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Wednesday, November 04, 2015

किस्सा कुर्सी का और असमंजस वोटर का...

एक तरफ वो गठबंधन है जिसने अब तक मुखमंत्री तक डिक्लेयर नहीं किया है, जीत जाने के बाद आपस में ही मार काट मचने वाली है... बिना अच्छे नेतृत्व के बिहार को चलाना और आगे बढ़ाना, भैंस के ऊपर गीत गाने जैसा है... केवल मोदी के हवाई जुमलों के नाम पर यहाँ वोटर उनको वोट दे देगा ऐसी गलतफहमी तो उनको नहीं ही पालनी चाहिए.... महा प्रधान खुले आम अपनी जाति बघारते हुये और आरक्षण बढ़ाने की बात कर रहे हैं, उस आरक्षण के लिए उनके हिसाब से वो अपनी जान की बाज़ी लगा देंगे, हालांकि जाति प्रथा के ऊपर एक लाइन भी कहीं बोलते नहीं दिखे... ज़ाहिर हैं उनको जाति प्रथा बनाए रखनी है तभी तो आरक्षण की रोटी सिकेगी...
दूसरी तरफ महागठबंधन है, जिसके साथ ऐसे लोग खड़े हैं जिनका भूतकाल खंगाला जाये तो आपके दिमाग का बफर खत्म हो जाएगा लेकिन काले कारनामे खत्म नहीं होंगे... व्यापारी और शिक्षित वर्ग वो #गुंडाराज अब तक नहीं भूला होगा...

कई लोगों का कहना है मुख्यमंत्री तो नितीश होने हैं फिर क्या तकलीफ है, तकलीफ ये हैं कि नितीश कितना भी अच्छा बोलते हों(करते भी हों) लेकिन दोनों जेब में दो छुरी लेकर वोट मांगने आए हैं....

परेशानी ये भी है कि कोई भी बिहार का विकास नहीं करना चाहता, उनको पता है जैसे जैसे यहाँ के लोगों को बाकी दुनिया की पटरी से जोड़ने लगेंगे, यहाँ उनकी जाति वाली राजनीति दम तोड़ने लगेगी... इतना तो निश्चित है 80 प्रतिशत वोट तो इस बार भी जाति के आधार पर ही पड़ेंगे...

बिहार से जुड़े हजारों मुद्दों को छोडकर आजकल तंत्र-मंत्र-ज्योतिष पर जुमले फेकने का दौर है, जैसे हमारे पास और कुछ नहीं बचा हो बात करने को...

बिहार का वोटर असमंजस में है... पिछली कई सालों से लालू को एक सिरे से हटाने के कोशिश करने वाली भीड़ इस बार लालू(महागठबंधन) को ही वोट करेगी....

इन सब असमंजस से अलग मैं जा रहा हूँ कल वोट देने, जो भी मेरी नज़र में सबसे अच्छा और शिक्षित उम्मीदवार है चाहे वो निर्दलीय ही क्यूँ न हो... वोट तो डालना ही पड़ेगा, कीमती है मेरा वोट...

Tuesday, June 02, 2015

हमको कुछ नहीं आता है पर गाय हमारी माता है...

साहब- गाय हिंदुओं की माता होती है इसलिए हमें उसका सम्मान करना चाहिए, उसकी पूजा करनी चाहिए...

मैं-अच्छा साहब गाय कब से हमारी माता है, मतलब किसी वेद में किसी ग्रंथ में, कहीं ऐसा उद्धरण जहां से पता चले कि अगर हम गाय को माता न माने तो हम हिन्दू ही नहीं हैं... 

साहब- सब कुछ उद्धरित हो ये ज़रूरी तो नहीं, गाय हमारी माता है तो है, हमें उसका सम्मान करना चाहिए..... 

मैं- बराबर कह रहे हैं साहब, लेकिन फिर हम पिता, चाचा, मामा का सम्मान क्यूँ नहीं करते.... 

साहब(गुस्से में)- तुम हिन्दू हो या नहीं तुम्हें अपनी संस्कृति का मज़ाक बनाते शर्म नहीं आती....

मैं- माफ कर दीजिये सर, गलती हो गयी... अच्छा हम जो ये बेल्ट, पर्स, जूते पहनते हैं वो भी तो हमारी माँ की ही चमड़ी से बनता है, हम ये सब उपयोग क्यूँ करते हैं... आपके जूते भी तो उसके ही लग रहे हैं... 

साहब- --------------------

मैं- हमें तो ये सब रोक देना चाहिए.... 

साहब- हाँ क्यूँ नहीं हम ये सब बैन कर देंगे... 

मैं- क्या निर्यात भी बंद कर देंगे ???

साहब- ---------------------

मैं- अच्छा, जब हमारी माता सड़क किनारे कचरे में से पोलिथीन बीन कर खाती रहती है तब आप क्या करते हैं....

साहब- -------------------

मैं- अच्छा साहब, ये सब छोड़िए.... ये बताइये जो आपको असली माँ है जिसने आपको जन्म दिया है, दिन भर में कितने घंटे आप उसकी सेवा करते हैं.... 

साहब- -------------------

Tuesday, September 24, 2013

देह के खरीददार...

सूरज धीरे-धीरे अपने गंतव्य की तरफ बढ़ रहा है... हम भी धीरे थके क़दमों से उस तरफ बढ़ रहे हैं, जिधर से चांदनी भी बच कर निकल लेना चाहती है... ये वो बदनाम रास्ते हैं जिसके उसपार भी जीवन बसता है... खिडकियों और अधखुले दरवाजों के पीछे से कई सूनी आखें नज़र आती हैं... उन खिडकियों और दरवाजों की भी ज़रुरत बस इतनी है कि वहां से इशारे देकर खरीददारों को बुलाया जा सके... मिलता होगा सुकून यहाँ आकर कई लोगों को भी, जाने कैसे होंगे वो लोग जिनकी जवानियाँ मचलती होंगी ये देखकर, लेकिन ये नज़ारा मुझे तो जैसे टूटा खंडहर कर गया.. भले ही इन स्याह गलियों की रातें रंगीन होती हों लेकिन ये रंग मेरे अन्दर की सफेदी को तार तार कर गया... मुझे वो अधनंगा जिस्म कीचड़ में लिपटा जान पड़ता है...

ऐसे मंज़र देखकर किसी का भी दिल छलनी हो जाये... वो कहते हैं सरकार इनकी हालत में बेहतरी के लिए कई योजनायें चलाती रहती है.... और फिर हम NGO वाले भी हैं ही... साफ सफाई के तरीके समझाकर और दवाई-कंडोम बांटकर जितना हो सके हम मदद करने की कोशिश कर रहे हैं... मैंने उनसे पूछा अगर इनके हाल की इतनी ही फिकर है सरकार को, तो इस धंधे को बंद क्यूँ नहीं करवा देती... उनके चेहरे पर खामोशी की एक शिकन उभर आई, कंडोम के पैकेट समेटते हुये बमुश्किल अपनी गंभीरता को मोड़ते हुये उन्होने कहा, सरकार ये नहीं करा सकती... उसके बस में कुछ नहीं...आखिर समाज को सभ्य बनाए रखने के लिए वेश्या का होना ज़रूरी है... मैं निरुत्तर था, भले ही शायद मेरी उस उम्र की समझ के हिसाब से ये कोई दार्शनिक जवाब था, लेकिन मैं इसके पीछे इंसानी चमड़ी के अंदर छुपे भूखे भेड़ियों का स्वार्थ ज़रूर देख पा रहा था... वेश्या !!! एक ऐसा शब्द जिसको सुन कर सभी की नाक-भों सिकुड़ जाती हैं... एक घृणित नज़र, एक गंदी सोच, चलो कुछ संवेदनशील इंसान भी रहा तो कुछ पवित्र तो नहीं ही सोच पाता होगा....

