Wednesday, November 16, 2011

बस यूँ ही बिखरा बिखरा सा कुछ...

        मैं अपनी दुनिया में खो जाना चाहता हूँ लेकिन इस भीतर की बेचैनी का क्या करूँ ? जब यूँ रास्तों पर कोई अकेला दिख जाता है, ऐसा लगता है जैसे उसे मेरा ही इंतज़ार हो.. शबीना ने एक बार कहा था तुम एक चित्रकार हो जो हर किसी के लिए एक खूबसूरत सपना बनाता है... पता नहीं क्या सोचकर उसके दिल में यह ख्याल आया, लेकिन वो अर्धसत्य मुझे हमेशा कचोटता रहता है, पूरी सच्चाई मैं अब जान पाया हूँ, मैं तो वो बेबस चित्रकार हूँ जो खुद अपने सपने, अपनी ज़िन्दगी में रंग नहीं भर पाता... एक लापरवाह इंसान जो हमेशा अपने बेरंगी, बेढब, बिखरी ज़िन्दगी और सपनों को देखकर आखों के कोर नम कर बैठता है... जो दिन में बेशक हंसने, गाने, मुस्कुराने की कोशिश कर ले लेकिन रातों को अकेला बैठकर खूब रोता है...  ज़िन्दगी की इन तेज हवा के थपेड़ों से लड़ तो लेता हूँ, थोड़ी मुश्किल से ही सही लेकिन सबके सामने उस दर्द को ज़ाहिर भी नहीं होने देता, लेकिन आसपास अकेलेपन का एहसास होते ही उन थपेड़ों की टीस  का असर महसूस होने लगता है... इंसान कितना भी आशावादी हो, लेकिन जब ज़िन्दगी में कुछ भी सही नहीं हो रहा हो निराशा घेर ही लेती है...
       आखिर कबतक मैं सपने देखता रहूँगा, वो सपने जो सच नहीं हो पाते, कुछ सपने तो बस जैसे छू के निकल जाते हैं..
एक हूक सी उठी मन में कहीं,
इक सपना था जो छू के निकल गया...
       ऐसे मौकों पर जैसे लिखने के लिए कुछ नहीं बच जाता, बस एक ख्याल, एक सोच कि काश हम जान पाते     आखिर कब तक निभाना है इस ज़िन्दगी का साथ, ताकि उस बचे समय में समेट लेते इन ज़िन्दगी के बिखरे टुकड़ों को... न ही आज मैं उदास हूँ और न ही निराश, बस चाहता हूँ एक लम्बा सा एकांत, एक आजादी, एक रिहाई...
थक गया हूँ तेरा साथ निभाते निभाते,
अब बता भी दे और कितनी बची है तू ज़िन्दगी
...
       देखना चाहता हूँ उस परिधि को जहाँ अँधेरे और उजाले मिल जाते हैं, जहाँ अपना और पराया कुछ नहीं होता.. सब बस एक शरीर होते हैं, एक निष्प्राण शरीर... 

Friday, October 28, 2011

तुम्हारी ज़िन्दगी एक बंद कमरा लगती है...

        इन दिनों तुम्हारी ज़िन्दगी में उलझा हूँ, जाने कितनी पहेलियाँ कितने अनकहे से सपने दिखते हैं... अपने आपको जैसे एक बंद कमरे में कैद करके बैठी हो, खिड़कियाँ भी बंद हैं, कोई डर है कि कहीं कोई चुपके से झाँक न ले, कहीं चुरा न ले उन सपनो को... तुम्हें शायद खबर नहीं कि ये कमबख्त आखें सब कुछ कह जाती हैं, कितना ही समझा लो, संभाल लो, झाँकने वाले झाँक ही लेते हैं इन परदों के पीछे... और हम जैसे बदतमीज़ दोस्त तो कभी मौका नहीं छोड़ते न, चाहे कितना भी छुपा लो... 
        जितनी ही बार तुमसे मिलता हूँ, उतनी ही बार तुम्हें तन्हा देखता हूँ, जैसे आस पास की दुनिया से कहीं दूर ही चलती रहती हो... कई बार तुमसे पूछा लेकिन शायद अभी तक तुम्हारे मन में मैं अपने लिए वो भरोसा नहीं जगा पाया हूँ...
        जाने कब तक मुझे यूँ ही दूर रखोगी अपनी ज़िन्दगी से, एक न एक दिन मना ही लूँगा तुम्हें ... तुम भी सोचती होगी अजब पागल लड़का है, लेकिन क्या करें मुझे यूँ बंद किताबों के पन्ने  अच्छे नहीं लगते,  इस अकेलेपन से नफरत सी है मुझे, कुछ ज्यादा ही घुट चूका हूँ इसमें मैं ... इसलिए अब कोई भी अकेला यूँ परेशान सा इंसान अच्छा नहीं लगता... 
         बस इसे मेरी जिद समझो, बेवकूफी या फिर पागलपन... अपने सपने सच करना इंसान के बस में है या नहीं ये तो नहीं पता लेकिन इतना ज़रूर जानता हूँ दूसरों के सपनो को पूरा करने में उनकी मदद जरुर की जा सकती है,  और यकीन मानो मुझे इसमें ज्यादा ख़ुशी मिलती है...मैंने कहा था न मुझे दूसरों के सपनो में रंग भरने का शौक है...
         और ज्यादा क्या कहूं, बस यूँ ही तुम्हारी ज़िन्दगी के बंद दरवाज़े पर खड़ा मिलूंगा, जब जी चाहे दरवाज़ा खोल लेना... हाँ थोडा जल्दी करना मुझे ज्यादा इंतज़ार करना अच्छा नहीं लगता, दरवाज़ा तोड़ के भी आ सकता हूँ अन्दर... :)

