपने चरम पर है, हर किसी के हाथों में डिग्री है, इंजीनियरिंग से कम में तो कोई बात ही नहीं करता... लेकिन नौकरी ... उसके लिए तो गज़ब की मारामारी चल रही है... ऐसी कोई डिग्री, ऐसा कोई कोर्स नहीं जहाँ नौकरी की गारंटी मिलती हो.... ऐसे में सब अपने कैरियर के चुनाव में पेशोपेश में रहते हैं... स्कूल के समय से ही विद्यार्थियों पर दवाब बन जाता है ताकि वो अपना कैरियर चुनकर उसपर अपना 100 परसेंट दे सकें... तरह तरह के इन अवसरों को तलाश करते युवा गलती से भी कभी राजनीति में आने का नहीं सोचते... आखिर ऐसा क्या है जो उन्हें इस तरफ आने से रोक देता है, जबकि राजनीति के बारे में बातें सभी करते हैं... हर दूसरा आदमी कभी किसी नेता को, अफसर को, सिस्टम को गाली देता हुआ मिल जाएगा... राजनीति को सभी गन्दा कहते हैं लेकिन कोई भी उसमे उतर कर उसको साफ़ नहीं करना चाहता... सभी कहते हैं कि फलाना नेता क्रिमिनल है उसकी छवि साफ़ सुथरी नहीं है... अब जब देश के पढ़े लिखे और जागरूक लोग उधर का रुख ही नहीं करेंगे तो ऐसे लोग आपके प्रतिनिधि बनकर देश चलाएंगे न...
            सब बस कोई ठीक ठाक सी नौकरी चाहते हैं, ठीक ठाक सी कमाई हो जाए, शाम को आराम से ऑफिस से लौटें और अपने परिवार के साथ सुकून के दो पल बिताएं... और इसमें कोई बुराई भी तो नहीं है, आखिर अपनी सुविधा कौन नहीं देखता... अब इस बात पर कुछ लोग ये कहते मिल जायेंगे कि भाई साहब हम तो अपनी अपनी जगह पर रहकर भी देश सेवा कर सकते हैं तो फिर राजनीति में उतरने की ज़रुरत क्या है... लेकिन ये सिर्फ अपने बचाव के लिए एक वक्तव्य मात्र है... ये हम सभी जानते हैं कि हम राजनीति में नहीं जाना चाहते चाहे जो भी कारण हो और न ही कोई माता-पिता चाहते हैं कि उनका बेटा या बेटी बड़े होकर कोई नेता बने... अगर कोई युवा इस तरफ अपनी रुचि दिखाए भी तो उसे अपने परिवार में घोर विरोध का सामना करना पड़ेगा...
            खैर कारण चाहे जो भी हो, सच यही है कि मेरा भी राजनीति में जाने का कोई इरादा नहीं है... बस इस तरफ थोडा ध्यान दिलाना चाहता था सबका, ताकि अगर किसी के मन में ज़रा भी पेशोपेश हो तो बेधड़क राजनीति का रुख करें.. इस देश को सच में पढ़े लिखे और जागरूक नेताओं की ज़रुरत है...

Monday, November 22, 2010

यह हैं देश के सच्चे सपूत और आप इन्हें ही नहीं पहचान पाए ....

               आईये आपको मिलवाते हैं इस महान व्यक्तित्व से जिसने महज २५ साल की उम्र में इस देश के लिए अपनी जान दे दी |


              नाम तो पढ़ ही लिया होगा आपने इनकी वर्दी पर, जी हाँ ये हैं स्व० कैप्टन विक्रम बत्रा | कारगिल युद्ध के हीरो रहे विक्रम बत्रा को उनके दोस्त उन्हें उनकी बहादुरी के कारण शेर शाह बुलाते थे | ९ सितम्बर १९७४ को हिमाचल प्रदेश के एक छोटे से गाँव घुग्गर में जन्मे और १९९६ में देहरादून के इंडियन मिलिट्री अकादमी से सेना में पदार्पण किया |  १९९९ में जब कारगिल में जंग शुरू हुई तो इन्हें १३ जम्मू एंड कश्मीर रायफल्स की कमान सौंपी गयी | अपने साथियों के साथ मिलकर इन्होने बहुत ही वीरता से अपने कर्तव्य का निर्वहन किया, हालाँकि इस दौरान वो काफी घायल हो गए | फिर भी उन्होंने अपने साथी कैप्टेन अनुज नायर के साथ मिलकर ५ चोटियों पर कब्ज़ा जमाया | लेकिन ७ जुलाई १९९९ की सुबह अपने एक साथी लेफ्टिनेंट नवीन की जान बचाते बचाते शहीद हो गए.......
              उन्होंने ले० नवीन को ये कहकर पीछे धकेल दिया " तू बाल बच्चेदार है!! हट जा पीछे, मेरी तो अभी शादी भी नहीं हुई है |"   और दुश्मनों की गोलियों ने उनके सीने को छलनी कर दिया | उनके आखिरी शब्द थे "  जय माता दी....."
              १५ अगस्त १९९९ को उन्हें मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च सैनिक सम्मान परमवीर चक्र दिया गया | 
मेरी तरफ से इस शहीद और उन तमाम शहीदों को जिन्होंने इस देश के लिए अपनी जान दे दी , शत शत नमन.....
               ये लेख लिखते लिखते मन भारी भारी सा हो गया है |
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