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Saturday, March 26, 2016

कोने पे तनहाई...

इन दिनों मैं पेंसिल से लिखता हूँ
ताकि मिटा दूँ लिखने के बाद
और शब्दों को बचा सकूँ
इधर उधर ओझरा जाने से,
काश कि आस-पास उलझे हुये
यूं बेवजह लड़ते हुये
लोगों को भी मिटा पाता
किसी इरेज़र से
और उगा देता वहाँ
गुलमोहर और अमलताश के कई सारे पेड़....

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नीले आमों की गुठलियों पर
काले संतरे उगाने हैं
पर कमबख्त ये बैंगनी सूरज
अपनी हरी किरणें
पड़ने ही नहीं देता इन लाल पत्तों पर...
ये रंग भी अजीब होते हैं न,
ज़रा से इधर उधर हो जाएँ तो
अर्थ ही बदल देते हैं... 

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मैं इन दिनों
किसी खाली डब्बे सा बन के रह गया हूँ,
बिलकुल खोखला,
जो हर छोटी बात पर
ढनमनाता रहता है...
मुझे यकीन था
कि किसी न किसी रोज़
कोई मेरे इस बेवजह के शोर
की वजह तलाशता ज़रूर आएगा,
लेकिन अब मैं खुद बुतला गया हूँ
और खोजता हूँ अपने आप को,
एक खाली से डब्बे का भी क्या वज़ूद होगा भला...

Tuesday, May 05, 2015

क्रमशः...

मैं अंगारे सी धधकती
नज़्में लिखना चाहता हूँ
कि कोई छूए भी तो
हाथ झुलस जाएँ,
मेरे लफ़्ज़ों के कोयले से
आग को विशालतर कर
इस मतलबी दुनिया को
जला देना चाहता हूँ 
और बन जाना चाहता हूँ
इस ब्रह्मांड का आखिरी हिटलर...

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इंसान किसी और के गम में
या क्षोभ में नहीं रोता,
न ही रोना कमजोरी है कोई ...
रोना तो
बस जरिया है सेल्फ-डिफेंस का,
खुद को जंजीरों में कैद करने के बजाय
दूसरों के मन में दहशत बिठा देना,
आखिर सेल्फ-डिफ़ेंस मे की गयी
हत्या भी हत्या नहीं कहलाती...


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इंसान का खुश होना एक झूठ है 
और खुश न होना उससे भी बड़ा झूठ,
उसका दूसरा झूठ 
हमेशा पहले झूठ से 
बड़ा होता है, 
बढ़ता रहता है झूठ का व्याज
दिन-ब-दिन,
फिर वो एक झूठ बेचकर 
दूसरा झूठ खरीदता जाता है,
और इस तरह बन जाता है
झूठ का सच्चा सौदागर...

Wednesday, February 25, 2015

हर ज़र्रे से इश्क है मुझे....

प्यार कभी अधूरा नहीं होता,
वो हमेशा उतना ही पूरा होता है
जितनी कि
जिस्मों की जद्दोजहद के बाद 
उस आखिरी-क्षण की उत्तेजना...

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मेरे शब्दों के कोई
सिर-पैर नहीं होते,
जब तक अंदर रहें
मन के कोने में
बिलबिलाते रहते हैं,
मैं इन शब्दों को पचा नहीं पाता
अपच से पीड़ित मेरे मन से निकले  
इन अनंत शब्दों के बीज से
उग आते हैं कई घने जंगल,
मैं उन जंगलों में बैठ कर
अपने अस्तित्व को नकार दिया करता हूँ....  

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कभी-कभी सुबह खिड़कियों से आती रोशनी
अच्छी नहीं लगती
मैं रहना चाहता हूँ अंधेरे में
बस और थोड़ी देर,
इस अंधेरे को अपने अंदर
खीच लेना चाहता हूँ
सिगरेट के उस आख़िरी कश की तरह....

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धरती खीच लाती है
हर रोज इस धूप को,
मैं खुद को रज़ाई में गोतकर
तैरना चाहता हूँ
इस गुरुत्वाकर्षण के नियम के खिलाफ,
इस खिड़की से आती हुई
इस नुकीली धूप के सिरे को उधाड़कर
जला देना चाहता हूँ... 

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