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Sunday, January 12, 2014

बेवजह...

हथेलियों पर धान की कुछ
अधपकी बालियाँ उभर आई हैं,
जब पलटता हूँ उन्हें तो
वो बालियाँ अलफाज बन उतर आती हैं...
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एक गुलाबी सा शहर है
उसकी उल्टी-पुल्टी सड़कों पर
सपनों मे बेवजह की रेत लिखता हूँ
और उड़ा देता हूँ हर सुबह...
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आड़े-तिरछे खयालों में
ज़िंदगी के झरोखों से
कुछ नीली धूप आ जाती है,
उस धूप में पका देता हूँ अपने आप को....
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डूबते सूरज के पीछे
एक लंबी कतार देखता हूँ
ये भीड़ अगर थोड़ी जगह
मुझे भी दे तो
एक प्याला नारंगी रंग मैं भी कैद कर लूँ...
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कुछ-एक साल पहले
इक अनजानी सड़क के
नो-पार्किंग के बोर्ड के नीचे
अपने कुछ सपने पार्क कर दिये थे,
इसके जुर्माने में अपनी पूरी ज़िंदगी
चुका कर आया हूँ....


Monday, August 13, 2012

कभी कतरा-कतरा करके भी कुछ लिखता हूँ ...

यादों की परतें इतनी पतली होती हैं न की अगर कभी किसी ने किसी एक परत को छू भर लिया तो ज़िन्दगी की इस किताब में से यादों की परतें उधडती चली जाती है... आस पास एक गहरा सन्नाटा छा जाता है, उस सन्नाटे में से कभी किसी के रोने की आवाजें आती हैं तो कभी किसी की मासूम सी खिलखिलाहट... उन यादों के गलियारों में कितना कुछ होता है, अब जैसे वो सब कुछ किसी बीते युग जैसा लगता है.... न जाने कितने ही ऐसे लोग हैं जो उस वक़्त अपनी ज़िन्दगी जैसे लगते थे और पता नहीं कब जाने कौन से मोड़ पर पीछे छूट गए...

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कभी-कभी यूँ ही अचानक बैठे-बैठे मन उदास सा हो जाता है, कोई कारण समझ नहीं आता... आस-पास की भीड़ को देखकर मन उचाट हो जाता है... किसी से बात करने का दिल नहीं करता... बस सोचता हूँ काश कोई अपना सा आ जाए जिसकी गोद में सर रखकर सो जाऊं... ऐसे में अक्सर कानों में इयरफोन लगाकर धीमी आवाज़ में कुछ सैड सौंग्स सुनता हूँ... सोने की एक नाकाम सी कोशिश करता हूँ, मोबाईल में कुछ तस्वीरों को पलटता हूँ... और अनजाने में ही आंसू की कुछ बूँदें धीमे से आखों की कोर से लुढ़क जाती हैं....

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मेरी बस हर रोज उसी तरफ से गुज़रती है, उन मुर्दा पत्थरों पर खुदे कुछ नाम और उनसे झांकते कुछ चेहरे...कुछ एक तो जैसे पहचानने सा लगा हूँ जैसे कभी मिला हूँ उनसे... इस भागती दौड़ती ज़िन्दगी से होकर उन पत्थरों में खुदे नाम भर बन जाने के सफ़र में हम कितना कुछ पाते हैं, कितना कुछ खो जाते हैं... इस सफ़र में न जाने कितने सपने, कितना कुछ पाने की जद्दोजहद... उन पत्थरों के नीचे दफन होंगे न जाने कितने सपने, कितनी कहानियां और न जाने कितने ही अपनों की चीखें ... ( Adugodi, Bangalore के एक Chirstian Cementry की तरफ से गुज़रते हुए.... )

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कुछ बातें, कुछ सपने, कुछ इंसान और भी न जाने क्या क्या... बहुत कुछ ऐसा होता है जो भुलाए नहीं भूलते... इंसान की सोच इतनी खुरदरी होती है न कि काफी कुछ फंसा रह जाता है... भूलने और याद रखने के बीच का ये गलियारा जहाँ हर परछाईं से हम बचना चाहते हैं, लेकिन ऐसा कर नहीं पाते...