Monday, October 24, 2011

चलो छोड़ो हटाओ...

                 आज तक इस ब्लॉग पर मैंने प्यार के बारे में न जाने क्या क्या लिखा है, पर आज जाने-अनजाने  में कुछ समझने को मिला है मुझे  | इस दुनिया में प्यार ऐसा कुछ भी नहीं होता, सब बेवकूफी है, बकवास है ... एक मृगतृष्णा है जिसके पीछे हम बेवकूफों की तरह भागते रहते हैं, ये न आज तक किसी को नसीब हुआ है और न ही कभी होगा... हो सकता है आपमें से कई लोग मेरी इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते हों लेकिन मैंने जितना जाना है शायद यही सच है... हम तो एक बस एक मशीन हैं, बस अपने लिए जीते हैं, अपना फायदा देखते हैं और उस फायदे को कभी रिश्ते, कभी दोस्ती और कभी प्यार का नाम दे देते हैं... ये प्यार-लगाव की बातें सुनने में तो बहुत शायराना ख़याल है, लेकिन ये तो बस एक सपना है और उससे ज्यादा कुछ भी नहीं.... न जाने कितने सालों से सोया पड़ा था मैं भी, शायद एक सपना देख रहा था, उससे जाग गया हूँ... 
                 मैंने सुना था प्यार में बहुत ताकत होती है लेकिन इस बात को एक बार फिर गलत साबित होते हुए देख रहा हूँ, अब कभी इस प्यार से रूबरू नहीं हो पाऊंगा... चलो छोड़ो हटाओ... ज़िन्दगी के कुछ अजीबोगरीब दौर से गुजर रहा हूँ, पता नहीं फिर कुछ लिखने की हिम्मत कब तक जुटा पाऊंगा, पिछले दिनों कुछ दो लाईना लिखी थीं जो फेसबुक तक ही सिमट कर रह गयीं, उन्हें आपकी नज़र रख रहा हूँ...
              कुछ ज्यादा ही मांग बैठे ज़िन्दगी तुझसे हम,
              अब तो बस जीने के दो बहाने दे दे...
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              न जाने किस मोड़ पर ले आई है ये ज़िन्दगी,
              मैं रोज वापस जाने का रास्ता ढूँढता हूँ  ...
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              हर रोज हम भीड़ में वो चेहरा पुराना ढूँढ़ते हैं,
              जब होते हैं तन्हा तो रोने का बहाना ढूँढ़ते हैं...
                  ----------------
                  रोता खुदा भी है इस दुनिया की हालत पर
              वरना यह बारिश का पानी इतना नमकीन क्यूँ है..

Thursday, September 22, 2011

कहीं आप इस धरती पर आखिरी इंसान तो नहीं...

             बहुत दिनों से इस खामोश दिल ने सुगबुगाहट नहीं की, क्या करें वक़्त बहुत कम ही मिल पाता है और जितना भी मिलता है न शरीर और न ही दिमाग ये इजाजत देता है कि कुछ लिख सकूं... पता नहीं कैसे आज शाम अचानक बैठे बैठे ख्याल आया, कि अगर हमें छुट्टी मिलती है तो हम क्या करते हैं (ये सवाल सिर्फ कुंवारे लोगों से है क्यूंकि शादी शुदा बेचारों के लिए छुट्टी का क्या मतलब है ;))... खैर, मज़ाक नहीं, कैसे बिताते हैं आप छुट्टियाँ ???? लोगों के पास कई जवाब होंगे, मसलन घूमने जाते हैं, घर के बचे काम निपटाते हैं, इंटरनेट करते हैं, हमारे ब्लॉगर दोस्त सारी छुट्टी, ब्लॉग को सरल भाव से समर्पित कर देते हैं.. आदि आदि.... लेकिन फ़र्ज़ करें आप इस धरती पर अकेले इंसान हैं और आपको बोला जाए ७ दिन बिताने को (अरे हाँ, ब्लॉगर दोस्तों से माफ़ी सहित इंटरनेट की सेवा भी हटा ली जाए)... जानता हूँ मुमकिन नहीं, लेकिन फिर सिर्फ एक बार सोच कर देखें, आपके पास टेलीविजन नहीं हो, कंप्यूटर, मोबाईल कुछ भी नहीं हो...सिर्फ आप अकेले एक सुनसान जगह पर, क्या करेंगे ??? रोंगटे खड़े हो गए न....
               अरे नहीं ये कोई ब्लॉग पोस्ट नहीं ये तो बस यूँ ही आपको परेशान करने का दिल किया, अगर आपके पास कोई बेहतरीन उपाय हो छुट्टियाँ बिताने का तो जरूर कहियेगा....  :))

