Friday, July 20, 2012

बावरी सी हो तुम...

तुम तो बावरी नदी सी हो
कभी तो होती हो शांत
फूलों की पंखुड़ियों सी,
और कभी हो जाती हो चंचल,
जैसे शाम में समुद्र की लहरें...

तुम तो उस पतंग जैसी हो,
जो उड़ना चाहती है आसमान में
और थामे हो मुझे
एक डोर की तरह...

तुम तो पगली सी हो,
हर शाम बैठे बैठे
रेत के महल बनाती हो
लगाती हो उसमे एक चारपाई,
और मेरे ख्यालों को ओढ़कर प्यार से सो जाती हो...

तुम तो खुशबू बिखेरती उस हवा सी हो
घर के पीछे वाले आँगन में
प्यार के फूल लगाती हो
और हर सुबह उन प्यार भरे फूलों का एक गुलदस्ता
मेरे सिरहाने रख कर जाती हो...

और मैं...
मैं तो हमसफ़र हूँ तुम्हारा
हर पल तुम्हें ही जीता रहता हूँ,
हाथों में हाथ लिए
तुम्हें आसमान की सैर कराता हूँ,
तुम हंसती हो, खिलखिलाती हो
इतराती हो, इठलाती हो....
कभी कभी शरमा कर खुद में सिमट जाती हो...

मैं तो वो आवारा बादल हूँ
जो अपनी बरसात अपने संग लिए चलता है..

Monday, July 09, 2012

शुक्रिया ज़िन्दगी...