खैर, हम कंडोम और दवाइयों का पैकेट उठाकर दूसरे कोठे की तरफ बढ़ गए... दरवाजे पे ही एक लड़की थी...  देखने से करीब 21-22 के आस पास...हमने उसे कुछ दवाइयाँ और कंडोम के कुछ पैकेट दिये... उसने कहा वो तो हर रोज़ दवाइयाँ खाती है... 
"कौन सी.... " 
वो अंदर गयी और एक दवाई की स्ट्रिप ले आई उठाकर...
"ORADEXON.... "' 
"ये कौन सी दवाई है ???"
"वो मेरे को नहीं पता, आंटी ये पैकेट देकर जाती है तो मैं खा लेती है... एक साल से खा रही है मैं .... "
मेरे एक साथी ने वहीं मोबाइल में गूगल पर सर्च करके जब दिखाया तो शरीर कांप गया था मेरा... हमने तुरंत पूछा...
"उम्र क्या है तुम्हारी ????"
"वो पता नहीं है मेरे को, लेकिन सब कहते हैं जभी "दिलवाले दुलहनियाँ ले जाएँगे..." आई थी न, तभी मुझे भी कोई छोड़ गया था इधर... " 
DDLJ मतलब 1995, यानि कि महज 14 साल... 
पता चला यहाँ कई लड़कियां 13-14 साल की उम्र से ही ये टैबलेट लेती हैं, इस टैबलेट की सप्लाई बांग्लादेश से आती है शायद...  
दरअसल ये टैबलेट कम उम्र की लड़कियों को भरा-पूरा बनाने के लिए यूज किया जाता है... जिससे वो लड़कियां बड़ी दिखने लगें... गोश्त बढ़ाने के लिए ताकि उन भेड़ियों को पसंद आए... उनकी सेहत के साथ इतना भद्दा खिलवाड़ उनके लिए जिनको सभ्य बनाए रखने की बात कुछ देर पहले मेरे साथी कर रहे थे...
"मुझे नहीं पता किस तरह के लोग वेश्याओं के पास क्या तलाशने जाते हैं, संवेदनहीनता की इंतिहा ही है ये... " और वो कहते हैं सभ्य बनाने के लिए... क्या उन लोगों को खुद के चेहरे पर थूक के छींटे महसूस नहीं होते.... मुझे तो कभी-कभी इंसान होने पर भी जिल्लत महसूस होती है...   

Wednesday, August 28, 2013

उम्र की सांझ का, बीहड़ अकेलापन और एक फिल्म "Listen...Amaya"

बीती रात एक फिल्म देखी, "Listen... Amaya"... काफी दिनों से इस फिल्म को देखने का सोच रहा था... फारूक शेख और दीप्ति नवल के जानदार अभिनय ने गज़ब का मैजिक क्रियेट किया है... स्वरा भास्कर ने अमाया के किरदार को इतना बेहतरीन निभाया है कि उस किरदार में उसकी जगह और किसी को सोच भी नहीं सका... वो अच्छी फिल्मों के प्रोजेक्ट्स ले रही हैं जिससे उनका फिल्मों और रोल्स का चयन भी प्रभावित करता है... फिल्म का निर्देशन लाजवाब है, छोटे-छोटे दृश्यों को भी प्रभावशाली बनाया गया है.. लेकिन इन सारी बातों से अलग जिस चीज ने सबसे ज्यादा सोचने पर मजबूर किया वो थी इसकी कहानी, इस फिल्म की कहानी कई हद तक राजेश खन्ना और स्मिता पाटिल की फिल्म अमृत की याद दिलाती है... 

इस फिल्म को देखकर लगातार ये सोचता रहा कि अगर मैं अमाया की जगह होता तो क्या करता, क्या हमारा समाज इतना परिपक्व हो गया है कि इस तरह की परिस्थिति के अनुरूप खुद को ढाल सके... जब एक युवा अपनी मर्ज़ी से विवाह का फैसला करता है तब यही समाज और यही माता-पिता उसपर न जाने कितने दवाब डालते हैं... आज भी छोटे शहरों में प्रेम-विवाह, अंतरजातीय विवाह, या फिर लिव-इन रिलेशनशिप को स्वीकार नहीं किया गया है... फिर कैसे ये समाज किसी बुजुर्ग को वही काम करने की आजादी दे देगा...  जब कभी बच्चे ऐसा कोई सम्बन्ध निबाहने की इच्छा रखते हैं तो उन्हें समाज की दुहाई दी जाती है, फिर कैसे वो बच्चे अपने माता/पिता के ऐसे किसी सम्बन्ध को लेकर उसी समाज से नज़रें मिला पायेंगे... 

अक्सर सांझ बहुत सुहावनी होती है, लेकिन कभी-कभी अकेलापन इसी संध्या को बोझल बना देता है.. और अगर वो जीवन संध्या हो तो ? एक इंसान अपनी ज़िन्दगी में कई सारे नुक्कड़ों से होकर गुज़रता है... कई सारे संघर्षों और ज़द्दोज़हद से लड़ता हुआ, अडिग अपने कर्म करता जाता है... लेकिन जब वो ज़िन्दगी के आखिरी नुक्कड़ की और जाने वाली सड़क पर होता है तो उसके पग भी हलके-हलके कांपते ज़रूर हैं... घर-परिवार-नौकरी की सभी जिम्मेदारियों से मुक्त हो चुका वो इंसान इस दौड़ती-भागती दुनिया को अपने पैरों की कम्पन नहीं दिखाना चाहता... अधिकतर बच्चे भी नौकरी की भागादौड़ी में दूसरे शहर चले जाते हैं... कई बार तन से बूढा हुए बिना ही इंसान मन से बूढा हो जाता है... जब इस बार घर गया था तब बातों ही बातों में माँ-पापा का दर्द महसूस कर पाया, माँ ने कहा आजकल पैसे तो सभी के पास हैं लेकिन समय किसी के पास नहीं... ऐसे में बस उसके साथ उनका हमसफ़र ही होता है जो बिना बताये सब समझ लेता है...

लेकिन ऐसे में, अगर एक हमसफ़र ही पीछे छूट गया तो... हम शायद उस अकेलेपन की कल्पना भी नहीं कर सकते... उनकी ज़िन्दगी कैसी बेरौनक हो जाती है... लगभग इसी तरह के विषय पर रश्मि दी की कुछ पोस्ट्स पढ़ी थीं, उस समय तो यूँ ही पढ़ गया था लेकिन जब ऐसी घटनाएं विजुअल्स में कन्वर्ट हो जाती हैं तो दिमाग सोचने पर मजबूर हो ही जाता है... अब बात ये है कि क्या इस उम्र में विवाह करना उचित है, सामजिक वर्जनाओं के अलावा भी कई बातें हैं जो परेशानियां पैदा कर सकती हैं, मसलन संपत्ति का बटवारा हो या फिर परिवार में आये इस बदलाव के साथ सामंजस्य... ऐसे में रश्मि दी ही एक और सुझाव लेकर आती हैं, वो है लिव-इन रिलेशनशिप, लेकिन बात फिर वहीँ आकर अटक जाती है कि क्या हमारा परिवार और समाज इसे स्वीकार कर पायेगा...

लेकिन जिन्होंने कभी हमारे लडखडाते हुए से क़दमों को रास्ते नापने की समझ सिखाई, क्या हम उन्हें इतनी सी आजादी भी नहीं दे सकते कि अगर वो चाहें तो उम्र के उस आखिरी नुक्कड़ तक जाने वाली सड़क पर वो भी किसी का हाथ थाम सकें और ऐसी किसी परिस्थिति में अगर कोई बुजुर्ग ऐसा निर्णय लेते हैं तो हम भी पूरे सम्मान के साथ इसे स्वीकार सकें...

खैर, इस फिल्म के बारे में ज्यादा कुछ नहीं लिख सका, लेकिन अगर आप अपनी व्यस्त ज़िन्दगी से दो घंटे निकाल कर इस फिल्म को देख सकें तो ज़रूर देखें और सोचें कहीं हम उन्हें किसी ख़ुशी से वंचित तो नहीं कर रहे हैं... फिल्म DVD और यू ट्यूब दोनों पर उपलब्ध है...

Sunday, March 17, 2013

जीवन झांकता है...

नवम्बर की सर्दी कुछ ख़ास नहीं और यहाँ कोलकाता में तो बिलकुल भी नहीं... सुबह के ९ बज रहे हैं, यूँ ही भटकने निकल पड़ा हूँ, बाकी के साथी आगे निकल चुके हैं... मुझे तेज़ चलने का कोई मोह नहीं... सड़क के किनारे कई टूटी-फूटी झोपड़ियां जैसे एक-दूसरे के ऊपर गिरने वाली हों... एक तरफ जहाँ हम 2BHK-3BHK की दौड़ में लगे हैं वहीँ एक 10 बाय 8 के कपडे के टेंटनुमा मकान में एक पूरा परिवार खुद को समेटने की कोशिश कर रहा है... साथ ही कोने में रखी माँ दुर्गा की मूर्ति इस बात का भी एहसास दिलाती है कि उन्हें अब भी भरोसा है उस शक्ति पर... मेरे अन्दर काफी देर तक एक सन्नाटा छा जाता है.. इन स्लम के खंडहरों के नेपथ्य में दिखता एक अन्डर कंस्ट्रक्शन एपार्टमेंट मुझपर थूकता हुआ जान पड़ता है...

किसी फुटपाथ पर
सड़क के किनारे बनी
कई झोपड़ियों के 
चूल्हे पर चढ़े
खाली हांडियों से, 
उन काली-मटमैली
काया पर लिपटे
फटे हुए चीथड़ों से,
वो मिटटी के फर्श पर
लेटा हुआ लाचार
जीवन झांकता है...