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पागलखाने के एक सूने से खाली कमरे के कोने में एक लड़का बैठा है, दीवार पर कुछ-न-कुछ उकेरता ही रहता है... शायद कहानियां हैं उन अधूरे से सपनों की, जिनके सच होने की राह वो आज तक देख रहा है, हर थोड़ी देर बाद वो दरवाज़े की तरफ देखता है... कुछ जाने पहचाने चेहरों की तलाश में... उसकी आखें थकी थकी सी लगती हैं लेकिन उसके अन्दर से झांकता इंतज़ार कभी ख़त्म नहीं होता... बस एक प्रश्नवाचक निगाहें ऊपर आसमान की तरफ उठती हैं जैसे ये पूछ रही हों... और कितना इंतज़ार... !!! ( एक कभी न समझ आने वाले सपने के गलियारे में झांकते हुए ...)

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Friday, April 13, 2012

ये कोई कहानी नहीं, एक सपना है आधा अधूरा सा...

एक जंग लगा पिंजरा, घर की चौखट से थोड़ी दूर झोपडी की छत से जुडी कड़ी में लटका हुआ है...
एक तोता है उसमे शायद, लेकिन उसका रंग बड़ा अजीब, भूरे भूरे सा...
छत के कोने में एक सुराख है, सुराख नहीं... बड़ा सा छेद... पिछली बारिश में शायद पेड़ की टहनी के गिरने से हो गया होगा...
तोता एकटक उस छेद से नीले आसमान की तरफ देख रहा है... ऐसे जैसे अभी मौका मिले तो अभी उड़ जाए...
नीचे कोने में एक खटिया पड़ी है, एक औरत लेटी है... औरत या फिर एक युवती, उम्र यही कोई २७-२८ के करीब होगी... चेहरा मुरझाया सा, जैसे अपनी उम्र से १०-१५ साल बड़ी लग रही हो... बीमार है शायद...
एक लड़की है छोटी सी ज़मीन पर खेल रही है, खेलते खेलते औरत के पास आती है, और अपनी माँ से इशारे से पानी मांगती है पीने को... औरत उठती है, लेकिन पानी का घड़ा तो खाली है...
दरवाज़े से निकलकर बाहर की तरफ देखती है तो तेज़ धूप, गर्म हवाओं के थपेड़े उसके चेहरे को जैसे झुलसा से देते हैं... अब इत्ती धूप में वो उस बच्ची को लेकर कहाँ जाए... हाथ में घड़ा उठाकर, उसे वहीँ खेलता छोड़कर... बाहर से दरवाज़े की कुण्डी लगाकर धीमे कदमो से पानी लाने शायद कहीं कुएं पर चल देती है... ज़मीन की सारी घास सूखी पड़ी है, औरत के पैर गर्म ज़मीन में तप रहे हैं...
थोड़ी देर तक लड़की के मासूम आखें अपनी माँ को खोजती हैं, फिर जैसे सब समझ जाती है... और खेलने में मगन हो जाती हैं... बाहर हवा और तेज़ हो गयी है, सूखे पत्तों के इधर उधर उड़ने की आवाज़ आ रही है... अचानक से तोता बेचैन हो जाता है... पिंजरे में इधर उधर छटपटाने लगता है... पिंजड़ा जोर-जोर से हिल रहा है...
लड़की डर जाती है, हैरान होकर तोते की तरफ देखने लगती है... शायद उसकी समझ के परे की बात होगी... वो रोने लगती है...
पानी लेकर लौटती उस औरत को दूर झोपडी से उठता धुएं का एक गुबार सा दिखता है, वो खूब जोर से चिल्लाती है... झोपडी में आग लग गयी है... वो तेज़ी से उधर की तरफ भागती है...
इधर आग की लपटें बढती जा रही हैं... छत कमज़ोर होती जा रही है, तोते का पिंजड़ा छत से गिर कर खुल जाता है, अब तोता बाहर आ गया है... लड़की अब भी रो रही है, तोता जी भर के खुले आसमान की तरफ देखता है, और उस लड़की के पास आकर खड़ा हो जाता है...
औरत भागते भागते थक कर रास्ते में बेहोश हो गयी है, झोपडी धीरे धीरे जलती जा रही है... तोता अभी भी नहीं उड़ा...

