Friday, November 20, 2015

यूं ही सफर में सोचते-सोचते...

लोग कहते हैं इश्क़ और मेरे लबों पर तुम्हारा नाम अपने आप आ जाता है....

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बंगलौर में
दूधिया कोहरा नहीं पसरता है कभी,
लेकिन तुम्हारे दूर होने से
मेरे दिल पे जो
उदासी का कोहरा है
उसमे मुश्किल हो जाता है
ढूँढना खुद का ही वजूद....

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जब तुम्हारे हिस्से का
आसमान उदास होगा
तो मेरे कमरे के बादल
और घने हो जाएँगे,
उस अंधेरे में
मेरे दिल की
थमी सी धड़कन
पहचान लोगी न....


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चलो न कहीं वादियों में एक छोटा सा प्लॉट लेकर डालते हैं प्यार के बीज और उगाते हैं इश्क़,
दुनिया में प्यार कम हो चला है इन दिनों...

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समंदर की गहराई की कसम खाने वाले लोग अकसर तुम्हारी आँखें देखकर अपनी जान गंवा बैठते हैं....
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ज़िंदगी के हर मोड पर किनारा तलाशते तलाशते कुछ साल पहले मुझे तुम्हारी आँखों की पलकों का सहारा मिल गया था, ऐसा लगता है जैसे किसी पिछले जन्म की बात है.... 

Wednesday, November 04, 2015

किस्सा कुर्सी का और असमंजस वोटर का...

एक तरफ वो गठबंधन है जिसने अब तक मुखमंत्री तक डिक्लेयर नहीं किया है, जीत जाने के बाद आपस में ही मार काट मचने वाली है... बिना अच्छे नेतृत्व के बिहार को चलाना और आगे बढ़ाना, भैंस के ऊपर गीत गाने जैसा है... केवल मोदी के हवाई जुमलों के नाम पर यहाँ वोटर उनको वोट दे देगा ऐसी गलतफहमी तो उनको नहीं ही पालनी चाहिए.... महा प्रधान खुले आम अपनी जाति बघारते हुये और आरक्षण बढ़ाने की बात कर रहे हैं, उस आरक्षण के लिए उनके हिसाब से वो अपनी जान की बाज़ी लगा देंगे, हालांकि जाति प्रथा के ऊपर एक लाइन भी कहीं बोलते नहीं दिखे... ज़ाहिर हैं उनको जाति प्रथा बनाए रखनी है तभी तो आरक्षण की रोटी सिकेगी...
दूसरी तरफ महागठबंधन है, जिसके साथ ऐसे लोग खड़े हैं जिनका भूतकाल खंगाला जाये तो आपके दिमाग का बफर खत्म हो जाएगा लेकिन काले कारनामे खत्म नहीं होंगे... व्यापारी और शिक्षित वर्ग वो #गुंडाराज अब तक नहीं भूला होगा...

कई लोगों का कहना है मुख्यमंत्री तो नितीश होने हैं फिर क्या तकलीफ है, तकलीफ ये हैं कि नितीश कितना भी अच्छा बोलते हों(करते भी हों) लेकिन दोनों जेब में दो छुरी लेकर वोट मांगने आए हैं....

परेशानी ये भी है कि कोई भी बिहार का विकास नहीं करना चाहता, उनको पता है जैसे जैसे यहाँ के लोगों को बाकी दुनिया की पटरी से जोड़ने लगेंगे, यहाँ उनकी जाति वाली राजनीति दम तोड़ने लगेगी... इतना तो निश्चित है 80 प्रतिशत वोट तो इस बार भी जाति के आधार पर ही पड़ेंगे...

बिहार से जुड़े हजारों मुद्दों को छोडकर आजकल तंत्र-मंत्र-ज्योतिष पर जुमले फेकने का दौर है, जैसे हमारे पास और कुछ नहीं बचा हो बात करने को...

बिहार का वोटर असमंजस में है... पिछली कई सालों से लालू को एक सिरे से हटाने के कोशिश करने वाली भीड़ इस बार लालू(महागठबंधन) को ही वोट करेगी....

इन सब असमंजस से अलग मैं जा रहा हूँ कल वोट देने, जो भी मेरी नज़र में सबसे अच्छा और शिक्षित उम्मीदवार है चाहे वो निर्दलीय ही क्यूँ न हो... वोट तो डालना ही पड़ेगा, कीमती है मेरा वोट...

Sunday, August 30, 2015

मैं इश्क़ लिखूंगा तो पढ़ोगी न...

इस शहर में बरसों से कोई नहीं आया...
बस एक सुराख़ रख छोड़ा था आसमान में
जहाँ से धूप आती है सवेरे-सवेरे,
और कभी कभी बरसात भी वहां ठहर कर जाती है...
 