सूरज धीरे-धीरे अपने गंतव्य की तरफ बढ़ रहा है... हम भी धीरे थके क़दमों से उस तरफ बढ़ रहे हैं, जिधर से चांदनी भी बच कर निकल लेना चाहती है... ये वो बदनाम रास्ते हैं जिसके उसपार भी जीवन बसता है... खिडकियों और अधखुले दरवाजों के पीछे से कई सूनी आखें नज़र आती हैं... उन खिडकियों और दरवाजों की भी ज़रुरत बस इतनी है कि वहां से इशारे देकर खरीददारों को बुलाया जा सके... मिलता होगा सुकून यहाँ आकर कई लोगों को भी, जाने कैसे होंगे वो लोग जिनकी जवानियाँ मचलती होंगी ये देखकर, लेकिन ये नज़ारा मुझे तो जैसे टूटा खंडहर कर गया.. भले ही इन स्याह गलियों की रातें रंगीन होती हों लेकिन ये रंग मेरे अन्दर की सफेदी को तार तार कर गया... मुझे वो अधनंगा जिस्म कीचड़ में लिपटा जान पड़ता है... कहते हैं समाज को सभ्य बनाए रखने के लिए वेश्या का होना ज़रूरी है... जाने ये कैसी सफाई है जिसे बनाये रखने के लिए हर रात कई औरतें और लडकियां किसी अनजान भेड़िये का खाना बनती हैं... मैं फिर से अपने चेहरे पर थूक के कुछ छीटे महसूस करता हूँ...

लाल-नीली-पीली
चकमकाती बत्तियों के पीछे
उन अधखुली खिडकियों से
कुछ इशारे बुलाते
नज़र आते हैं,
सब देखते हैं
ललचाई आखों से
उन चिलमनों के पीछे
अधनंगे मांस की तरफ...
उन रंगीन कहे जाने वाले
रंडियों के कोठे से
एक नंगा-बेबस
जीवन झांकता है...

Tuesday, January 08, 2013

सिर्फ तन का भक्षण ही नहीं बल्कि मन का भक्षण भी बलात्कार है...


वो अजीब सा दिन था... उस दिन सिर्फ तुम्हारे कपडे ही नहीं बल्कि साथ ही साथ मेरा ज़मीर भी चीथड़े-चीथड़े होकर बिखर गया... काफी देर तक अपने शरीर से आती हुयी पुरुषत्व की बदबू महसूस की थी मैंने, खुद के ऊपर लज्जा आ रही थी, खुद के पुरुष होने पर ही तो.... वैसे भी अब ऐसा बचा ही क्या है एक पुरुष के पास जिसपर वो गर्व कर सके... उसके बाद न ही मैं कुछ सोच सका और न ही कुछ लिख ही सका.. ऐसा लगा जैसे अपने अन्दर का ये ज़ख्म मुझे खोखला कर चुका है.. ज़ख्म बढ़ता रहा, और आज जब इस ज़ख्म का मवाद इतना कचोट रहा है तो कुछ यूँ ही, जिससे शायद मन शांत हो सके...
ऐसा पाखंडी है ये तत्वहीन समाज, एक तरफ औरत को जननी कह कर पूजता है और एक तरफ, उसके जननांग से अपनी कभी न ख़त्म होने वाली भूख मिटाने को आतुर रहता है... सारे लोग, सारी भीड़ उन 6 लोगों को सजा देने की मांग कर रहे हैं... पर केवल उन्हें ही क्यों, उन्होंने ऐसा क्या अलग कर दिया जो हम नहीं करते, हमारा ये कथित बुद्धिजीवी समाज नहीं करता... बलात्कार तो सभी करते हैं, हमारा समाज करता है... फर्क इतना है कि उस दिन उसके शरीर के साथ हुआ और ऐसे आये दिन उसके वजूद, उसके अस्तित्व के साथ बलात्कार होता है...
बलात्कार पर कोई भी बहस करने से पहले क्या किसी ने जाना है कि इसका अर्थ क्या होता है.. मैंने जानने की कोशिश की, कि आखिर बलात्कार का अर्थ क्या है...
  1. बलात् या हठपूर्वक कोई काम करना...
  2. विशेषतः किसी या दूसरों की इच्छा के विरुद्ध कोई काम करना...
  3. पुरुष द्वारा किसी स्त्री की इच्छा के विरुद्ध बलपूर्वक धमकाकर या छलपूर्वक किया जानेवाला संभोग...
तीसरे अर्थ पर आने से पहले ही मैं शुरू के दो अर्थों पर ही अटक गया... मुझे लगा एक लड़की के साथ जाने कितनी बार बलात्कार होता होगा... मेरी नज़र में हर वो माता-पिता बलात्कारी हैं जो अपनी बेटी को कोख में ही मार देते हैं... क्यूँ ??
बचपन के 4-5 साल बीतने के साथ ही उसे तरह तरह की बातें सिखाई जाती हैं, उसे ये नहीं करना चाहिए, उसे ऐसा नहीं पहनना चाहिए, उसे किससे बात करनी है किससे नहीं... शाम को देर से नहीं निकलना और भी पता  नहीं क्या क्या ???  यहाँ तक कि उसे अपनी मनपसंद की पढाई करने की भी इजाज़त नहीं मिल पाती हमारे कथित 21वीं सदी के कई शिक्षित माता-पिताओं से... अगर किसी को ये लग रहा हो कि ये अब गुज़रे ज़माने कि बात है तो मैं अभी के अभी 10 परिवार अपने आस पास के गिना सकता हूँ जहाँ का बेटा किसी महंगे कॉन्वेंट पढता है और बेटी किसी छोटे अंग्रेजी स्कूल में, दलील ये कि वो किसी एक की ही फीस भर पाने में सक्षम हैं... जब तक एक लड़की इस दुनिया को समझ पाने के लायक बनती है तब तक उसके साथ कई-कई बार बलात्कार हो चुका होता है... बलात्कार उसके सपनों का, उसकी इच्छाओं का उसके अरमानों का...
आपको क्या लगता है वो 6 लोग कहीं आसमान से टपके हैं, जो हम सब पूरा झंडा ऊंचा करके उनकी फांसी की मांग करने में लग गए.. अरे वो यहीं से हैं आपके आस पास.. कहीं न कहीं हमारे अन्दर... सड़क पर किसी लड़की के साथ चल कर देखिये... सड़कों किनारे खड़े कई लोग आँखों से बलात्कार करते नज़र आयेंगे... ऐसे घूरेंगे जैसे अभी 5 मिनट के लिए दुनिया पॉज हो जाए तो बस... उन भूखी, लार टपकाती हुयी नज़रों के खिलाफ क्या कोई कानून बनाया जा सकता है... ?? उन्हीं 100 घूरते लोगों में से 1 किसी दिन इतना गिर जाता है जो ऐसा कुकृत्य करता है... लेकिन मेरे हिसाब से दोषी वो 1 नहीं पूरे 100 हैं.. सब के सब बलात्कारी हैं, मानसिक बलात्कारी.. जो बार बार एक लड़की के वजूद पर चोट करते हैं.. उस लड़की को सड़क पर नज़र झुका कर चलने पर मजबूर करते हैं जैसे उसने घर से निकल कर कोई गुनाह कर दिया हो...
हम काँटों के झाड़ को दोष दे रहे हैं, उसको ख़त्म करने की बात कर रहे हैं, लेकिन क्या आपको नहीं लगता इस झाड़ के फैलने से पहले ही उसे काट दें, बलात्कार का मतलब केवल सम्भोग करना ही नहीं है वो हर काम है जो किसी लड़की की मर्ज़ी जाने बिना या उसकी मर्ज़ी के खिलाफ किया जाए... सिर्फ तन का भक्षण करना ही नहीं बल्कि मन का भक्षण भी बलात्कार है...

Saturday, December 29, 2012

मुझे माफ़ करना कि मैं खुश हूँ तुम्हारे चले जाने से...

पिछले बारह दिन अजीब से थे, दुःख अफ़सोस, गुस्सा... बस यूँ ही लिखता रहा फेसबुक पर, कुछ शब्दों को यहाँ सहेज कर रख ले रहा हूँ ताकि ताउम्र याद रहे ये आज का काला शनिवार....

Many a times i feel ashamed of being a male... shame Delhi, shame on us... 
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इससे तो बेहतर यही है कि लडकियां पैदा होने से पहले ही मार दी जाएँ...

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हम ऐसे देश में रह रहे हैं जहाँ हर २२ मिनट में एक रेप होता है... हम चाहें तो इस बात पर भी गर्व कर सकते हैं....