ज़िन्दगी हर रोज अपने साथ कितनी पहेलियाँ समेट लाती है... किसी का ये कहना कि वो ज़िन्दगी में खुश है या दुखी दोनों ही बेमानी है... ज़िन्दगी कभी भी आपको अपने कमरे की उस दीवार जैसी नहीं लगती जिसका आप सिर्फ एक ही पहलू देख पाते हैं... ज़िन्दगी की सतहें पन्ना दर पन्ना खुलती जाती हैं और हम जीते जाते हैं... वैसे भी ज़िन्दगी का मज़ा भी वैसे ही लिया जाना चाहिए जैसे कोई महक सी हो सोंधी सी... बारिश की बूंदों का उस सूखी सी ज़मीन से गठबंधन हो रहा हो जैसे... ये खूशबू क्रियेट नहीं की जा सकती और कर भी लो तो वो करार नहीं आ सकता... आधे-अधूरे और पूरे से कुछ लम्हें ज़िन्दगी को बायलेंस करते रहते हैं... जैसे दूब पर ओस की बूँदें, हर पत्ती पर बारीकी से सजी हुयी ये प्यारी प्यारी सी बूँदें अपनी ख़ूबसूरती बिखेरती रहती हैं... क्या हम और आप इस तरह ओस की बूंदों को बिखेर सकते हैं... नहीं न... ज़िन्दगी के अपने कायदे होते हैं, अपनी उड़ान होती है... वो अपने दायरे खुद बनाती है, हम और आप उसमे अपनी बंदिशें नहीं डाल सकते...
ज़िन्दगी डेली आपके बरामदे में गिरने वाले अखबार की तरह है जो हम लेते ज़रूर हैं लेकिन उसका हर कॉलम पढ़ नहीं पाते... जाने कितनी खबरें जो अच्छी भी हो सकती हैं और बुरी भी, हम नज़र तक नहीं डाल पाते... कुछ चीजें जो हमारी आखों के सामने बोल्ड लेटर्स में आती हैं बस उनपर एक निगाह डालकर उस दिन के अखबार को कोने में डाल देते हैं, ये भी नहीं सोचते कि हो सकता है १३वें पन्ने की कोई सिंगल कॉलम खबर ही हमारे काम की हो... और वो सिंगल कॉलम खबर धीरे धीरे हमारी आखों में बसे सपनों के साथ दम तोड़ देती है... हम इंतज़ार ही करते रह जाते हैं कि हमारी खुशियाँ कभी हमारे सामने बोल्ड लेटर्स में आयें पर हमेशा ऐसा हो नहीं पाता... हमें खुश रहने की वजहें तलाश करनी पड़ती हैं... ये वजहें कहीं भी हो सकती हैं, जैसे एक सुनसान से रास्ते के बीच बना कोई मंदिर, जैसे बीच रेगिस्तान में कोई मज़ार...
ज़िन्दगी रैंडम सा बिहैवियर देती है, और इसको जीने का मज़ा भी तो ऐसे ही आता है न... आखिर कई रैंडम शेड्स को मिलाकर ही तो कोई खूबसूरत सी तस्वीर बनती है... 
ज़िन्दगी बूँद बूँद बहती रहती हैं, धूप-छावं से गुंथी हुयी एक पतली सी पगडण्डी पर... उन पगडंडियों पर कई मुस्कुराहटें बिखरी पड़ी रहती हैं, खुशियों के लम्हें यूँ ही समेटने पड़ते हैं... हो सकता है कुछ चुभने वाले लम्हें भी मिल जाएँ, पर शिकायत करने की फुरसत ही कहाँ हैं हमारे पास.... हमें तो और आगे जाना है... आगे और भी कई मुस्कुराते चेहरे मिलने वाले हैं...
अभी पिछली 7 तारीख को जब बर्थडे केक काटा तो बस ऐसा लगा जैसे किसी को थैंक्स कह दूं पर समझ नहीं आया किसे... उनको जिन्होंने मुझे मेरा जीवन दिया, मेरा वजूद दिया या फिर उन दोस्तों का जो हर साल मेरा जन्मदिन ख़ास बनाते हैं या फिर उन खुशियों को जिनकी वजह से जीने की वजहें जिंदा रहीं... सबको थैन्क्ज़ कहने के बाद भी कुछ अधूरा सा लग रहा था... फिर ख़याल आया क्या इन खुशियों की वही इम्पोर्टेंस होती अगर ज़िन्दगी में वो दर्द भरे तन्हाई में लिपटे लम्हें न होते... क्या सुबह उठकर उस ख़ास चेहरे की एक झलक उतनी ही खूबसूरत होती अगर एक रात पहले अकेले में डिप्रेस होकर खूब जोर जोर से रोया न होता... क्या ये बारिश उतनी ही अच्छी लगती अगर कल उस तेज धूप ने उन सड़कों पर मेरे पैर न जलाए होते... अक्सर खुशियों के लम्हों में लिपटे हम उस दुःख का शुक्रिया अदा करना भूल जाते हैं जिसके कारण आज ये खुशियाँ हमें अच्छी लग रही हैं...
ज़िन्दगी एक कम्प्लीट पैकेज है जिसमे हमें सब कुछ मिलता है... हर उस चीज का शुक्रिया करते हुए आगे बढ़ना चाहता हूँ.... उस हर एक दुःख का, हर उस आंसू का शुक्रिया... शुक्रिया ज़िन्दगी... शुक्रिया मुझे ख़ास बनाने के लिए....

 
आशाएं फिल्म का ये गीत जिसको सुनते सुनते ही ये पोस्ट लिखी है, आप भी ज़रूर सुनिए... आपको भी अच्छा लगेगा.. एक ही गाने में ज़िन्दगी समझा गया है कोई ... :-)

Thursday, June 28, 2012

आप अपने बच्चों से प्यार नहीं करते क्या...

