Thursday, January 23, 2020

एग्जामिनेशन सेंटर...

उन दिनों शायद
मेरा एक ही मक़सद हुआ करता था
कि किसी तरह पता चले
तुम्हारा कहीं कोई
इग्ज़ाम तो नहीं,
या कोई इंटर्व्यू ही हो,

और ज़िद करूँ
तुम्हारे साथ चलने की
तुम्हारे एग्जामिनेशन सेंटर तक,
कि जब तक तुम देती रहो इग्ज़ाम
मैं इंतज़ार करूँ तुम्हारा
वहीं कहीं बाहर
किसी चबूतरे पर बैठे हुए
या किसी पेड़ के नीचे,

बाहर के किसी ठेले से
खायी वो दो बेस्वाद इडलियों
का स्वाद घुलता रहे
इग्ज़ाम के ख़त्म के होने के इंतज़ार में...

फिर पूछूँ तुमसे कि कैसा हुआ सब कुछ,
तुम सुनाओ उन सवालों को
और कैसे तुमने हल कर दिया उन्हें,
और फिर वापस चल पड़ें
हॉस्टल की तरफ़
बस में बैठकर,
ऐसे ही किसी लाल एसी बस में
बैठे बेखयाली में
तुम्हारा हाथ पकड़ लिया था,
तो चौंक गयी थी न तुम...

उन दिनों बस तुम्हारे साथ ही
दिल करता था रहने का,
अब जब बातें वो बीत गयी
तो लगता है
इतना मुश्किल था क्या
साथ निभा जाना उस इंसान का,
जिसने तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ा था
एग्जामिनेशन सेंटर में भी नहीं...

Saturday, January 18, 2020

सीधी-सादी कविताएं...

उसे पसंद है सीधी-सादी कविताएं
जिनमें शब्दों के जाले न बुने गए हों
जिनमे बस बदहवास
प्रेम लिखा और कुछ नहीं
न उर्दू अल्फ़ाज़ों से खेला हो मैंने
न ही कोई विम्ब ऐसा
जो उसे समझ न आये
जिसमें भाव के अंदर
कोई और भाव न छुपा हो
इन्सेप्शन की तरह..

मैं उठाता हूँ अपनी डायरी 
खोजता हूँ कि 
लिखा हो शायद 
कुछ ऐसा आसान सा 
फिर लगता है जब 
ज़िंदगी ही कभी इतनी आसान न थी
तो लिखता कैसे... 

अब आसान सा लिखूँ 
तो झूठ लगता है,
उतना ही झूठ 
जितनी कुछ बीती बातें 
लगने लगी हैं आज कल... 

Friday, December 27, 2019

खुद को बचाये रखना...


उन्होंने कहा कि आंधियों में दीया जलाए रखना,
बिखरेंगे हज़ार घर, पर ख्वाबों वाला बचाये रखना,

इन उखड़ते हुये पेड़ों पे कई घोंसले थे चिड़ियों के,
इन परिंदों में तुम उड़ने का हौंसला बचाये रखना...

लोगों का क्या, वो नफरत लिखेंगे हज़ार तेरी हथेली पर, 
तुम बस दिल में बसी मोहब्बत पर भरोसा बचाए रखना

इस रंग बदलती दुनिया में लोगों के वजूद बदलते हैं
तुम खुद के अंदर खुद को बस बचाये रखना... 

Monday, November 11, 2019

हम और क्या करते...

हुये इतने मजबूर तो मोहब्बत क्या करते,
कभी छुड़ाते दामन कभी बे हौसला करते

बेवफा कहती है हमें तो कह ले दुनिया,
वफा का तलबगार होके भी हम क्या करते,

सीने से मुझे लगा के भी जो तू इतना रोती थी
तो अलविदा कहते नहीं तो और क्या करते,

मिजाज मेरा तेरी मुफ़लिसी पे आ गया था
पर जब हम खुद ही अधूरे थे तो क्या करते

इंतज़ार करने को तेरा हम तैयार थे ताउम्र
तूने रास्ता ही बदल लिया तो हम क्या करते

एक आँसू देखकर जब दिल बुझ सा जाता था
उन आँखों में समंदर देखते तो हम क्या करते... 

Wednesday, July 03, 2019

फुल स्टॉप ...