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जब कोई जानवर वहशी बन जाए तो उसे जल्द से जल्द मार देने में ही समाज की भलाई है... आने वाली जानवरों की नस्लें जब तक भय न खाने लगें, तब तक Shoot-At-Sight का ऑर्डर दे दिया जाए इन जानवरों को देखते ही...
Disclaimer :- इंसान एक दोपाया जानवर है... :-/

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We are born to fight.. keep fighting, and we will win one day 4 sure... #She is not a VICTIM, She is a FIGHTER...

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सप्ताह बदल गया है, लोगों के स्टेटस भी... कहीं दबंग २ की चर्चा है, कहीं मोदी की जयकार और कहीं आज का ट्वेंटी-ट्वेंटी.... कोई कहता है वीकेंड पर क्या कर रहे हो... और कई लोग वीकेंड मनाने के लिए अद्धा-पौआ का इंतजाम करने में लग गए हैं... आगे सोमवार आएगा, ऑफिस की भागदौड़ में सब भूल भी जायेंगे कि कौन असुरक्षित है, किसके साथ क्या हुआ था... अगर उन्हें सज़ा मिलेगी भी तो क्या होगा... हम तो सुसुप्त अवस्था में रहेंगे... ज्यादा से ज्यादा ख़ुशी में एक कैंडल-मार्च निकाल देंगे... फिर कोई नया हादसा होगा और फिर से याद आएगा ये सब कुछ... ये पीरियोडिक गुस्सा है, जो हर हादसे के बाद दिखता है और फिर छुप जाता है... और इस बीच कई शहरों में कई बलात्कार होते हैं... सिर्फ शारीरिक ही नहीं , मानसिक भी... सड़क पर किसी लड़की के साथ चल कर देखिये... सड़कों किनारे खड़े कई लोग आँखों से बलात्कार करते नज़र आयेंगे... वो एक्स-रे भेदी नज़रों के खिलाफ क्या कोई कानून बनाया जा सकता है... ??

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वो गोर थे, ये काले हैं.. लेकिन हैं अंग्रेज ही.. #delhi police

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किसी ने कहा जो खामोश रहते हैं वो बुद्धिजीवी कहलाते हैं... फिलहाल तो देश बुद्धिजीवियों से भरा पड़ा है...

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ये धरना ये जुलूस ये विरोध कोई खरीदी हुयी भीड़ का नहीं था, ये गुस्सा है ये रोष है... ये निकम्मी, निठल्ली सरकार के खिलाफ जो सोयी हुयी है... जिसके हुक्मरानों में इतनी भी रीढ़ की हड्डी नहीं बची है कि वो सामने आकर दो शब्द यही भर कह देते कि वो दुखी हैं, और आगे से ऐसा नहीं होगा... उन बहरे कानों कानों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए ऐसे कई हंगामों, कई धमाकों की जरुरत है...शायद कुछ लोगों को ये गुस्सा तब समझ में आएगा जब खुदा न खास्ता उनके घर में भी कोई हादसा हो जाए... भगवान् न करे कि ऐसा हो, लेकिन जागिये, आखें खोलिए... गुस्सा दिखाईये कि आपकी-हमारी बहनें असुरक्षित हैं....

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जब पूरा देश आपके एक वक्तव्य का इंतज़ार कर रहा था, आप गायब थे... और हर 25 जनवरी और 14 अगस्त की शाम 7 बजे चले आयेंगे राष्ट्र के नाम सन्देश देने के लिए... हम क्यूँ सुने आपकी बात... आक थू......

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कल जो त्रिपुरा में हुआ उसकी सुनवाई भी फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में हो रही है... या फिर उसके लिए भी जुलूस निकालने होंगे...???? जस्टिस ये है कि हर सुनवाई कि गति तेज हो, अगली तारिख, अगली तारीख का ड्रामा बंद हो और किसी भी घटना(जो शीशे की तरह साफ़ है), जिसके सारे अभियुक्त पकडे जा चुके हैं... १० दिनों के अन्दर सजा की घोषणा की जाए.... चाहे वो दिल्ली हो, गुअहाटी हो या त्रिपुरा.....

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मेरी पूरी वॉल शोक संदेशों से भरी पड़ी है... लोग अलग अलग तरह के शब्द इस्तमाल करके दुःख जता रहे हैं... तुम ये थी, तुम वो थी... तुम्हारी कुर्बानी व्यर्थ नहीं जायेगी, फलाना-ढिकाना....
अरे सब बेकार की बातें हैं, तुम्हारी जान, तुम्हारी कुर्बानी सब ख़त्म...
सच्चाई ये है कि जब आधी दिल्ली तुम्हारे लिए बावरी हुयी जा रही थी, उस समय देश के कई कोनों में बीसियों बलात्कार ज़ारी थे, लोग बलात्कार के कारणों को लेकर ब्लू-प्रिंट तैयार कर रहे थे... देश के नेता अपनी अपनी बेटियाँ गिना रहे थे, और महामहिम का कहना था कि सरकार हर जगह चल के नहीं जा सकती, प्रधानमंत्री के अनुसार सब "ठीक था".... और एक महिला वैज्ञानिक तुमसे ही सवाल कर रही थी कि जब तुम ७ लोगों से घिर गयी थी तो तुमने समर्पण क्यूँ नहीं कर दिया...
मैं तुमसे किस मुंह से कहूं कि तुम्हारे जाने के बाद कोई क्रान्ति आने वाली है, जबकि जानता हूँ ऐसा कुछ नहीं होने वाला... आज और कल देश के लोग तुम्हें आखिरी बार याद करेंगे... एक तरफ तुम्राई अंतिम यात्रा में कुछ लोग आंसू बहा रहे होंगे और दूसरी तरफ इसी शहर के किसी दुसरे कोने में एक बलात्कार हो रहा होगा...


अलविदा, मैं खुश हूँ कि तुम अब ऐसी जगह जा रही हो जहाँ शायद कोई किसी का बलात्कार तो नहीं करता...

Thursday, November 15, 2012

हम मिडिल क्लास आदमी हैं...