Friday, February 03, 2012

मौत के साथ सपने नहीं मरते...

          वो एक बेचैन सी सुबह थी, आस पास लोगों की भीड़... कई सारे अपने से चेहरे, जैसे सभी से एक न एक बार मिल चुका हूँ कहीं, बस अपने आप को नहीं देख पा रहा था मैं, फिर देखा तो कोई लेटा हुआ था सफ़ेद कपड़ों में लिपटा, शक्ल कुछ जानी पहचानी सी... आखें अजीब बेजान सी, हलकी हलकी नम, जैसे आंसू की कोई बूँद कैद हो गयी हो पलकों में, जैसे अभी टपक पड़ेंगी... चेहरे पर अजीब सी सफ़ेद हो चुकी मायूसी, जैसे कोई बहता दरिया अचानक से बर्फ हो गया हो... उस ठन्डे हो चुके से शरीर को घेरे कुछ लोगों की आँखों से बेरंग पानी टपक रहा है, कुछ के चेहरे पर सुकून कि चलो अच्छा ही हुआ... ठहाकों की आवाज़ भी सुनी थी मैंने, मेरी मौत पर वो हँसते रहे, वो मेरे सपने थे जो मेरी बेचारगी को घूर रहे थे... उनकी वो नज़र जैसे भेद रही थीं मेरे उस बेजान पड़े शरीर को...
          आखिर मेरे ही सपनो ने मुझे मार दिया, सपनो की ये बेरुखी ... आज मिटटी हो चुके मेरे शरीर की अर्थी को अंजाम देने आये हैं... उन्हें खबर है कि इन बेजान सुर्ख पड़ी आखों में आज भी कई सपने तड़प रहे हैं, वो मरे नहीं वो तो बस इंतज़ार कर रहे हैं, मेरे जल जाने का.. शायद ये उन सपनों की अग्निपरीक्षा का वक़्त है, मुझे यकीन है वो जीत जायेंगे.... मेरा शरीर तो कब का मर चुका है, वक़्त के तेज़ हवा के थपेड़े कब का बहा ले गए हैं उसे, इस बेगानी सी दुनिया की तेज़ धूप में जल चुकी है ये आत्मा भी,  लेकिन ये आग इन सपनो को जला नहीं सकती... वो सपने तो अज़र हैं, अमर हैं... वो सपने फिर मेरे साथ आयेंगे, आखिर वो सपने ही तो मेरे अपने हैं जो हर रात मेरे चाहते-न चाहते हुए भी हमेशा मेरे साथ रहे.... मेरे हमदम की तरह, मेरे हमसफ़र की तरह... इस बहती ज़िन्दगी के साथ वो भी बहते रहे, बिना रुके बिना थके.... आज उस मनहूस सी बेचैनी के बीच जाने कितनी अतृप्त इच्छाएं शोर मचा रहीं हैं, उस गुमनाम बसंत का इंतज़ार कर रही हैं, जब सपनों का फिर से इन आँखों के अंजुमन में आना होगा...
        जाने कब वो अगला जन्म होगा, सपने फिर आयेंगे और मेरे मन में फिर से जलाएंगे धीमे-धीमे खुद को पूरा करने की आग... मुझे यकीन है वो सपने फिर आयेंगे क्यूंकि मौत के साथ सपने नहीं मरते, बस सो जाते हैं थोड़ी देर के लिए क्यूंकि उन्हें फिर से आना होता है लौट कर इन्हीं आखों में ...
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