जैसे ही हम किसी बात पर ये कहते हैं कि "ये मेरी ज़िन्दगी है...", उसी वक़्त एक तीरंदाज़ हम पर हंस रहा होता है, हम हर वक़्त उसके निशाने पर हैं... ठीक उसी वक़्त जब ज़िन्दगी में पहली बार ऐसा कुछ विकास के पास था जो उसकी ज़िन्दगी का सार था, ज़िन्दगी ने उल्टा सा रुख कर लिया... वो अकेला बैठा बस रोता रह गया जैसे...

उसे पता है, ये बोझ बहुत भारी है और ज्यादा वक़्त तक नहीं उठा पायेगा ... लेकिन अंशु को मुस्कुराते हुए देखने के लिए शायद खुद के आँसू छुपाने का इम्तहान है... प्यार निभाने के कई सारे तरीके हैं, विकास के लिए सबसे कठिन रास्ता चुना है उसकी किस्मत में... काश अंशु ये समझ पाती कि विकास कितना बिखर जाएगा, जिन ख़्वाबों के बगीचे उसने उगाने के सोचे थे उन ख़्वाबों को पत्थर बना कर खुद को कैद करता जा रहा है धीरे धीरे... इन दिनों उसे अपना नाम तक ध्यान नहीं रहता...

विकास बिखरने से ठीक पहले एक आखिरी बार संवरना चाहता है. पर अंशु ने साथ चलने से मना कर दिया है....  कई सालों तक जगजीत सिंह ने विकास की प्लेलिस्ट में दस्तक नहीं दी थी, दी भी तो कभी इस मूड में नहीं दी थी...

मनाने रूठने के खेल में हम
बिछड़ जाएँगे ये सोचा नहीं था,

तेरे बारे में जब सोचा नहीं था
मैं तन्हा था मगर इतना नहीं था....




आज पहली बार नशा करने का दिल कर रहा है, लग रहा है सर दर्द से फट जाएगा... सिगरेट का एक कश लगा के शायद कुछ हो जाए... मुझे ज़िन्दगी के नशे ने मारा है सालों-साल अब शायद ये सिगरेट ही बचा ले, अच्छा इंसान होने के कई नुक्सान हैं आप खुद को बुरा बता के अपने दुःख का कारण नहीं चुन सकते...

बहुत गुरुर था मुझे खुद पर, अपनी चीजों पर, अपने हर टैलेंट पर, अब लगता है मैं इन सब के लायक नहीं था काश उसे मिला होता जिसे इसकी कद्र हो ज़रा भी... दुनिया का समीकरण भी अजीब है जिसे जिस की कद्र हो उसे वही नहीं मिलता...या ये कहूं जिसको जो मिलता है उसकी कद्र नहीं करता, मैं भी कहाँ अलग हूँ इस दुनिया से... मैंने भी कद्र नहीं की किसी चीज की, आज इतने बड़े से घर में अकेला बैठा हूँ, लगता है शायद कोई कॉल बेल बजा दे, परा पता है कोई नहीं आएगा... मैं इतना दूर हूँ सब से कि अगर यहाँ इस बंद कमरे में इस दुनिया को अलविदा भी कह दूं तो भी किसी को शायद तब पता चले जब बदबू फ़ैल जाए हर तरफ, मुझे इसी अकेलेपन से डर लगता था हमेशा, कोई हो ही न तो छोड़ के कौन जाएगा इसलिए अकेला ही रहा किसी को आने ही नहीं दिया, लगता था मुझे कोई छोड़ कर नहीं जा सकता क्यूंकि कोई है ही नहीं... बंद कमरा दरअसल तुम्हारा नहीं था, मेरा था... वहां किसी को आने की इजाजत नहीं थी, बस इस डर से कि न कोई आएगा न ही कोई जाएगा... 

मुझे वो बंद कमरा नहीं खोलना था, जन्मों-जन्म लग जायेंगे इससे उबरने में... काश मैं बुरा होता, इतना बुरा कि कोई उस बंद कमरे की तरफ आता ही नहीं... मैं इसे बंद करके चाभी कहीं फेंक देना चाहता हूँ, मुझे नहीं आना इससे बाहर... 

मैं कभी कहा करता था कि प्रेम आज़ाद होता है इसे मुट्ठी में कैद नहीं कर सकते... मैं भी नहीं कर पाया...
ये सिगरेट में भी बस धुआं है नशा तो कुछ है ही नहीं... 
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