ई पोस्ट अपना भासा में लिख रहे हैं काहे कि मिडिल क्लास का हिस्सा होने के साथे साथ ई भासा भी हमरा दिल से जुड़ा हुआ है...
हम सुरुवे से काफी खुलल हाथ वाले रहे हैं, मतलब पईसा हमरे हाथ में ठहरता ही नहीं है एकदम.... जब हम छोटा थे तो माँ-पापाजी के मुंह से हमेसा सुनते थे कि हम लोग मिडिल क्लास के हैं, हमलोग को एक-एक पईसा का हेसाब रखना चाहिए.... ऊ समय हम केतना बार पूछे कि ऐसा करना काहे इतना ज़रूरी है तब पापाजी कहते थे कि टाईम आने पर अपने आप बुझ(समझ) जाओगे... ओसे तो ज़िन्दगी में केतना बार ई एहसास हुआ कि पईसा केतना इम्पोर्टेन्ट होता है लाईफ के लिए, उसके बिना तो कोनो गुज़ारा ही नहीं है... लेकिन तयियो कभी भी पईसा बचाने का नहीं सोचे... सोचे जब ज़रुरत होगा तब देखल जाएगा...
पापा हमेसा से अपना कहानी हमको सुनाते थे, उनके बाबूजी यानी के हमरे दादाजी किसान थे, फिर कईसे उनके माँ-बाबूजी उसी समय गुज़र गए जब ऊ ढंग से स्कूल जाना सुरु भी नहीं किये थे, उनकी दादीजी थीं केवल.. ऊ भी कुछे साल तक रहीं... पापा को पढने का बहुते शौक था, लेकिन घर में अब कोनो(कोई) कमाने वाला नय था जो ऊ पढ़ पाते... सुरु सुरु में तो बचत पर काम चला लेकिन एगो किसान का बचत पूँजी केतना होता है ऊ तो आप लोगों से नहिएँ न छिप्पल है... जल्दिये पईसा कम पड़ने लगा, तब ऊ बगले में एगो चाची के हियाँ बीड़ी बाँधने लगे, 2oo बीड़ी बाँधने का ऊ समय १ रुपया मिलता था, इसी तरह करते करते ऊ मैट्रिक तो कर लिए लेकिन उनके गावं में इंटर कॉलेज नय होने के कारण उनको गावं छोड़ना पड़ा, लेकिन पढाई ज़ारी रखने के लिए पईसा तो चाहिए ही था सो धीरे धीरे गावं की ज़मीन बिकने  लगी, और पढाई चलती रही.... वहां से पापा ग्रैजुएशन भी कर लिए लेकिन तब तक लम्पसम पूरी ज़मीन बिक गयी थी, बाकी रहल-सहल कसर गंगा मैया ने पूरी कर दी, न जाने केतना ज़मीन गंगा मैया में समा गया....खैर ऊ कहते हैं न, मेहनत कहियो बेकार नय होता है... पापा का नौकरी लगिए गया, फिर सादी भी हो गया... और किस्मत देखिये, सादी के कुछ दिन बाद माँ का भी नौकरी लग गया... दुन्नु कोई सरकारी इस्कूल में शिक्षक... लेकिन अभियो ऊ मिडिल क्लास वाला दिन नय टला था, रहने के लिए कोनो घर नहीं था... तो जोन इस्कूल में माँ पढ़ाती थीं उहे स्कूल के एगो क्लास रूम में दोनों रहते थे, रात में क्लास का बेंच सब को जोड़ के चौकी(बिस्तर) बन जाता था, उहे पर बिछौना लगा देते थे, फिर भोरे भोरे सब फिर से अलग करके क्लास रूम तैयार... इसी तरह ज़िन्दगी चलते रही फिर हमरे दोनों भैया का पढाई... पापाजी उनके पढाई में कोनो कमी नय रखना चाहते थे, दोनों भैया को बचपने में होस्टल भेज दिए... फिर थोडा बहुत पईसा बचाके वहीँ पासे में एक ठो झोपडी बनाये, कहने को हमारा ठिकाना... हमारा घर... लेकिन ऊ तो सरकारी ज़मीन पर था, टेमप्रोरी... अपना ज़मीन खरीदकर उस पर एक कमरे का अपना घर बनाने में दोनों को 20 साल लग गए.. तब जाके 1989 में हम लोग के पास अपना एगो घर हुआ, एक कमरे का घर... हम उस समय ४ साल के थे, जादे नहीं लेकिन तनि-मनी हमको भी याद है... माँ-पापाजी दोनों केतना खुश थे.... फिर हम तीनो भाई बड़े हुए, तीनो इंजिनियर बने... ऊ भी बिना बैंक से एक्को पईसा क़र्ज़(जिसको आज कल मॉडर्न लोग लोन कहते हैं) लिए... पापा कहते हैं एक एक पईसा जोड़ के, संभाल के, बचा के रखे तब्बे आज इतना कुछ अपना दम पर बना पाए...
खैर, ई तो बात थी पापा की, लेकिन जब कुछ दिन पहले हमरा नौकरी लगा तो हमरे दिमाग में बचत जईसा कुछो नहीं था, लेकिन पहिला महिना का सैलरी आदमी का ज़िन्दगी में केतना बदलाव ला सकता है ऊ हम तब्बे जाने, नौकरी से पहिले हम सोचे थे कि पईसा मिलेगा तो ई करेंगे, ऊ करेंगे... लेकिन जब पईसा एकाउंट में था तो सोचे ऐसे करेंगे तो दसे दिन में पैसा ओरा(ख़त्म हो) जाएगा... फिर किससे मांगेंगे, अब तो अपना पूरा खर्चा हमको खुद को देखना है, अपना रहने का, खाने का... फिर कहीं आना जाना हुआ तो टिकट का.. बिमारी-उमारी तो आजकल आदमी को लगले रहता है... अब उसके लिए हम किसी से मांगने थोड़े न जायेंगे... फिर अभी तो आगे पूरा ज़िन्दगी पड़ा हुआ है, जब परिवार बड़ा होगा, घर का ज़िम्मेदारी बढेगा... उसके लिए भी तो आज से ही बचत करना पड़ेगा... तब जाकर ई बात का एहसास हुआ कि ये मिडिल क्लास आदमी क्या होता है...
मिडिल क्लास आदमी वो है जो मॉल में जाता है, वहां कोनो सामान देखता है तो बाकी कुच्छो देखने से पहले प्राईस टैग देखता है, पसंद-नापसंद तो बाद का बात है... जब भी ऑटो में बैठता है तो सोचता है, काश कि बस मिल जाए तो कुछ पैसे बच जाएँ, सामने से एसी बस गुज़रती है तो सोचता है अगर जेनरल बस में भी सीट मिल जाए तो उसी से चल चलेंगे... मिडिल क्लास आदमी एक-आध किलोमीटर तो ऐसे ही पैदल चल लेता है यही सोच कर कि चलो 15-20 रूपये रिक्शे के बचा लिए... ऐसे कितने ही 10-20 रुपये जोड़-जोड़कर एक मिडिल क्लास आदमी बनता है... एक मिडिल क्लास आदमी का कोनो बैकअप नहीं होता है कि महीना के अंत में अगर पैसा ख़तम हो गया तो फलाना से 1500 रुपया ले लेंगे, या फिर कोनो इमरजेंसी पड़ गया तो क्रेडिट कार्ड यूज कर लेंगे.. मिडिल क्लास आदमी अपना बचत के भरोसे जीता है, कोनो बैकअप के भरोसे नहीं... उसका बचत ही उसका पूँजी है, फ़ालतू में जाता हुआ एक भी रुपया उसको कई-कई बार सोचने पर मजबूर करता है...
नौकरी लगने के बाद हमको एहसास हुआ कि हम भी मिडिल क्लास आदमी हैं... ओसे मिडिल क्लास होना एक सोच है, जिसको हम बचपन से जीते आते हैं, अब अगर हम महीना में लाखो रूपया कमाने लगे न, तहियो हम मिडिल क्लास ही रहेंगे काहे कि इंसान सब कुछ बदल सकता है लेकिन अपना सोच नहीं बदल सकता...

Sunday, October 21, 2012

आखिर लड़कियों को शादी क्यूँ करनी चाहिए...

इन दिनों ये टॉपिक काफी गरमागरम है तो हमने सोचा हम भी थोडा अपना ब्लॉग सेक लें...
रिसेंटली ये मुद्दा मेरे दिमाग में तब आया जब हरियाणा के कुछ प्रकांड विद्वानों ने अपनी राय दी कि लडकियां जल्दी से जल्दी बियाह दी जाएँ ताकि उनका बलात्कार न हो सके...
वैसे हो सकता है उनकी नज़र में इस बात का कोई ठोस कारण उन्हें समझ में आया होगा, मुझे तो बस इतना ही समझ में आया कि लगता है जवानी में उन्हें एक सांसारिक सुख का उपभोग करने के लिए काफी इंतज़ार करना पड़ा हो और ऐसे में उनके दिमाग में भी कभी बलात्कार का ख़याल आया हो, या फिर हो सकता किसी ने किया भी हो... अच्छा चलिए बलात्कार न सही, यौन शोषण तो ज़रूर किया होगा... अब ऐसे गुणी विद्वजनों से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है... ये विद्वान भी बड़े कमाल के हैं इनके हिसाब से लडकियां कोई खिलौना हो सकती हैं जिसका उपयोग पुरुष खेलने के लिए कर सकते हैं या फिर ये कहें करते हैं... कुछ शादी के पहले खेलते हैं और कुछ बेचारों को शादी तक का इंतज़ार करना पड़ता है... खैर ये तो हुयी उन जाहिलों की बातें जो आज की तुलना मुग़ल साम्राज्य से करते हैं... बात यहीं ख़त्म नहीं हुयी, वही बात हैं न कि बात निकली है तो दूर तलक जाएगी...
वैसे तो भारत में मुफ्त की एडवाईस बहुत मिलती है, इसलिए रस्मो-रिवाजों को निभाते हुए पिछले दिनों हमारी प्रिय दोस्त आराधना चतुर्वेदी 'मुक्ति" जी को ऐसे ही किसी विद्वजन ने सलाह दी होगी सो उन्होंने हम सब से बाँट ली... उन्होंने लिखा...
कल एक ब्लॉगर और फेसबुकीय मित्र ने मुझे यह सलाह दी कि मैं शादी कर लूँ, तो मेरी आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित हो जायेगी :) इस प्रकार का विवाह एक समझौता ही होगा. तब से मैं इस समझौते में स्त्रियों द्वारा 'सुरक्षा' के लिए चुकाई जाने वाली कीमत के विषय में विचार-विमर्श कर रही हूँ और पुरुषों के पास ऐसा कोई सोल्यूशन न होने की मजबूरियों के विषय में भी :)

