Saturday, July 11, 2015

जाने ये सिरफिरा कहाँ तक पहुंचेगा...

जाने इस सोहबत का असर कहाँ तक पहुंचेगा,
इस बज़्म में मेरी नज़मों का सफर कहाँ तक पहुंचेगा,

गर गुमनाम हो गयी हों इन आँखों में खामोशियाँ मेरी,
तो उन लबों में उलझे एक बोसे का असर कहाँ तक पहुंचेगा,

तेरी हर ज़िद पर नींद के बुलबुले हवा मे घुल से जाते हैं,
जाने मेरी हकीकत में तेरे ख्वाबों का घर कहाँ तक पहुंचेगा,

सजदे में झुक जाता है ये दिल तेरी मोहब्बत की इबादत में,
दुआएं लेकर निकले इन परिंदों का असर कहाँ तक पहुंचेगा,

समंदर रश्क किए बैठा है अपनी गहराई का लेकिन,
उसके एक कोने में बसा ये लावारिस शहर कहाँ तक पहुंचेगा...


Tuesday, July 07, 2015

टर्निंग 30...

खुशी एक नए पड़ाव पर पहुँचने की...
कहते हैं न, वक़्त को बीतते देर नहीं लगती... मैंने भी कहाँ सोचा था कि ज़िंदगी की धुरी पर घूमता ये वृत्त इतनी जल्दी इस मुकाम तक पहुँच जाएगा... कभी किसी रेडियो चैनल पे सुना था 30's. That's like real adulthood. क्या सच में !!! 

मुझे उस दौर के पीछे छूटने का कोई अफसोस तो नहीं है, जी भर के जिया उस वक़्त को...  

Previous decade was full of drama, fun, heartbreak, romance and many other things. I did many things right, screwed up plenty other things too and in that process I enjoyed a lot. Many things made me proud of myself, many were embarrassing. I can't say whether I am prepared for my 30's, but even I was not prepared for my 20's either. 

I don't how m gonna take up this new challenge to be as energetic as my previous era, but definitely I need to do it more. I need to buckle up for certain new challenges which are knocking the door for my next decade of life. (Will let you guys know, what I will be going through...)
समझ नहीं आता कहाँ से शुरू करूँ, किसको किसको शुक्रिया करूँ... मुझे जीवन देने वाले मेरे माँ-पापा से लेकर, मेरे हर हमसफर को, हर दोस्त-हर दुश्मन, हर सुख-हर दुख, हर ठोकर को, हर कांटे को उस हर एक शय को जिसने इस ज़िंदगी को समझने में मेरी मदद की... हर नुक्कड़, हर गली, हर सड़क जहां जहां अपने पैरों को घिसट कर ज़िंदगी की इस रेस में भागने लायक बना... हर बिस्तर, हर छत, हर घर जहां मैंने अपनी ज़िंदगी के लिए सपने देखे... मेरा लिखा हर एक पन्ना, मेरी ली हर एक तस्वीर जो मुझे मेरे होना का एहसास दिलाती है... कितना कुछ-कितने लोग, जाने कितने लोगों ने कितने तरीके से मेरी इस ज़िंदगी में अपना अपना अंश डाला है...

मुझे पता है अपने जन्मदिन पर इंसान के पास कहने को बहुत कुछ होता है लेकिन फिलहाल लोगों की शुभकामनाओं के बीच खुश महसूस कर रहा हूँ, न किसी से कोई शिकवा है न कोई शिकायत.. ज़िंदगी हमेशा खूबसूरत थी और हमेशा खूबसूरत ही रहेगी.... बस नज़रिये की बात है... और मेरा नज़रिया  उतार चढ़ाव पर ज़रूर रहे पर ज़िंदगी से मोहब्बत तो बढ़ती ही जाती है...

आज कल सोशल नेटवर्किंग का दौर है, लोगों के फोन भले न आयें दुआएं ज़रूर पहुँच रही होंगी यही उम्मीद है...

So regardless of what I feel today, I am thankful of everything, I have now more than ever.  am sure everything will fall on place where it supposed to be. Just because I am in my 30's that doesn't mean I have turned older.  I am still the same Guy with dreams in his eyes and wonder in the heart... 

Thanks everyone, Thanks Life... शुक्रिया, शुक्रिया ज़िंदगी...

Sunday, July 05, 2015

माँ, मैंने आपकी खामोशियाँ पढ़नी सीखी हैं...

वैसे तो कहा जाये तो हम तीनों भाइयों मे से सबसे ज्यादा वक़्त मैंने ही माँ के साथ बिताया है, लेकिन एक वर्किंग मदर अपने बच्चे को कितना वक़्त दे पाती है वो तो सबको पता ही है... उस कम वक़्त में भी जब माँ के पास कहने के लिए ज्यादा कुछ नहीं होता था, बस उनके चेहरे के हाव-भाव पढ़ने की ज़रूरत अपने आप महसूस हो गयी, फिर न जाने कब मैं इस काम में इतना दक्ष हो गया कि आज भी माँ कुछ कहे न कहे शब्द अपने आप बुनने लगते हैं... 

जब फोन करता हूँ उधर से आई एक हेलो की आवाज़ से सब कुछ पता चल जाता है... हो सकता है ये गुण सब बच्चे अपने हिसाब से डेव्लप कर लेते हों, और ऐसा कर लेने पर खुशी भी मिलती हो... 