याद है तुम्हें, उस आसमान में जो एक सुराख छोड़ा था कुछ साल पहले, उसके नीचे अब बहुत बड़ा जंगल उग आया है.... अलग-अलग तरह के दरख़्त है उसमे, कुछ फूलों की कोमल पंखुड़ियाँ भी अठखेलियाँ करती हैं... सबके अलग-अलग रंग, अजीब अजीब सी खुशबू ... इसको अलग अलग छांट नहीं सकते, किसी की कोई अलग पहचान नहीं सब गडमड सा, सुहाना... 

ये जंगल एकदम सपनों सरीखा है न, सपना ही तो है...  क्यूंकि हकीकत में आस-पास देखो तो अजीब ही माहौल है...
मुझे नहीं लगता ये सही वक़्त है प्रेम कवितायें लिखने का जब आस-पास नफरत है, आग है, बरबादी है... लेकिन एक आखिरी सत्य तो प्रेम ही है न, बाकी सब तो तीखा है जहर से भी तेज़.... प्रेम में अगर दर्द भी है तो खट्टा सा है, एक चुटकी सपनों का नमक डाल दो सब जन्नत है....

तेरा रंग उलझ गया है,
मेरी नींद में कहीं
जो आधी रात कभी खुल जाये नींद तो
आस-पास दिखता है
तेरे प्यार का इंद्रधनुष....

तो इस शहर में कितना भी धुंधलका हो मैं प्रेम ही लिखूंगा हमेशा.... 

वक़्त के दरख़्त से बने इस कागज पर
गर मैं इश्क़ लिखूंगा तो पढ़ोगी न..

Wednesday, July 22, 2015

खरोंच...

ज़िंदगी एक मिथ्या है,
ज़िंदगी में खुश रहना एक मृगतृष्णा...
खुशियाँ चिराग है एक रोशनी का,
और उसके ठीक नीचे छुपा है गमों का अंधेरा...

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तुम्हारी आखें एक झूला है,
जिसमे मैं ज़ोर ज़ोर से उड़ान भरता हूँ,
पर तुम्हारे हर एक आँसू के साथ
पलट कर ज़मीन पर गिर जाता हूँ...

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ये तन्हाई की खरोंच
दिल तक बहुत ज़ोर से छिलती है,
इस चुभन को निहारते हुये
क्या मैं रो सकता हूँ सुकून से दो पल के लिए...

Monday, July 20, 2015

ज़िंदगी खूबसूरत है, काश ये बात सच हो...

अपने देश से हर किसी को प्यार होता है... पर भारत के लोगों का प्यार थोड़ा अलग है, उन्हें साफ-सुथरा देश चाहिए लेकिन सफाई नहीं करना चाहते, रिश्वत से उन्हें सख्त नफरत है लेकिन कुछ रुपये देकर काम बन रहा हो तो ज़रा भी पीछे नहीं हटते, बचपन में जाति-प्रथा, दहेज-प्रथा पर निबंध किसने नहीं लिखे होंगे लेकिन पूरी ज़िंदगी इन सब चीजों के सहारे ही निकालते हैं... एक दूसरे को प्रेम करना सिखाते हैं(बस सिखाते हैं) लेकिन प्रेम विवाह का नाम आते ही बिना जाने-समझे पहला जवाब ना ही होता है, कुछ बेहतरीन जगहों पर तो प्रेमी जोड़े को इस दुनिया से ही मोक्ष दे दिया जाता है... पूजा में कुंवारी कन्यायों को देवी बनाकर पूजा करते हैं फिर उनका ही खुले आम शोषण भी करते हैं... बच्चों को सिगरेट न पीने की सलाह देते हैं लेकिन खुद छुपकर चैन स्मोकर कहलाने में कूल महसूस करते हैं...

अपने भातीय समाज का ये दोहरी चादर वाला प्यार देखकर मन परेशान हो चुका है, अब तो यहाँ से जड़ें जुड़ गयी हैं मेरी भी, चाहकर भी उड़ान नहीं भर सकता... यहाँ लोग अलग अलग तरीके से अपने भारतीय होने पर गर्व करते हैं, पर मुझे आज कल दुख ज्यादा होता है इस बात का...

मैंने अपनी मर्ज़ी से एक निर्णय लिया और न जाने कितने रिश्ते पल भर में बदल से गए, मेरे भी और उसके भी... समझ नहीं आता कहाँ जाकर अपनी खुशियों की दुहाई माँगूँ... मैं कमजोर नहीं पड़ रहा लेकिन इन बेफिजूल की बातों में हिम्मत दिखाने से खुद को भी चोट लगती है... 

इतनी बात तो पक्की है अगली बार भारत में तो जन्म नहीं लेना चाहता, ऐसी किसी भी जगह नहीं जहां इंसान अपनी मर्ज़ी से अपनी ज़िंदगी के फैसले न ले सके, उसके लिए उसे समाज की इजाजत लेनी पड़े... आपको ऐसा देश मुबारक, उसपर गर्व करते रहिए....
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