मतलब अब ये स्टेटस पढ़ कर मेरी आखों के सामने थोड़ी सी चिंता उभर आई, पहले तो हम सोच रहे थे कि केवल बलात्कार से बचने के लिए लड़कियों को विवाह करना चाहिए, अब एक नयी बात सामने आ गयी... सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा... मुझे लगा चलो हो सकता है सामजिक सुरक्षा के लिए विवाह जरूरी हो, अब जहाँ ऐसे लोग घूम रहे हों जो बलात्कार को अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानकर चल रहे हों तो वहां ऐसा सोचना ज़रूरी भी हो जाता है... लेकिन ये आर्थिक सुरक्षा ?? यहाँ तो अपने सामने मैं ऐसी लड़कियों को देखता हूँ जो मुझसे ५ से ६ गुना ज्यादा पैसा कमा रही हैं... ऐसी सोच से तो एक दंभ की बू आती है कि केवल लड़के ही अच्छे पैसे कमा सकते हैं... जो लोग ऐसा सोच कर दम्भित हुए जा रहे हैं उन लोगों को महानगर में आकर एक-आध चक्कर लगा लेने चाहिए... अब इस स्टेटस पर क्या और किस तरह की नयी फ्री फंड की एडवाईस मिली वो आप खुद जाकर पढ़ लीजियेगा, वैसे भी इस पर एक पोस्ट लिखी जा चुकी है... आप उसे देवेन्द्र जी के ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं.... खैर यहाँ तक पढने के बाद लड़कियों के विवाह करने के अच्छे खासे कारण मिल गए थे... हम भी संतुष्ट थे चलो, अब तो बेचारी लडकियां विवाह कर ही लेंगी... लेकिन बात यहाँ कहाँ रुकनी थी... टहलते टहलते हम एक गलत पते पर पहुँच गए, गलत पता इसलिए क्यूंकि वहां अपने काम का कोई मैटेरियल आज तक नहीं मिला केवल आलतू-फालतू की बातों की राई से पहाड़ बनाया जाता है... वहीँ पर आराधना जी के उस फेसबुक स्टेटस रो रेफर करते हुए जवाब लिखा गया था..
यह एक टिपिकल नारीवादी चिंतन है जो विवाह की पारंपरिक व्यवस्था पर जायज/नाजायज सवाल उठता रहा है. यहाँ के विवाह के फिजूलखर्चों, दहेज़, बाल विवाह आदि का मैं भी घोर विरोधी रहा हूँ मगर नारीवाद हमें वो राह दिखा रहा है जहाँ विवाह जैसे संबंधों के औचित्य पर भी प्रश्नचिह्न उठने शुरू हो गए हैं, और यह मुखर चिंतन लिव इन रिलेशनशिप होता हुआ पति तक को भी " पेनीट्रेशन"  का अधिकार देने न देने को लेकर जागरूक और संगठित होता दिख रहा है. क्या इसे अधिकार की व्यैक्तिक स्वतंत्रता की इजाजत दी जा सकती है.. क्या समाज के हित बिंदु इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहेंगे ? धर्म तो विवाह को केवल प्रजनन के पवित्र दायित्व से जोड़ता है.. अगर पेनीट्रेशन नहीं तो फिर प्रजनन का प्रश्न नहीं और प्रजनन नहीं तो फिर प्रजाति का विलुप्तिकरण तय...
अब तो मेरा चिंतित होना जायज था, ये पहलू तो हमने सोचा ही नहीं... विवाह नहीं तो सेक्स नहीं, सेक्स नहीं तो प्रजनन नहीं और फिर तो ये ७ अरब की जनसँख्या वाली दुनिया की अगली पीढ़ी कैसे आ पायेगी भला... फिर तो विलुप्तिकरण हो ही जाएगा... हालांकि ये सोच भी काफी हद तक हरियाणा के उन विद्वजनों से मेल खाती मालूम होती है क्यूंकि दोनों ही सेक्स के आस पास घूमती है ... लेकिन इसमें सेक्स करने के लायसेंस और आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व को लेकर चिंता भी जताई गयी है... उनकी भी चिंता जायज ही है... मैं उनकी चिंता का सम्मान करता हूँ, और उनकी सोच के आगे नतमस्तक हूँ... जहां ऐसी सोच रखने वाले लोग हैं वहां पीढियां ख़त्म हो ही नहीं सकतीं.... चलिए अच्छा है लोग नए नए कारण ढूँढ ढूँढ कर लाने की कोशिश कर रहे हैं...
लेकिन मुझे एक बात समझ नहीं आती विवाह के पीछे लोग कारण खोजने में काहे लगे हुए हैं, क्या विवाह एक जरूरत है, एक अनिवार्य कदम है जो हर स्त्री/पुरुष को उठाना जरूरी है... ?? हाँ ये ज़रूर मानता हूँ ज़िन्दगी के कई मोड़ पर ये लगता है एक हमसफ़र होता तो भला होता... खासकर उम्र के तीसरे पडाव और अंतिम पडाव पर इंसान मानसिक तौर पर काफी एकाकी महसूस करने लगता है... ऐसे कई लोग अपने आस पास देखे हैं जिन्होंने विवाह न करने के फैसले तो लिए लेकिन एक वक़्त आते आते खुद को अकेला महसूस करने लगे....
खैर ये एक अंतहीन विषय है इसपर अपनी राय मैंने फेसबुक पर ही उनके स्टेटस पर दर्ज कराई थी यहाँ भी उसी कमेन्ट के साथ इति करना चाहूँगा....
वैसे विवाह सबका अपना एक निजी निर्णय होता है सिर्फ और सिर्फ उस कारण से विवाह कर लेना कि भाई हमें उसकी ज़रुरत (चाहे जैसी भी हो) पड़ेगी कहीं से भी उचित नहीं है लेकिन अगर किसी के पास एक हमसफ़र के रूप में कोई हो तो ना करने का कोई कारण नहीं है...
विवाह का अस्तित्व अनिवार्यता और ज़रुरत से परे ही देखा जाना चाहिए.... सिर्फ ज़रूरतों को पूरा किये जाने के लिए विवाह नहीं किये जाते...
Disclaimer:- सोचा था ये पोस्ट व्यंग्य के रूप में रखूंगा लेकिन अंत तक आते आते पोस्ट सीरियस नोट पर ख़त्म कर रहा हूँ... साथ में इससे पहले कि कुछ विद्वजन खुद को समझदार साबित करने की जुगत में लग जाएँ उनसे बस एक बात कहना चाहूंगा... सिर्फ इसलिए कि आप उम्र में मुझसे बड़े हैं या फिर आपके पास मुझसे ज्यादा डिग्रियां हैं आप मुझसे ज्यादा समझदार भी होंगे, मैं ये मानने से बेहद सख्त शब्दों में इनकार करता हूँ...

Saturday, October 20, 2012

आखिर लड़कियों को शादी क्यूँ करनी चाहिए...

इन दिनों ये टॉपिक काफी गरमागरम है तो हमने सोचा हम भी थोडा अपना ब्लॉग सेक लें...
रिसेंटली ये मुद्दा मेरे दिमाग में तब आया जब हरियाणा के कुछ प्रकांड विद्वानों ने अपनी राय दी कि लडकियां जल्दी से जल्दी बियाह दी जाएँ ताकि उनका बलात्कार न हो सके...
वैसे हो सकता है उनकी नज़र में इस बात का कोई ठोस कारण उन्हें समझ में आया होगा, मुझे तो बस इतना ही समझ में आया कि लगता है जवानी में उन्हें एक सांसारिक सुख का उपभोग करने के लिए काफी इंतज़ार करना पड़ा हो और ऐसे में उनके दिमाग में भी कभी बलात्कार का ख़याल आया हो, या फिर हो सकता किसी ने किया भी हो... अच्छा चलिए बलात्कार न सही, यौन शोषण तो ज़रूर किया होगा... अब ऐसे गुणी विद्वजनों से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है... ये विद्वान भी बड़े कमाल के हैं इनके हिसाब से लडकियां कोई खिलौना हो सकती हैं जिसका उपयोग पुरुष खेलने के लिए कर सकते हैं या फिर ये कहें करते हैं... कुछ शादी के पहले खेलते हैं और कुछ बेचारों को शादी तक का इंतज़ार करना पड़ता है... खैर ये तो हुयी उन जाहिलों की बातें जो आज की तुलना मुग़ल साम्राज्य से करते हैं... बात यहीं ख़त्म नहीं हुयी, वही बात हैं न कि बात निकली है तो दूर तलक जाएगी...
वैसे तो भारत में मुफ्त की एडवाईस बहुत मिलती है, इसलिए रस्मो-रिवाजों को निभाते हुए पिछले दिनों हमारी प्रिय दोस्त आराधना चतुर्वेदी 'मुक्ति" जी को ऐसे ही किसी विद्वजन ने सलाह दी होगी सो उन्होंने हम सब से बाँट ली... उन्होंने लिखा...
कल एक ब्लॉगर और फेसबुकीय मित्र ने मुझे यह सलाह दी कि मैं शादी कर लूँ, तो मेरी आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित हो जायेगी :) इस प्रकार का विवाह एक समझौता ही होगा. तब से मैं इस समझौते में स्त्रियों द्वारा 'सुरक्षा' के लिए चुकाई जाने वाली कीमत के विषय में विचार-विमर्श कर रही हूँ और पुरुषों के पास ऐसा कोई सोल्यूशन न होने की मजबूरियों के विषय में भी :)