               क्या आपको याद है थियेटर या सिनेमा हॉल में जब आपने पहली फिल्म देखी थी तब आपकी उम्र क्या थी... खैर छोडिये अगर याद नहीं है तो...  अक्सर मैं देखता हूँ, कई लोग गोद में छोटे बच्चों को लेकर फिल्में देखने चले आते हैं.. क्या आपने भी कभी ऐसा किया है... अब आप पूछेंगे भला इसका इस पोस्ट से क्या लेना देना है... जी आपने सही कहा इसका इस पोस्ट से कोई लेना देना नहीं है लेकिन इस बात का बच्चों की सेहत से ज़रूर लेना देना है... इस तरह की लापरवाही भरी हरकत का बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास में गहरा प्रभाव पड़ सकता है...
             पहले शारीरिक पहलू सोचिये, बच्चों के कान के पर्दे कितने नाज़ुक होते हैं, बिलकुल फूल की पंखुड़ियों की तरह... कई फिल्मों में बीच बीच में कानफाडू शोर या संगीत होता है... इस शोर के प्रभाव से बच्चों के कान के पर्दे फट सकते हैं, अगर भगवान् की दया से न भी फटें तो ये कमज़ोर हो सकते हैं, जिससे उनके सुनने की शक्ति कमज़ोर हो सकती है... लगातार अँधेरे में इतने बड़े रौशनी से भरे स्क्रीन को देखने से उनकी आँखों पर भी प्रभाव पड़ सकता है...
फिर उनके मानसिक प्रभावों पर भी ध्यान दीजिये, बच्चे आखिर क्या सीखते हैं... वही जो वो अपने आस पास देखते हैं... आस पास के माहौल को अपना पथप्रदर्शक मानते हुए ये नादान सी जानें आज कल की फिल्मों से क्या सीख रही हैं कभी आपने इस बारे में विचार किया है... आज कल की फिल्में कितनी भी पारिवारिक हों ये इन छोटे छोटे बच्चों के बालमन को ध्यान रख कर नहीं बनायीं जातीं.... फिल्मों में होने वाली मार-धाड़, अश्लील दृश्य आपके बच्चे को एक गलत दिशा में सोचने के लिए प्रेरित कर सकते हैं...
               आपने फिल्मों के सर्टिफिकेट्स के बारे में तो ज़रूर सुना होगा... केन्द्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड द्वारा फिल्मों को सामान्यतः तीन तरह के सर्टिफिकेट दिए जाते हैं... "U" "U/A" और "A"...
     "U" सर्टिफिकेट उन फिल्मों को दिया जाता है जो आप 4 साल से ज्यादा की उम्र के बच्चों के साथ देख सकते हैं, बहुत कम ही फिल्मों में आपने ये सर्टिफिकेट देखा होगा.. अभी की फिल्मों में फरारी की सवारी  ऐसी ही फिल्मों में से एक है... लेकिन इस तरह की भी फिल्में 4 साल से छोटे बच्चों के साथ देखने से बचना ही चाहिए...
          उसके बाद नंबर आता है "U/A" सर्टिफिकेट वाली फिल्मों का.. इस श्रेणी की फिल्मों के कुछ दृश्यों मे हिंसा, अश्लील भाषा या यौन संबंधित सामग्री हो सकती है, इस श्रेणी की फिल्में केवल 12 साल से बड़े बच्चे किसी अभिभावक की उपस्थिति मे ही देख सकते हैं... मतलब ये फिल्में भी आपको 12 साल से छोटे बच्चों को नहीं दिखानी चाहिए.. आज कल बनने वाली अधिकांशतः फिल्में इसी श्रेणी की होती हैं...
        तीसरी श्रेणी है "A" .. यह वह श्रेणी है जिसके लिए सिर्फ वयस्क यानि 18 साल या उससे अधिक उम्र वाले व्यक्ति ही पात्र हैं...
              चूंकि वो नन्हे बच्चे कुछ बोल नहीं सकते तो उनकी तरफ से मैं आपसे बस इतनी सी गुज़ारिश करना चाहूँगा, अपनी खुशियों का थोडा बलिदान और करें... और बच्चों के साथ फिल्में देखने न जाएँ और न ही घर पर ही उन्हें इस तरह की फिल्में देखने दें... अपनी आने वाली पीढ़ियों का ख़याल करें...

Sunday, June 17, 2012

पापा, आपसे माफ़ी मांगता ही रहूँगा...

