Sunday, September 02, 2018

बहुत धीमी बहती है मोहब्बत लोगों की रगों में...

बहुत धीमी बहती है मोहब्बत लोगों की रगों में,
नफरत से कहीं धीमी...

नफरत इतनी कि
सड़क पर अपनी गाड़ी की
हलकी सी खरोंच पर भी
हो जाएँ मरने-मारने पर अमादा,

और मोहब्बत इतनी भी नहीं कि
अपने माँ-बाप को लगा सकें
अपने सीने से
और कह सकें शुक्रिया...

बहुत धीमी बहती है मोहब्बत लोगों की रगों में,
नफरत से कहीं धीमी...

मोहब्बत सिगरेट की फ़िल्टर सी है,
नफरत का सारा धुंआ खुद से होकर गुजारती है
सारी नफरत ले चुकने के बाद
हम उस मोहब्बत को ही फेक देते हैं
और कुचल देते हैं
अपनी जूतों की हील से
और नफरत !!
वो तो समा चुकी है हमारे सीने में टार बनके...

बहुत धीमी बहती है मोहब्बत लोगों की रगों में,
नफरत से कहीं धीमी...

Thursday, March 22, 2018

बस एक बेहतर कल की तलाश में...

मैं घिसता हूँ खुद को हर रोज,
खुद को खुद से आगे निकालना चाहता हूँ,
ये रगड़ एक आग पैदा करती है
मैं अकेला बैठ कर जल जाता हूँ हर शाम उसमें...
थक कर, घायल होकर
सवाल फिर खुद से ही करता हूँ
कि क्या ज़रुरत है इस संघर्ष की
दिल भी कन्धा उचका कर दे देता है जवाब,
"शायद बस एक बेहतर कल की तलाश में..."

मैं निराश होता हूँ क्यूंकि
मैं वो नहीं बन पाया
जो शायद बनना ज़रूरी था मुझे,
फिर भी मैं हर रोज लड़ता हूँ
निराशा को दरकिनार करता हूँ,
"शायद बस एक बेहतर कल की तलाश में..."

मेरे पास हर उस कल के सपने हैं,
जो कल नहीं आया अब तक
पता नहीं वो कल कभी आएगा भी या नहीं,
मेरे तले ज़मीं भी रहेगी या नहीं तब तक...

मेरा आज मुझे धिक्कारता है
क्यूंकि मेरा आज कभी आने वाला कल था
जिसकी फ़िक्र मैंने कभी नहीं की
और अब मैं अपना आज गंवा बैठा हूँ
"शायद बस एक बेहतर कल की तलाश में..."

ज़िन्दगी से कई सवाल हैं मेरे,
मैं नोटबुक में लिखता रहता हूँ
जो कभी उस दुनिया में कभी सामना हुआ तो
पूछ पाऊं उन सवालों को
फिलहाल तो आज बस मैं सवाल ही लिखता जा रहा हूँ
"शायद बस एक बेहतर कल की तलाश में..."

लगता है कि शायद कभी
किसी मोड़ पर गर
पर्दा गिराना हो इस ज़िन्दगी के नाटक से
तो क्या वो भी कर लूंगा मैं,
"शायद बस एक बेहतर कल की तलाश में..."

Friday, February 09, 2018

कसक...

कभी-कभी बैठे बैठे अचानक से हम दूर कहीं पीछे छूट चुकी याद के सिरे टटोल बैठते हैं... आज ऑफिस से वापस आते हुए कोई पुराना सा लम्हा आकर मेरी आखों के सामने पसर गया... 

इस खुशनुमा मौसम में अचानक से कसक सी उठी, तुमसे बात न कर पाने की कसक... मुझे नहीं पता कि ऐसा क्या है जो वो सुकून नहीं भूल पाता जो हर उस इंसान के साथ रह के मिलता जिसे मैं पसंद करता हूँ. मैं अपनी ज़िन्दगी के सबसे प्यार भरे दौर में हूँ और मैं तुम्हें बताना चाहता हूँ कि मैं बहुत खुश हूँ इन दिनों... मुझे यकीन है जैसे मैं तुम्हें खुश देखकर खुश होता हूँ, तुम भी ज़रूर होगी... याद है तुमने एक बार कहा था "आप जहाँ भी, जिसके साथ भी रहेंगे हमेशा खुश रहेंगे और उसे भी रखेंगे जिसको ये खुशनसीबी हासिल होगी..." मैं शायद उस वक़्त नादान था बहुत, कभी सोचा नहीं था कि ये बात आज 16 सालों बाद भी मुझे याद आ जायेगी... कितनी सच थी ये बात, आज मैं सच में बहुत खुश हूँ और यकीन है उस इंसान को भी वो सारी ख़ुशी दे रहा हूँ जिसकी उसने तमन्ना की हो... सच कहूँ तो तुम्हारे यूँ अचानक से चले जाने का असली दुःख ये है कि मैंने एक बेहतरीन दोस्त भी खो दिया, वो दोस्त जिसके पास मेरी हर बकवास सुनने का वक़्त था और मेरी हर गलती सुधारने का भी... 

