Friday, March 03, 2023
खुद को भुला दिया हमने ...
Sunday, February 05, 2023
स्टैक में फँसे ख़्याल…
Friday, December 16, 2022
तीन सालों का सारांश...
हमने कई बार ये सुना है कि सपनों का हक़ीक़त से कोई वास्ता नहीं होता, लेकिन अगर मैं ये कहूँ कि कभी-कभी सच्चाई का भी हक़ीक़त से कोई वास्ता नहीं होता, क्यूँकि सच भी पुराना हो जाने के बाद झूठ या किसी सपने से कम नहीं लगता...
अभी जैसे कुछ तस्वीरें याद ही नहीं आती कि कब ली गई थी, आगे-पीछे का जैसे सब धुंधला हो गया हो, कई रास्ते जिसपर घंटों यूँ ही आज-कल की बातें करते हुए गुजर ज़ाया करते थे, उसके मोड़ जैसे रेत बनके हवा हो गए...
एक क़िस्सा याद आता है जब नई जगह शिफ़्ट होने के बाद पहले-दूसरे दिन रास्ता भटक गया था कोई, अब लगता है अगर वापस वहाँ गया तो बिना मैप देखे कहीं निकल ही नहीं पाऊँगा, हर चौराहा कहीं मुझे वहीं दफ़्न ना कर दे...
Wednesday, September 21, 2022
मैं अब भी सोचता हूँ...
रज़ाई में दुबक कर
लिखी गयी कविताएँ
अक्सर गर्मियों में
पिघल जाया करती हैं…
इसलिए
मैंने लिखी हैं कुछ नज़्में
जिनके अंदर छिपी हैं
मेरे दिल की चिंगारियाँ…
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जब रात को बहुत तेज नींद आती है न, तो मैं चाय में चाँद घोर कर पी जाया करता हूँ…
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मैं चुपचाप हूँ,
इसलिए नहीं कि
कहने को कुछ नहीं,
बल्कि इसलिए कि
कुछ कहे-सुने
के दरम्यान
मेरी धड़कनें खो जाती है….
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इन दिनों ज़िंदगी में धूप बहुत ज्यादा है, सूरज को पीठ दिखाता हूँ तो सीने तक उसकी जलन महसूस होती है...
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लिखना कोई काम नहीं है, बस एक सफ़र है… उन रास्तों से गुजरने जैसा जहां बैठे बैठे मन कई ख़याल बुनता है…
कुछ ख़याल हवा हो जाते हैं, कुछ कुलाँचे भरते हुए दूसरों के मन को भी अपने साथ लिए चलते हैं… मेरे शब्दों के साथ चलने वालों का कारवाँ बहुत पुराना है… जो लोग मेरे साथ नए जुड़े हैं और मेरा लिखा नहीं पढ़ा कभी उन्हें ये किसी लतीफ़े से कम नहीं लगता…
मेरे मन के नुक्कड़ पर,
तुम भी तो लिखो कुछ नज़्में
जो मेरी पलकों के सिरे को
थामें और ले चलें कहीं और,
जहाँ चाँदनी हो, समंदर हो,
तितलियाँ हो, और हों मेरे सपने..
जाने क्यूँ,
उदास सा है मन,
बिना कुछ लिखे,
बिना कुछ पढ़े….
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मेरे बटुए में सबसे ज़्यादा
शनिवार के सिक्के हैं,
खनकते हैं और पुराना वक़्त
छितरा के गिर पड़ता है…
ये सिक्के बटोरते बटोरते
जाने कब मेरी ज़िंदगी
बुधवार हो गयी…
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सबने सोचा तो होगा कई बार न
कि काश पीछे जाकर
सही कर सकते कुछ चीज़ों को,
अब जब के पीछे नहीं जा सकते,
चलो आगे चलें…
Tuesday, April 13, 2021
एकालाप...
मैं अब लेखक नहीं रहा, शायद कभी था भी नहीं... बस एक इंसान की ज़िद थी जो मुझे इतने सालों तक लेखक बनाए रखा था.. अब जब मुझे पता नहीं कि वो मेरा लिखा पढ़ भी रहा है या नहीं तो लिखने का कारण समझ नहीं आता...
कहते हैं कि हमेशा खुद के लिए लिखना चाहिए किसी और के लिए नहीं, लेकिन मेरे साथ ऐसा हो ही नहीं पा रहा, लगता है कि अचानक से उसकी आवाज़ आए जो कहे कि Wow ! तुम दुनिया के सबसे बेहतरीन राइटर हो, and I am so lucky that you write for me.
मुझे बेस्ट नहीं होना था, ऐसा कोई सपना नहीं था ये तो उसी का ख़्वाब था जो मैं इतने साल जीता रहा...
अजीब है ना, मुझे उस वक्त लिखने में कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं थी तो लगातार लिखता रहा और अब जब मैं लिखना चाहता हूँ तो लिखने को कुछ समझ नहीं आता...
ये बहुत बड़ा राइटर ब्लॉक हो गया है, बस उम्मीद करता हूँ कि जल्द ख़त्म हो जाए.. घुटन सी होने लगी है, बिना मन के ग़ुबार को बाहर निकाले हुए...