             भले ही मैं इस तरह के ख़ास दिनों में कोई यकीन नहीं रखता, मेरे लिए पापा की बातें करने के लिए कोई एक दिन काफी नहीं हो सकता... लेकिन जब आस पास सब एक दूसरे को फादर्स डे की मुबारकबाद देते नज़र आते हैं तो कुछ-न-कुछ सोचने पर मजबूर हो ही जाता हूँ... जैसे फादर्स डे कोई त्यौहार हो गया हो दीवाली की तरह, हैप्पी दिवाली कहा पटाखे फोड़े, मिठाई खायी... और अगली सुबह उन फोड़े हुए पटाखों के कचरे को झाड़ू मार कर साफ़ कर दिया... मेरे ख़याल से फादर्स डे का मतलब तो तभी सफल होगा जब हर एक संतान ज़िन्दगी भर अपने पिता के पास रहे उनके बुढापे के उन लड़खड़ाते हुए क़दमों में उनका हाथ मजबूती से थामे रहे, क्यूंकि उन्हीं हाथों को पकड़ कर हमने भी कभी अपने पहले लड़खड़ाते कदम बढ़ाये थे...
पापा, मेरे भतीजे के साथ...
" आप कभी मेरे साथ भी ऐसे ही खेलते होंगे न... :-)"
कई कई बातें जो मैं और किसी से नहीं कह पाता, आईने के सामने जाकर बयान कर देता हूँ... अक्सर ये एकालाप मुझे खूब रुलाता है... पता नहीं क्यूँ बचपन में मैं आपके उतना करीब नहीं आ पाया, शायद आपका यूँ सख्त और अनुशासनप्रिय होना मुझे हमेशा आपसे डरा कर रखता था... फिर जैसे जैसे इस दुनिया की भागदौड़ में खुद को खड़ा करने की जद्दोजहद करने लगा, इस कठिन डगर पर चलने की तैयारी करने लगा तब एहसास हुआ कि आपकी वो सख्ती, वो डांट सिर्फ और सिर्फ मेरे भले के लिए थी... आपकी सिखाई हुयी हर वो बातें जब आज ज़िन्दगी के कठिन मोड़ पर मेरा हाथ थामे रहती हैं तब मालूम पड़ता है आप कितने ख़ास हैं मेरे लिए... पापाजी... ये वो शब्द हैं जिससे मुझे हमेशा इस बात का एहसास रहता है कि इस दुनिया के संघर्ष में, इसकी पथरीली और जलन भरी सड़कों पर लड़ने के लिए मैं अकेला नहीं हूँ कोई और भी उस भगवान् के प्रतिरूप में मेरा हाथ मजबूती से थामे एक सारथी की तरह मुझे हर उस मंजिल तक पहुंचाने की कोशिश में है, जिस मंजिल के हज़ार सपने मेरी आखों ने बुने हैं... आप मेरे लिए मेरे लहू में दौड़ते हुए जीवन से भी ज्यादा महत्वपूर्ण हैं...
            जानता हूँ आपने मेरे लिए कई सपने देखे हैं... इन सपनों में आपका कोई भी स्वार्थ नहीं था, हर उस स्वार्थ से दूर आपने पूर्ण समर्पण किया अपनी इस कीमती पौध को हरा भरा करने की... ये पौधा आज अपनी उस ज़मीन से अलग होकर बिलकुल भी खुश नहीं है... ये पैसे कमाने की भागदौड़ में आपसे दूर हो गया... ये आत्मग्लानि बढती ही जा रही है, शायद कभी ख़त्म नहीं होगी... कभी कभी सोचता हूँ मुझे पढ़ा लिखा कर आपको क्या मिला, घर में कभी न ख़त्म होने वाला सन्नाटा... अकसर मुझे आप अपने सपनों में दिखाई देते हैं, उस सन्नाटे भरे आँगन में कुर्सी पर बैठे हुए, आपकी इन बूढी आखों में जैसे एक कभी न ख़त्म होने वाला इंतज़ार है... मन करता है सब कुछ छोड़-छाड़ कर आपके पास चला आऊं, लेकिन वो भी नहीं कर पाता... पापा, ये सपने मुझे बहुत परेशान करते रहते हैं... या तो मैं बाकी लोगों की तरह कभी प्रैक्टिकल नहीं बन पाया या फिर अन्दर से बहुत कमजोर हो गया हूँ... हालांकि आपके पास लौट आने की कोशिश जारी है लेकिन बस यही चाहता हूँ कि मैं आने वाले हर एक युग में, हर एक जन्मों में आपका ही बेटा बनूँ ताकि जो अगर कुछ आपके लिए इस जन्म में कर पाने में अक्षम हूँ आपके लिए वो हर कुछ कर सकूं...
           आपकी सख्ती के कारण आप मुझे क्रूर नज़र आते थे... इसी मुगालते के कारण आपसे कभी प्यार से अपने दिल की कोई बात नहीं कह पाया, ये भी नहीं की मैं आपसे बहुत प्यार करता हूँ और आप मेरे लिए दुनिया के सबसे बड़े आदर्श हैं...पिछली बार की ही तरह इस बार भी, पापाजी... हो सके तो मुझे माफ़ कर दीजियेगा...