तुम्हारी उस "हर कोई धोखेबाज है इस दुनिया में.." वाली बात पर जब मैंने कहा कि मैंने तो कभी किसी को धोखा नहीं दिया कभी, तो तुमने कहा था.. "आप तो यूनिक टाइप हैं, आपको तो यही नहीं पता कि धोखा कैसे देते हैं, आप क्या धोखा दीजियेगा किसी को..." तुमने ये भी तो कहा था कि "अपने तरह का मत खोजिएगा कभी, पता नहीं शायद कभी मिले ही नहीं..." मैं आज तुमको बताना चाहता हूँ कि ऐसा कोई मिल गया है मुझे... उसे भी नहीं आता है किसी को धोखा देना... 

मैं फिर से उस इंसान से मिलना चाहता हूँ जिससे 17 साल पहले मिला था, बस इसलिए कि कुछ चीजों को रीसेट कर सकूं... बस इतना ही कि हम कम से कम ऐसे तो बने रहें कि आज तुमको बता सकूँ कि मैं खुश हूँ... 

मालूम है, ऐसा कुछ अब नहीं हो सकता... 

Sunday, November 05, 2017

अपने सबसे प्यारे दोस्त को ताउम्र खुश रख पाने का सुख.....

कभी-कभी लगता है जैसे मैं कई सारे झूठे-सच्चे सपनों का सौदागर हूँ... अब तो इस बात से फर्क भी नहीं पड़ता कि कितने सपने पूरे हो रहे हैं और कितने अधूरे छूटते जा रहे हैं.... कभी मैंने खुद ने कभी इन हालातों ने न जाने कितने सपनों को पीछे छोड़ दिया और आगे बढ़ गए... फिर भी मैं हर रोज एक सपना देखता हूँ और पूरी शिद्दत से उसे पूरा करने में जुट जाता हूँ... कितनी ही बार ऐसा हुआ कि जैसे पूरी कायनात ने किसी सपने को पूरा करने की राह में रोड़े अटकाए हों लेकिन मैं भी किसी मंझे हुए फुटबॉल खिलाड़ी की तरह ड्रिबल करते हुए अपने सपनों को गोल पोस्ट की तरफ लिए चले जाता हूँ... मुझे मेरे सपनों से अलग करना वैसे ही होगा जैसे शिकंजी से चीनी निकालना... इन सारे सपनों को मैं किसी अन्तरिक्ष यान में छोड़ देना चाहता हूँ, ताकि ये सारे सपने अनगिनत ध्रुव और परिधि बनाकर तुम्हारे आस-पास चक्कर काटते रहें... मुझे पता है, कभी जो कोई सपना अगर उल्का बन गया और खूब तेजी से तुम्हारी तरफ बढ़ेगा तो तुम दोनों हाथ पसारे उसे अपने सीने से लगा लोगी, ठीक वैसे ही जैसे जब हम कई दिनों बाद मिलते हैं तो तुम खूब जोर से मेरे सीने से चिपट जाती हो... जैसे ही वो उल्का बना सपना तुमसे लिपट जाएगा, तुम्हारे मन के आसमां में ढेर सारी रौशनी पसर जायेगी और उस रौशनी में तुम देखोगी कि मैं वहीँ खड़ा तुम्हारे लिए और ढेर सारे सपनों के समंदर बुन रहा हूँ... 

तुम्हारी ये खिलखिलाती सी मुस्कुराहटें, हज़ारों बहते हुए समन्दरों पर मेरे ख़्वाबों का आपतन बिंदु है... जब तुम हंसती हो तो मुझे इस दुनिया की सारी बंदिशों के खिलाफ जाने का दिल करता है, जैसे तुम्हारे चेहरे पर आने वाली हर मुस्कान के लिए ऐसे हर जहाँ हर बार कुर्बान... बहुत साल पहले मुझसे किसी ने कहा था कि मैं डूब कर मोहब्बत करता हूँ, पर मुझे लगता है जो डूब ही न पाए वो मोहब्बत ही कहाँ है भला... 

तुम जब भी मुझसे पूछती हो न कि "मैं क्या कर रहा हूँ..." और मैं जवाब दे देता हूँ, "कुछ नहीं... "
मेरा ये "कुछ नहीं..." समझ लो एक खाली गुल्लक है, जिसमे तुम अपने ख़्वाबों के सिक्के डालती जा सकती हो ता उम्र... इस गुल्लक से आती हुयी खनखनाती सी आवाज़ के भरोसे ही तो मेरी सांस चलती है इन दिनों..  ये "कुछ नहीं..." ही सब कुछ है मेरे लिए क्यूंकि इस "कुछ नहीं... " से ही मैं अपना "सब कुछ" तुम्हारी इन छोटी-छोटी हथेलियों में डाल के सुकून से चल सकता हूँ उन अनगिनत जन्मों के सफ़र पर तुम्हारे साथ.... 

