Saturday, March 19, 2011

देखते देखते होली आ गयी और पता भी नहीं चला...

             क्या आपमें से किसी को पता चला, कल होली है... क्या आज भी वही उत्साह है आपके मन में जो बचपन में पिचकारी और गुलाल देख कर आता था... अरे ये क्या कह रहे हैं आप, अब उम्र नहीं रही... अजी छोडिये... आज भी निकलिए तो होली के दिन घर से बाहर, जब चार यार मिल जायेंगे वो उम्र भी लौट आएगी और वो उमंग भी...
             अरे ज्यादा सोचिये नहीं, अच्छा बुरा सोचने का वक़्त नहीं है...लौटिये उसी दुनिया में और खो जाईये... अपने इस ब्लैक एंड व्हाईट हो चुके मन को रंगों से भर दीजिये... और हाँ रंग लगाने में कमी मत कीजियेगा... कुछ तस्वीरें देखिये हमारी होली की....







 
             और ज्यादा कुछ नहीं , बस आप सभी को होली की ढेर सारी शुभकामनाएं...

Wednesday, March 16, 2011

बस यूँ ही आज तुम्हारी याद आ गयी...

           जब कभी उन बीते लम्हों की अलमारी खोलता हूँ तो बेतरतीबी से बिखरी हुयी यादें भरभरा के बाहर गिर पड़ती हैं ... न जाने कितनी बार सोचा कि उन्हें करीने से सजा दूं लेकिन कभी जब बहुत बेचैन होता हूँ तो मन में उठते हुए उबार किसी एक ख़ास लम्हें की तलाश में जैसे सब कुछ बिखेर देते हैं...
           तुम्हें वो पीपल का पेड़ याद है जहाँ तुम हर सुबह अपनी स्कूल बस का इंतज़ार करती थी, और मैं किसी न किसी बहाने से वहां अपनी सायकिल से गुज़रता था... तुम्हें बहुत दिनों तक वो महज एक इत्तफाक लगा था... तुम्हें क्या पता ये इतनी मेहनत सिर्फ इसलिए थी कि इसी बहाने एक बार तुम मुझे मुस्कुरा कर तो देखती थी, और कभी कभी तो मुझे रोक कर थोड़ी देर बात भी कर लेती थी.. वो ख़ुशी तो त्यौहार में अचानक से मिलने वाले बोनस से कम नहीं होती थी...
         प्यार करना भी उतना आसान थोड़े न है, वो देर रात तक सिर्फ इसलिए जागना क्यूंकि तुम्हारे कमरे की बत्ती जल रही होती थी, आखिर कभी कभी खिड़की से तुम दिख ही जाती थी... ऐसा लगता था जैसे खिड़की के उसपार पूनम का चाँद उतर आया है...
           यूँ वजह-बेवजह तोहफा देने की आदत भी तुम्हारी अजीब थी, पता तुम्हारी दी हुयी हर चीज आज भी संभाल कर रखी है...  वो बुकमार्क जो फ्रेंडशिप डे पर तुमने दिया था, आज भी मेरी किताबों के पन्ने से मुझे झाँक लिया करता है... और वो घड़ी, कलाई पर आज भी उतने ही विश्वास से टिक-टिक कर रही है, और तुम्हारे साथ बिताये हुए लम्हों की याद दिला जाती है...
         जब मैं तुम्हें बिना बताये छुट्टियों में पहली बार पटना से घर आया था, कैसे पागलों की तरह चीखी थी तुम, तुम्हारी आखों की वो चमक मंदिर में जलते किसी दीये की तरह थी, जो जलने पर अपनी लौ में कम्पन कर किसी नैसर्गिक ख़ुशी को व्यक्त करता है... उन खूबसूरत आखों में आंसू भी खूब देखे हैं मैंने, तुम्हारे पापा की बरसी पर जब तुम्हारे आंसुओं ने मेरे कन्धों को भिगोया था, मैं अपने आप को कितना बेबस महसूस कर रहा था... उस समय तुम्हारी एक मुस्कराहट के बदले शायद सब कुछ दे सकता था मैं...  उन आखों को चाहकर भी भुला नहीं पाया हूँ..
                    एक अरसा हुआ उन आखों को देखे हुए लेकिन इतना यकीन है कि उन आखों में आज भी वही चमक और वही मुस्कराहट तैरती होगी, भले ही उसका कारण अब मैं नहीं हूँ....