मतलब अब ये स्टेटस पढ़ कर मेरी आखों के सामने थोड़ी सी चिंता उभर आई, पहले तो हम सोच रहे थे कि केवल बलात्कार से बचने के लिए लड़कियों को विवाह करना चाहिए, अब एक नयी बात सामने आ गयी... सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा... मुझे लगा चलो हो सकता है सामजिक सुरक्षा के लिए विवाह जरूरी हो, अब जहाँ ऐसे लोग घूम रहे हों जो बलात्कार को अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानकर चल रहे हों तो वहां ऐसा सोचना ज़रूरी भी हो जाता है... लेकिन ये आर्थिक सुरक्षा ?? यहाँ तो अपने सामने मैं ऐसी लड़कियों को देखता हूँ जो मुझसे ५ से ६ गुना ज्यादा पैसा कमा रही हैं... ऐसी सोच से तो एक दंभ की बू आती है कि केवल लड़के ही अच्छे पैसे कमा सकते हैं... जो लोग ऐसा सोच कर दम्भित हुए जा रहे हैं उन लोगों को महानगर में आकर एक-आध चक्कर लगा लेने चाहिए... अब इस स्टेटस पर क्या और किस तरह की नयी फ्री फंड की एडवाईस मिली वो आप खुद जाकर पढ़ लीजियेगा, वैसे भी इस पर एक पोस्ट लिखी जा चुकी है... आप उसे देवेन्द्र जी के ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं.... खैर यहाँ तक पढने के बाद लड़कियों के विवाह करने के अच्छे खासे कारण मिल गए थे... हम भी संतुष्ट थे चलो, अब तो बेचारी लडकियां विवाह कर ही लेंगी... लेकिन बात यहाँ कहाँ रुकनी थी... टहलते टहलते हम एक गलत पते पर पहुँच गए, गलत पता इसलिए क्यूंकि वहां अपने काम का कोई मैटेरियल आज तक नहीं मिला केवल आलतू-फालतू की बातों की राई से पहाड़ बनाया जाता है... वहीँ पर आराधना जी के उस फेसबुक स्टेटस रो रेफर करते हुए जवाब लिखा गया था..
यह एक टिपिकल नारीवादी चिंतन है जो विवाह की पारंपरिक व्यवस्था पर जायज/नाजायज सवाल उठता रहा है. यहाँ के विवाह के फिजूलखर्चों, दहेज़, बाल विवाह आदि का मैं भी घोर विरोधी रहा हूँ मगर नारीवाद हमें वो राह दिखा रहा है जहाँ विवाह जैसे संबंधों के औचित्य पर भी प्रश्नचिह्न उठने शुरू हो गए हैं, और यह मुखर चिंतन लिव इन रिलेशनशिप होता हुआ पति तक को भी " पेनीट्रेशन"  का अधिकार देने न देने को लेकर जागरूक और संगठित होता दिख रहा है. क्या इसे अधिकार की व्यैक्तिक स्वतंत्रता की इजाजत दी जा सकती है.. क्या समाज के हित बिंदु इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहेंगे ? धर्म तो विवाह को केवल प्रजनन के पवित्र दायित्व से जोड़ता है.. अगर पेनीट्रेशन नहीं तो फिर प्रजनन का प्रश्न नहीं और प्रजनन नहीं तो फिर प्रजाति का विलुप्तिकरण तय...

अब तो मेरा चिंतित होना जायज था, ये पहलू तो हमने सोचा ही नहीं... विवाह नहीं तो सेक्स नहीं, सेक्स नहीं तो प्रजनन नहीं और फिर तो ये ७ अरब की जनसँख्या वाली दुनिया की अगली पीढ़ी कैसे आ पायेगी भला... फिर तो विलुप्तिकरण हो ही जाएगा... हालांकि ये सोच भी काफी हद तक हरियाणा के उन विद्वजनों से मेल खाती मालूम होती है क्यूंकि दोनों ही सेक्स के आस पास घूमती है ... लेकिन इसमें सेक्स करने के लायसेंस और आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व को लेकर चिंता भी जताई गयी है... उनकी भी चिंता जायज ही है... मैं उनकी चिंता का सम्मान करता हूँ, और उनकी सोच के आगे नतमस्तक हूँ... जहां ऐसी सोच रखने वाले लोग हैं वहां पीढियां ख़त्म हो ही नहीं सकतीं.... चलिए अच्छा है लोग नए नए कारण ढूँढ ढूँढ कर लाने की कोशिश कर रहे हैं...
लेकिन मुझे एक बात समझ नहीं आती विवाह के पीछे लोग कारण खोजने में काहे लगे हुए हैं, क्या विवाह एक जरूरत है, एक अनिवार्य कदम है जो हर स्त्री/पुरुष को उठाना जरूरी है... ?? हाँ ये ज़रूर मानता हूँ ज़िन्दगी के कई मोड़ पर ये लगता है एक हमसफ़र होता तो भला होता... खासकर उम्र के तीसरे पडाव और अंतिम पडाव पर इंसान मानसिक तौर पर काफी एकाकी महसूस करने लगता है... ऐसे कई लोग अपने आस पास देखे हैं जिन्होंने विवाह न करने के फैसले तो लिए लेकिन एक वक़्त आते आते खुद को अकेला महसूस करने लगे....
खैर ये एक अंतहीन विषय है इसपर अपनी राय मैंने फेसबुक पर ही उनके स्टेटस पर दर्ज कराई थी यहाँ भी उसी कमेन्ट के साथ इति करना चाहूँगा....
वैसे विवाह सबका अपना एक निजी निर्णय होता है सिर्फ और सिर्फ उस कारण से विवाह कर लेना कि भाई हमें उसकी ज़रुरत (चाहे जैसी भी हो) पड़ेगी कहीं से भी उचित नहीं है लेकिन अगर किसी के पास एक हमसफ़र के रूप में कोई हो तो ना करने का कोई कारण नहीं है...
विवाह का अस्तित्व अनिवार्यता और ज़रुरत से परे ही देखा जाना चाहिए.... सिर्फ ज़रूरतों को पूरा किये जाने के लिए विवाह नहीं किये जाते...
Disclaimer:- सोचा था ये पोस्ट व्यंग्य के रूप में रखूंगा लेकिन अंत तक आते आते पोस्ट सीरियस नोट पर ख़त्म कर रहा हूँ... साथ में इससे पहले कि कुछ विद्वजन खुद को समझदार साबित करने की जुगत में लग जाएँ उनसे बस एक बात कहना चाहूंगा... सिर्फ इसलिए कि आप उम्र में मुझसे बड़े हैं या फिर आपके पास मुझसे ज्यादा डिग्रियां हैं आप मुझसे ज्यादा समझदार भी होंगे, मैं ये मानने से बेहद सख्त शब्दों में इनकार करता हूँ...
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Thursday, June 28, 2012

आप अपने बच्चों से प्यार नहीं करते क्या...