आज भी आपको अपने प्रमोशन के बारे में  बताने के लिए फोन किया तो आपकी वो खामोश सी खुशी हौले हौले से मेरे दिल में उतर गयी... आपका कुछ कहना, न कहना कोई माने नहीं रखता क्यूंकी आपकी खामोशियों के शब्द तो तभी मेरे अंदर आ गए थे जब आप मुझे ये दुनिया दिखाने के लिए तैयार कर रही थीं... 

Tuesday, June 23, 2015

स्मोकिंग किल्स एंड सो डज दिस सोसाइटी...

लिखना न लिखना अक्सर मूड स्विंग पर निर्भर करता है, और थोड़ा बहुत वक़्त की उपलब्धता पर भी... लेकिन पिछले कुछ दिनों से ज़िंदगी के कई पहलू से गुजरते हुये आज वाकई निराश हूँ, इसलिए नहीं कि ज़िंदगी में कुछ अच्छा नहीं हो रहा, हम ऐसा कह भी नहीं सकते क्यूंकी शायद जब अच्छा हो रहा हो तो हम इसकी खुमारी में इतना खोए रहते हैं कि वो वक़्त कब गुज़र जाता है पता भी नहीं चलता...

ये निराशा या उदासी जो भी कह लूँ दरअसल इस बात पर ज्यादा है कि जो हो रहा है उसपर मेरा ज़ोर न के बराबर है, मैं चाह कर भी कुछ नहीं सकता सिवाय इस बात को लेकर रोने के कि ज़िंदगी के इम्तहान खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे... मुझे नहीं पता कि ज़िंदगी में इतना निराश और अकेला पिछली बार कब हुआ था, शायद तब जब तुम मेरी ज़िंदगी में नहीं आई थी... 

दुनिया से लड़ने की हिम्मत में मेरे अंदर कभी कमी ज़रूर रही हो लेकिन मैं किसी न किसी तरीके से वहाँ हमेशा पहुँच गया जहां पहुँचना चाहता था.... शायद इस बार भी पहुँच जाऊंगा, लेकिन हर बार इस लड़ाई में मेरा कितना वक़्त यूं ही जाया हो गया... ज़िंदगी की इस भाग दौड़ में अब मैं इतना समय भी नहीं निकाल पाता कि, ढंग से रुक कर दो सांस ले सकूँ, उदास होने पर थोड़ा रो सकूँ.. कहते हैं रोने से मन हल्का हो जाता है  लेकिन आज कल न रोने का वक़्त है न ही किसी बात पर दुखी होने का, ज़िंदगी बस एक रोबोट की तरह चली जा रही है....

सोचा था, कुछ बदलाव के झोंके तुम्हारे रूप में आएंगे तो ज़िंदगी शायद बदल जाएगी लेकिन अब हम दोनों के पास ही वक़्त नाम की शय कम ही गुजरती है...

बहुत दिनों बाद फ्रस्ट्रेट होकर कुछ लिखने बैठा हूँ, सिर्फ इसलिए कि किसी को कुछ कह सकूँ या अपना हाल बाँट सकूँ उतना वक़्त और भरोसा दोनों ही नहीं है आज कल...

उदास हूँ, निराश हूँ.... बस यही कि हमेशा सब ठीक ही हुआ है तो ये भी ठीक हो जाएगा....

Disclaimer:- मैं सिगरेट नहीं पीता क्यूंकी It can Kill me One day, लेकिन इस समाज का क्या जिसके  बेवकूफाना सवालातों की वजह से मैं रोज मरता हूँ... 

Tuesday, June 02, 2015

हमको कुछ नहीं आता है पर गाय हमारी माता है...

साहब- गाय हिंदुओं की माता होती है इसलिए हमें उसका सम्मान करना चाहिए, उसकी पूजा करनी चाहिए...

मैं-अच्छा साहब गाय कब से हमारी माता है, मतलब किसी वेद में किसी ग्रंथ में, कहीं ऐसा उद्धरण जहां से पता चले कि अगर हम गाय को माता न माने तो हम हिन्दू ही नहीं हैं... 

साहब- सब कुछ उद्धरित हो ये ज़रूरी तो नहीं, गाय हमारी माता है तो है, हमें उसका सम्मान करना चाहिए..... 

मैं- बराबर कह रहे हैं साहब, लेकिन फिर हम पिता, चाचा, मामा का सम्मान क्यूँ नहीं करते.... 

साहब(गुस्से में)- तुम हिन्दू हो या नहीं तुम्हें अपनी संस्कृति का मज़ाक बनाते शर्म नहीं आती....

मैं- माफ कर दीजिये सर, गलती हो गयी... अच्छा हम जो ये बेल्ट, पर्स, जूते पहनते हैं वो भी तो हमारी माँ की ही चमड़ी से बनता है, हम ये सब उपयोग क्यूँ करते हैं... आपके जूते भी तो उसके ही लग रहे हैं... 

साहब- --------------------

मैं- हमें तो ये सब रोक देना चाहिए.... 

साहब- हाँ क्यूँ नहीं हम ये सब बैन कर देंगे... 

मैं- क्या निर्यात भी बंद कर देंगे ???

साहब- ---------------------

मैं- अच्छा, जब हमारी माता सड़क किनारे कचरे में से पोलिथीन बीन कर खाती रहती है तब आप क्या करते हैं....

साहब- -------------------

मैं- अच्छा साहब, ये सब छोड़िए.... ये बताइये जो आपको असली माँ है जिसने आपको जन्म दिया है, दिन भर में कितने घंटे आप उसकी सेवा करते हैं.... 

साहब- -------------------
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