Sunday, March 13, 2011

भारतीय मुद्राओं का दुर्लभ संग्रह....


               आज मैं आपके लिए लाया हूँ कुछ पुराने भारतीय नोट की तस्वीरें जो अब प्रचलन में नहीं हैं, आपमें से कुछ लोगों ने शायद इनका प्रयोग किया हो लेकिन अधिकाँश लोगों ने देखा भी नहीं होगा.... उम्मीद है आपको मेरा ये प्रयास पसंद आएगा... 






 


























 

 
                अगर आपके पास भी कुछ ऐसे ही सिक्के या नोट हों तो हमसे ज़रूर शेयर करें...

Thursday, March 10, 2011

ये देखकर आप मुस्कुराये बिना न रह सकेंगे....

मुझे गिलहरी बहुत अच्छी लगती हैं.. ये तस्वीरें देखी, अच्छी लगीं तो मैंने यहाँ लगा दीं.... 

 

Wednesday, March 09, 2011

क्या किसी परीक्षा का परिणाम आपकी ज़िन्दगी से ज्यादा कीमती है ? Students Suicide..

                परसों शाम में एक बहुत ही दुखदायी खबर मिली, मेरे इंजीनियरिंग कॉलेज की पंजाब शाखा में पढने वाले प्रथम वर्ष के एक छात्र  ने आत्महत्या कर ली, वजह ख़राब रिजल्ट | मात्र १९ वर्षीय पटना के इस छात्र ने शायद कुछ ज्यादा ही हताश होकर ये कदम उठा लिया | भगवान् उसकी आत्मा को शान्ति दे | लेकिन इस घटना ने एक बार फिर सभी को सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर क्यूँ ???
        ( ये चित्र फिल्म ३ IDIOTS से लिया गया है )       

                आत्महत्या, ये शब्द कोई नया नहीं है | सदियों से लोग आत्महत्या करते आये हैं, बस परिस्थितियाँ बदल गयी हैं... पहले एक गरीब किसान या मजदूर अपनी गरीबी या भुखमरी से तंग आकर आत्महत्या करता था और आज भारत के श्रेष्ठ संस्थानों में पढने वाले युवा एक ज़रा सी नाकामयाबी से तंग आकर अपनी ज़िन्दगी ख़त्म करने जैसा कदम उठा लेते हैं | अरे आत्महत्या तो चंद्रशेखर आज़ाद ने भी की थी, लेकिन क्या उस परिस्थिति की तुलना आज के परिपेक्ष्य में की जा सकती है ???
                छात्रों और छात्राओं की आत्महत्या की बढती घटनाओं के पीछे सबसे बड़ा कारण है आगे निकलने की होड़, लगातार बढती ये प्रतिस्पर्धा हमारे दिमाग पर इतना प्रभाव डाल रही है कि एक ज़रा सी असफलता और हम उत्साह खो देते हैं...
                वैसे मेरा निजी विचार ये है कि बच्चे अपने रिजल्ट से नहीं बल्कि उसका प्रभाव उनके घर में क्या होगा इस डर में आत्महत्या करते हैं.... आज के समय में माता-पिता कुछ ज्यादा ही सख्त होते जा रहे हैं.... बच्चों को विश्वास में रखना जरूरी है... 
                मैं अभी भी विद्यार्थी जीवन से ही गुजर रहा हूँ इसलिए इस हताशा को समझ सकता हूँ, लेकिन इस हताशा को इतना भी बढ़ने नहीं दिया जाए कि आत्महत्या की नौबत आये... अपने लिए कुछ हलके फुल्के लम्हें तलाश करें, अगर आपका कोई शौक हो तो उसको भी थोडा समय दें... बाकी आप लोग खुद समझदार हैं...
               
                अंत में सभी माता-पिताओं से भी एक गुज़ारिश करना चाहूँगा, अपनी व्यस्त दिनचर्या में से थोडा समय अपने बच्चों के लिए भी निकालें, अपनी आकाँक्षाओं और सपनों का बोझ उनपर न डालें.. उनको भरोसे में लें, उनको ये विश्वास दिलाएं कि किसी भी परीक्षा का परिणाम उनकी ज़िन्दगी से ज्यादा कीमती नहीं है | याद रखें ये ज़िन्दगी अनमोल है, और इसको संभाल कर रखने में उनकी मदद करें......

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चलते चलते ये गीत भी सुन लें...
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