               क्या आपको याद है थियेटर या सिनेमा हॉल में जब आपने पहली फिल्म देखी थी तब आपकी उम्र क्या थी... खैर छोडिये अगर याद नहीं है तो...  अक्सर मैं देखता हूँ, कई लोग गोद में छोटे बच्चों को लेकर फिल्में देखने चले आते हैं.. क्या आपने भी कभी ऐसा किया है... अब आप पूछेंगे भला इसका इस पोस्ट से क्या लेना देना है... जी आपने सही कहा इसका इस पोस्ट से कोई लेना देना नहीं है लेकिन इस बात का बच्चों की सेहत से ज़रूर लेना देना है... इस तरह की लापरवाही भरी हरकत का बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास में गहरा प्रभाव पड़ सकता है...
             पहले शारीरिक पहलू सोचिये, बच्चों के कान के पर्दे कितने नाज़ुक होते हैं, बिलकुल फूल की पंखुड़ियों की तरह... कई फिल्मों में बीच बीच में कानफाडू शोर या संगीत होता है... इस शोर के प्रभाव से बच्चों के कान के पर्दे फट सकते हैं, अगर भगवान् की दया से न भी फटें तो ये कमज़ोर हो सकते हैं, जिससे उनके सुनने की शक्ति कमज़ोर हो सकती है... लगातार अँधेरे में इतने बड़े रौशनी से भरे स्क्रीन को देखने से उनकी आँखों पर भी प्रभाव पड़ सकता है...
फिर उनके मानसिक प्रभावों पर भी ध्यान दीजिये, बच्चे आखिर क्या सीखते हैं... वही जो वो अपने आस पास देखते हैं... आस पास के माहौल को अपना पथप्रदर्शक मानते हुए ये नादान सी जानें आज कल की फिल्मों से क्या सीख रही हैं कभी आपने इस बारे में विचार किया है... आज कल की फिल्में कितनी भी पारिवारिक हों ये इन छोटे छोटे बच्चों के बालमन को ध्यान रख कर नहीं बनायीं जातीं.... फिल्मों में होने वाली मार-धाड़, अश्लील दृश्य आपके बच्चे को एक गलत दिशा में सोचने के लिए प्रेरित कर सकते हैं...
               आपने फिल्मों के सर्टिफिकेट्स के बारे में तो ज़रूर सुना होगा... केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड द्वारा फिल्मों को सामान्यतः तीन तरह के सर्टिफिकेट दिए जाते हैं... "U" "U/A" और "A"...
     "U" सर्टिफिकेट उन फिल्मों को दिया जाता है जो आप 4 साल से ज्यादा की उम्र के बच्चों के साथ देख सकते हैं, बहुत कम ही फिल्मों में आपने ये सर्टिफिकेट देखा होगा.. अभी की फिल्मों में फरारी की सवारी  ऐसी ही फिल्मों में से एक है... लेकिन इस तरह की भी फिल्में 4 साल से छोटे बच्चों के साथ देखने से बचना ही चाहिए...
          उसके बाद नंबर आता है "U/A" सर्टिफिकेट वाली फिल्मों का.. इस श्रेणी की फिल्मों के कुछ दृश्यों मे हिंसा, अश्लील भाषा या यौन संबंधित सामग्री हो सकती है, इस श्रेणी की फिल्में केवल 12 साल से बड़े बच्चे किसी अभिभावक की उपस्थिति मे ही देख सकते हैं... मतलब ये फिल्में भी आपको 12 साल से छोटे बच्चों को नहीं दिखानी चाहिए.. आज कल बनने वाली अधिकांशतः फिल्में इसी श्रेणी की होती हैं...
        तीसरी श्रेणी है "A" .. यह वह श्रेणी है जिसके लिए सिर्फ वयस्क यानि 18 साल या उससे अधिक उम्र वाले व्यक्ति ही पात्र हैं...
              चूंकि वो नन्हे बच्चे कुछ बोल नहीं सकते तो उनकी तरफ से मैं आपसे बस इतनी सी गुज़ारिश करना चाहूँगा, अपनी खुशियों का थोडा बलिदान और करें... और बच्चों के साथ फिल्में देखने न जाएँ और न ही घर पर ही उन्हें इस तरह की फिल्में देखने दें... अपनी आने वाली पीढ़ियों का ख़याल करें...

Saturday, June 09, 2012

माफ़ करो इन्हें, ये तो इनके पढने-खेलने के दिन हैं...

           5 जून को दिए दिल्ली हाई कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ने 15 वर्ष की उम्र में हुए एक मुस्लिम लड़की के विवाह को जायज ठहराया..
वैसे भारतीय संविधान के हिन्दू मैरेज एक्ट के अनुसार विवाह की मानित उम्र लड़कियों के लिए 18 और लड़कों के लिए 21 तय की गयी है... लेकिन इसमें मुस्लिम, पारसी, ईसाई और जेविश धर्म का जिक्र नहीं किया गया है... इस्लामिक क़ानून के मुताबिक़ कोई भी मुस्लिम लड़की बिना अपने माता-पिता की इजाज़त के शादी कर सकती है, बशर्ते उसने प्यूबर्टी हासिल कर ली हो. अगर उसकी उम्र 18 साल से कम भी है तो उसे अपने पति के साथ रहने का हक़ है... तो क्या भारतीय संविधान भी धर्म के हिसाब से शादी की उम्र तय करेगा... वैसे अगर दूसरे मुल्कों की बात करें तो मुस्लिम देशों को छोड़कर अधिकतर पश्चिमी देशों में विवाह की उम्र लडकों के लिए 18 और लड़कियों के लिए 16 है... हालाँकि एशिया महाद्वीप में अधिकतर जगह लड़कों के साथ-साथ लड़कियों की भी उचित उम्र 18 ही है... इरान में लड़कियों की न्यूनतम आयु 9 साल निर्धारित की गयी है और ब्रुनेई में तो इससे जुड़ा कोई नियम ही नहीं है यानी वहां बाल विवाह आज भी जायज है... ध्यान रहे कि आज से करीब एक साल पहले कर्नाटक हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में सुनाया था कि बिना माता-पिता की अनुमति की कोई भी लड़की 21 साल से कम की उम्र में विवाह नहीं कर सकती... वैसे अगर धर्म, प्रदेश का पक्ष हमलोग दरकिनार कर दें तो भी एक सवाल तो मेरे मन में उठ ही रहा है कि क्या 15 वर्ष की उम्र में विवाह उचित है... अगर हाँ तो इसे बाल विवाह की ही संज्ञा दे दें तो क्या गलत होगा... भले ही लड़की शारीरिक तौर पर थोड़ी तैयार हो लेकिन क्या वो मानसिक तौर पर विवाह की ज़ेम्मेदारियां उठा पाने में सक्षम होगी...बहरहाल उम्मीद करता हूँ इस फैसले का असर आने वाली शादियों पर तो नहीं पड़ना चाहिए... क्यूंकि इतनी कम उम्र में होने वाले विवाह की  संख्याओं में अब कटौती हो रही है और मेरे ख्याल से ऐसा होना भी चाहिए... भले ही कोर्ट ने १५ वर्ष की उम्र को विवाह के लिए पर्याप्त मान लिया हो लेकिन ये फैसला आपको करना है कि आप विवाह के लिए उचित अवस्था क्या मानते हैं..
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            भाई मेरा तो कहना है कि कानून कोई भी हो लेकिन उसके फायदे और नुक्सान पर भी गौर कर लिया जाना चाहिए... क्या 15 साल की उम्र भी कोई शादी की उम्र होती है... अरे ये पढने-लिखने और खेलने कूदने की उम्र होती है....

Thursday, May 24, 2012

आखिर आज का युवा कैरियर के तौर पर राजनीति को क्यूँ नहीं देखता...

           आज कल बेरोजगारी अपने चरम पर है, हर किसी के हाथों में डिग्री है, इंजीनियरिंग से कम में तो कोई बात ही नहीं करता... लेकिन नौकरी ... उसके लिए तो गज़ब की मारामारी चल रही है... ऐसी कोई डिग्री, ऐसा कोई कोर्स नहीं जहाँ नौकरी की गारंटी मिलती हो.... ऐसे में सब अपने कैरियर के चुनाव में पेशोपेश में रहते हैं... स्कूल के समय से ही विद्यार्थियों पर दवाब बन जाता है ताकि वो अपना कैरियर चुनकर उसपर अपना 100 परसेंट दे सकें... तरह तरह के इन अवसरों को तलाश करते युवा गलती से भी कभी राजनीति में आने का नहीं सोचते... आखिर ऐसा क्या है जो उन्हें इस तरफ आने से रोक देता है, जबकि राजनीति के बारे में बातें सभी करते हैं... हर दूसरा आदमी कभी किसी नेता को, अफसर को, सिस्टम को गाली देता हुआ मिल जाएगा... राजनीति को सभी गन्दा कहते हैं लेकिन कोई भी उसमे उतर कर उसको साफ़ नहीं करना चाहता... सभी कहते हैं कि फलाना नेता क्रिमिनल है उसकी छवि साफ़ सुथरी नहीं है... अब जब देश के पढ़े लिखे और जागरूक लोग उधर का रुख ही नहीं करेंगे तो ऐसे लोग आपके प्रतिनिधि बनकर देश चलाएंगे न...
            सब बस कोई ठीक ठाक सी नौकरी चाहते हैं, ठीक ठाक सी कमाई हो जाए, शाम को आराम से ऑफिस से लौटें और अपने परिवार के साथ सुकून के दो पल बिताएं... और इसमें कोई बुराई भी तो नहीं है, आखिर अपनी सुविधा कौन नहीं देखता... अब इस बात पर कुछ लोग ये कहते मिल जायेंगे कि भाई साहब हम तो अपनी अपनी जगह पर रहकर भी देश सेवा कर सकते हैं तो फिर राजनीति में उतरने की ज़रुरत क्या है... लेकिन ये सिर्फ अपने बचाव के लिए एक वक्तव्य मात्र है... ये हम सभी जानते हैं कि हम राजनीति में नहीं जाना चाहते चाहे जो भी कारण हो और न ही कोई माता-पिता चाहते हैं कि उनका बेटा या बेटी बड़े होकर कोई नेता बने... अगर कोई युवा इस तरफ अपनी रुचि दिखाए भी तो उसे अपने परिवार में घोर विरोध का सामना करना पड़ेगा...
            खैर कारण चाहे जो भी हो, सच यही है कि मेरा भी राजनीति में जाने का कोई इरादा नहीं है... बस इस तरफ थोडा ध्यान दिलाना चाहता था सबका, ताकि अगर किसी के मन में ज़रा भी पेशोपेश हो तो बेधड़क राजनीति का रुख करें.. इस देश को सच में पढ़े लिखे और जागरूक नेताओं की ज़रुरत है...
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