                नोट :- कृपया इस पोस्ट को ज्यादा सीरियसली न लें, मैं तो बस ये चेक कर रहा था कि आप मुझे भूले तो नहीं....

Monday, September 05, 2011

मेरे टीचर तो आप हैं पापा...

             
कहते हैं भगवान् शिव ने एक बार कार्तिकेय और गणेश जी को कहा कि धरती की तीन परिक्रमा करके आओ.. कार्तिकेय तो मोर पर बैठ कर निकल लिए और गणेश जी ने अपने माता-पिता के ही तीन चक्कर लगा कर उनके पैर छू लिए... खैर पता नहीं ये बात कितनी सच है लेकिन जब आज के दिन टीचर्स डे मनाने की बात आती है तो समझ नहीं आता कि किसे-किसे विश करूँ तो इसलिए मैं भी वही कर सकता हूँ... क्यूंकि आपलोगों से अच्छा टीचर तो न मुझे आज तक मिला और न ही मिलेगा... हैप्पी टीचर्स डे माँ, हैप्पी टीचर्स डे पापा.... :-)
जब भी किसी शिक्षक  को याद करने की कोशिश करता हूँ, सबसे पहले आपका ही चेहरा नज़र आता है, आखिर आपकी दी हुई ज़िन्दगी ही तो जी रहा हूँ, न ही उसमे कुछ जोड़ा न ही घटाया... आपका सिखाया हुआ  हर एक सबक याद है, जो ज़िन्दगी के किसी न किसी मोड़ पर काम आयेंगे ही... इस ज़िन्दगी की  किताब के हर एक पन्ने का अस्तित्व बस आपके ही दम से है, जानता हूँ इस बात के लिए कोई भी पिता अपने बेटे का शुक्रिया कबूल नहीं कर सकते हैं, फिर भी वो कहते हैं न जो बात दिल से निकल रही हो उसे रोकना नहीं चाहिए... तो आज यूँ ही बस ये ख्याल हो आया कि आपके गले से लग जाऊं और प्यार से थैंक्स कह दूं, मुझे पता है आप एक हलकी सी चपत लगायेंगे और कहेंगे, पागल हो क्या, इसमें थैंक्स कहने जैसी बात क्या है... फिर भी बस यूँ ही... मेरी ख़ुशी के लिए ही सही थैंक्स कबूल कर लीजिये न...
आपकी छड़ी तो मैं आज तक नहीं भूला, जब भी कभी मैंने कोई गलती की आपकी छड़ी से कभी बच नहीं पाया, लेकिन मुझे मालूम है मेरी पिटाई से मुझे जितनी चोट लगती थी, उससे कहीं ज्यादा आपका दिल भी  तो दुखता होगा...
आखिर वो मेरे भले के लिए तो था, आज भी जब कोई गलती होने वाली होती है तो आपका ख्याल ज़रूर आता है... ये आपके दिए हुए ही संस्कार ही तो हैं जो हमेशा मेरा मार्गदर्शन करते रहते हैं... उम्मीद यही करता हूँ कि आपकी दी हुयी शिक्षा और संस्कारों का मान रख पाऊंगा, और अगर कभी कोई गलती हुयी तो आपकी छड़ी हमेशा मेरे साथ होगी, आप भी ये कभी ये सोच कर हिचकिचायियेगा नहीं कि मैं अब बड़ा हो गया हूँ, आपके लिए तो मैं हमेशा ही वही विक्रम रहूँगा जो हमेशा शैतानियाँ करता रहता था... आपकी छड़ी में छिपे आशीर्वाद के लिए मैं हमेशा तैयार मिलूंगा... आई लव यू पापा...
चलते चलते शिवम भैया की भाषा में कहूं तो, शिक्षक दिवस पर मैं अपने सभी शिक्षकों का पुण्य स्मरण करते हुए नमन करता हूँ | भगवान् उन सब को दीर्घजीवी बनाये  ... ताकि वह सब ज्ञान का प्रकाश दूर दूर तक पंहुचा सकें |
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