इस दुनिया में कई सारे सुख हैं लेकिन मेरे लिए सबसे बड़ा सुख है अपने सबसे प्यारे दोस्त को ताउम्र खुश रख पाने का सुख.... 

Sunday, September 03, 2017

वक़्फ़ा...

मुझे कटिहार का वो बचपन याद आता है, मासूम से थे वो दिन, मैं दुनिया समझने की कोशिश कर रहा था, मैं उन दिनों कहानियां पढता था... फंतासी वाली कहानियां.. परियों की कहानियां, जादू की कहानियां, सुपर हीरोज की कहानियां... उन कहानियों को पढ़ते-पढ़ते शायद मैं इतना ज्यादा खो गया था कि मुझे सालों तक ये लगता रहा कि शायद किसी दिन कोई परी आकर मेरे हाथों में मेरी छोटी बहन रख जायेगी, मैं बस उसे प्यार ही करता रहूँगा और यही है मेरा जीवन... उन दिनों मैं जम कर गलतियां करता था, बेवकूफों वाली गलतियां और अपनी ही गलतियों पर हंस दिया करता था.. बार बार एक ही गलती करता था... 

मुझे पटना का वो पागलपन याद आता है जब मैंने ज़िन्दगी को पहली बार अपने नज़रिए से देखना शुरू किया था... उन दिनों जैसे पैर ज़मीं पर ही नहीं थे, कितना कुछ नया हो गया था, सबसे मीठा वाला इश्क़... एकदम हरी दूब के टूसे जैसा कोमल जिसपर मैंने अपने सपनों को पानी की बूँद सरीखा सज़ा दिया था... उन दिनों ऐसा लगता था जैसे कभी कुछ गलत हो ही नहीं सकता, दुनिया में सब अच्छे हैं... एक दोस्त ने तब कहा था कि मुझे देखकर ऐसा लगता है कि मैं आज तक बस अच्छे इंसानों से मिला हूँ और मुझे सब अच्छा ही अच्छा नज़र आता है... शायद बात सच भी उतनी ही थी, सब कुछ तो अच्छा था जैसे... बिना किसी शक वो मेरी ज़िन्दगी के सबसे हसीं दिन थे... 

मुझे हिमाचल की सर्दियां याद आती हैं, उन सर्दियों में मैंने ज़िन्दगी का रुखड़ा सा हिस्सा भी चख लिया... दुनियादारी सीखी, सही गलत इंसानों का फर्क महसूस किया और फिर वो एक दिन... सब कुछ जैसे थम गया, पहली बार मैंने तन्हाई महसूस की... सपने-ख्व़ाब-परियां-इश्क़ सब कुछ राख़ में तब्दील कर दिया... भले ही 10 साल हो गए लेकिन कई-कई रातों तक भीगे उस तकिये की नमी आज भी मैं अपनी आखों में महसूस करता हूँ, उस राख के रेशे आज भी ख़्वाबों में भूले भटके आ ही जाते हैं... और अजीब बात ये कि उस वक़्त तो मुझे शिकायत करना भी नहीं आता था, बस खुद में घुट कर रह गया... मैंने तो अपने आस-पास बस फूल ही उगाये थे फिर जाने कहाँ से ये काँटा आकर इतना गहरा चुभ गया... फिर एहसास हुआ कि पर कुदरत की मूंगफलियाँ ज़मीं के नीचे दबी होती हैं और नज़र भी नहीं आती...

मैं भी दीवाना था न आखिर, मैंने सोचा अब अपने आस-पास कैक्टस ही कैक्टस उगा लेता हूँ... मेरी जिद थी कि अगर मेरे शरीर में कहीं भी दरारें पड़ी तो वो मेरी खुद की बनायीं गयी होंगी... मेरे आलावा और किसी को इतना हक ही नहीं दूंगा जो मुझे नुक्सान पहुंचा सके.. मैं अब भी इन्हीं कैक्टसों के बीच में हूँ, खुद को छिलता रहता हूँ... ये एक लड़ाई दरअसल खुद के ही साथ है... अब मुझे गलतियां बिलकुल भी पसंद नहीं आती, मुझे अपने खुद के ख्व़ाब बेमानी लगते हैं... मुझे अब यहाँ से बाहर निकलने में डर लगता है, मैं वल्नरेबल नहीं बनना चाहता फिर से... मैं कईयों के लिए गलत बन गया हूँ, उन्हें बस मेरे आस-पास के कैक्टस नज़र आते हैं... जिस इंसान को दुनिया में सब कुछ अच्छा नज़र आता था आज वो शायद खुद ही बुरा सा कुछ बन के रह गया है... 

दूर बादलों के पीछे एक गज़ब का तीरंदाज़ है, हम उसके निशाने से बच नहीं सकते... 
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