Friday, June 15, 2012

इससे पहले कि तुम मुझसे कहीं दूर चली जाओ, जाते जाते मुझे एक बार गले से लगा लेना..



जाने क्यूँ जैसे उम्मीदें ख़त्म होती जा रही हैं... कलेंडर की ये बदलती तारीखें, एक एक दिन जैसे फास्ट-फॉरवर्ड मोड में हो... हर सुबह एक नयी उम्मीद के साथ शुरू होती है और रात ढलते ढलते दिल बुझता जाता है, जाने क्या होगा... जाने क्या होने वाला है... ज़िन्दगी की ये सड़क जैसे अगले मोड़ पर थम सी जाने वाली है... हर रोज आँखों से बहते इस इंतज़ार में आगे के रास्ते बह चुके हैं....
तुम्हारी ज़िन्दगी के बंद कमरे को खोलते खोलते जाने कब और कैसे मेरी दुनिया भी उसी कमरे में सिमट के रह गयी.. ये बंद कमरा मुझे अपना सा लगने लगा था, अगर तुम वो कमरा भी छोड़ कर चली गयी तो मैं भी उसके दरवाज़े हमेशा के लिए बंद कर दूंगा... तुम्हारे इस कमरे में खुद को बिखरने से शायद बचा सकूं.... लेकिन अगर ऐसा न हो पाया तो गर कभी हो सके तो उस कमरे में आग लगा देना, यूँ टूट कर बिखर जाने से बेहतर ही होगा कि मैं ना ही रहूँ....
याद है तुम्हें जब पिछले साल के आखिरी दिन तुम्हें अपनी गुजारिश का लिहाफ दिया था, लेकिन शायद उसमें तुम्हें मेरे प्यार की वो गर्माहट महसूस नहीं हुई जो इतनी शिद्दत से तुम्हारे लिए बचा कर रखी थी... मुझे पता है तुम भी सोचती होगी मैं पागल हूँ जाने किस सपने की तलाश में यूँ आसमान की तरफ ताकता रहता हूँ... कभी कभी लगता है मेरे सपने भी उन तारों की तरह हो गए हैं, जो देखने में तो बहुत खूबसूरत हैं लेकिन मैं चाह कर भी उनको नहीं छू सकता उनको अपनी ज़िन्दगी की चादर पर नहीं टांक सकता ... मुझे माफ़ कर देना, तुम्हारे लाख समझाने के बावजूद भी मैं कभी खुश नहीं रह पाऊंगा... इस अकेली बेतुकी ज़िन्दगी को जीने से पहले बस एक आखिरी गुज़ारिश करना चाहता हूँ... पता नहीं इस तेज़़  धूप में में मेरी इस गुजारिश की बूँदें तुम्हें भिगो पाएंगी या नहीं... फिर भी  इससे पहले कि तुम मुझसे कहीं दूर चली जाओ, जाते जाते मुझे एक बार गले से लगा लेना... शायद इस एहसास के सहारे आने वाले सालों और जन्मों की साँसों को तुम्हारे नाम कर सकूं....

डायरी के पन्नो से :- 12-04-2012
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