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Wednesday, May 17, 2017

इक तेरा इश्क़, इक मेरी ग़ज़ल...

मिलती है तू ख़्वाबों में, हर बार बिछड़ के ऐसे
धूप के कम्बल से झांकती जैसे वो ठिठुरती सी शाम है |

ए हमदम तेरा दिल मुझे उस नुक्कड़ सा लगता है
जिसे कोई मंजिल न मिली और वही आखिरी मुक़ाम है |

मैंने लिक्खी थीं कई नज्में अपनी मोहब्बत के वास्ते,
पर उन नज़्मों पर तेरी मुस्कराहट ही मेरा सच्चा कलाम है |

परवाह नहीं मुझे ज़माने की संगदिली की जब तक
मेरे दिल की ज़मीं पर तेरी मोहब्बत का आसमान है |

लिखने बैठा हूँ इक ग़ज़ल मोहब्बत के काफ़िये में
हर पन्ने पर लिक्खा मैंने बस तेरा ही नाम है |

कितना कुछ है जो लिखा जा चुका है कई-कई बार,
इक तिरा नाम है जिसे हर बार लिखना जज़ा का काम है |


*जज़ा- पुण्य 

Monday, April 15, 2013

ये तो बस एक साल गुज़रा है, सारे जनम तो बाकी हैं अभी...

एक साल !!! क्या बस सिर्फ एक साल ... ऐसा लगता है जैसे मैं तुम्हे बरसों से जानता हूँ ,सदियों से ,जन्मों से ...
फिर तो लगता है अभी तो बस एक साल बीता है ,न जाने कितने जन्म बाकी हैं अभी... कुछ चीजें अन एक्स्प्लेनेबल होती हैं... बीता एक साल भी कुछ ऐसा ही था... मुझे मालूम है बीते साल में मैं तुम्हे शायद उतनी खुशियाँ नहीं दे सका जितने की तुमने उम्मीद की होगी फिर भी आने वाले समय की पोटली से ढेर सारा प्यार निकाल कर तुम्हे दे सकूं यही तमन्ना है ...

बस तुमसे एक छोटी सी गुजारिश है, तुम यूं छोटी छोटी बातों पर परेशां न हो जाया करो, मुझे अपने आप से नफरत सी होने लगती है ... तुम्ही हर एक मुस्कान कीमती है मेरे लिए .....

                                                            ***
तुम्हारी ये अटखेलियाँ करती हंसी ,
जैसे हो कोई ,
चांदनी सलोनी सी 
उतर आती है आँगन में 
और रोशन कर देती है 
मेरे दिल के हर एक कोने को ..
तुम्हारी ये चंचल मुस्कान 
बदल देती है हर गम की परिभाषा ..
है बस एक प्यार भरी गुजारिश 
कि उम्र के हर निराशजनक दौर में,
हर उस समय 
जब आस पास हो कई आलोचनात्मक  वजहें 
उनके बीच से गुजरते हुए भी 
बनी रहनी  चाहिए 
तुम्हारे चेहरे पर ये 
ये प्यार भरी मुस्कान .....
                                                            ***
अभी तो आगाज -ए -इश्क  है जाना, अंजाम अभी बाकी है,
गुजारने  है कई सारे दिन अभी, कई सुहानी शाम  अभी बाकी है ..."
                                                            ***
मैंने सोचा था तुम्हारी इन प्यारी प्यारी आँखों  में कभी आंसू न आने दूं पर मैं तो हरजाई निकला तुम्हे ढेर सारा परेशां करता हूँ न... चलो अभी माफ़ कर दो ,शायद तुम्हारे लिए कुछ तोहफा छुपा रखा हो मेरी जिंदगी ने ... 

तुम्हे खबर भी कहा है जानां ...
कि तुम मुझे जिंदगी सी लगती हो ..
तुम्हारी जुल्फों से होकर गुजरती है
ये ठंडी हवाएं जब ..
जाने क्यों सिहर मैं जाता हूँ ..
वो चाँद का बावरापन तो देखो 
हर शाम झाँकता है तुम्हारे आँगन में 
किसको सुनाऊं आखिर
हाल मैं अपने दिल का 
देखता वो तुम्हें है 
और जल मैं जाता हूँ ..
ये शरबत के गिलास की कुछ बूँदें 
जब तुम्हारे लबों से ढुलक जाती हैं 
पीती तुम हो और भीग मैं जाता हूँ 
तुम्हे खबर भी कहा है जानां ...
कि तुम मुझे जिंदगी सी लगती हो...
                                                            ***
नीचे लिखी तुकबंदी को ग़ज़ल कहने कि गलती नहीं करूंगा क्यूंकि शेर लिखने के कई नियम होते हैं जो मुझे आते नहीं... खैर ये जो कुछ भी है बस तुम्हारे लिए ही है...  

मुरीद हूँ मैं तेरी हर एक मुस्कान का हमनफस ,
हटा दे ये पर्दा उस चिलमन से, कि अब शाम होने को है ..

शाम भी है, सुकून भी और तेरा साथ भी है हमदम,
बस ठहर जाओ थोड़ी देर कि, बरसात भी अब होने को है ..

यूं बाहर बाहर झांक कर कैसे जान पाओगी मेरी मोहब्बत को तुम,
गले मिलो तो पता चले किस कदर मेरा दिल तेरा होने को है...
                                                            ***
"मेरे पास तुम्हे देने के लिए कुछ खास तो नहीं है आज बस ये इत्तू सा लम्हा तुम्हे दे रहा हूँ, मुझे पता है इस लम्हें में तुम मुस्कुरा रही होगी... देखो न मुस्कराते हुए तुम कितनी प्यारी लगती हो....  

चार शब्द समेटता हूँ मैं,
बस तुम्हारे लिए....
इन लफ्जों को कोई 
अक्स-ए -गुल समझ लेना 
और टांक लेना अपनी 
जुल्फों के जूड़े में...
वो इब्तिदा -ए -इश्क की 
एक शाम थी जब 
हमने अपना खाली दिल 
तुम्हारे नाम कर दिया ...
आँखों से होते हुए तुम्हारी हम
दिल से, अपने दिल के, दिल में बस गए 
और सपनो से बुनी इस जिंदगी को 
सुबह-ओ-शाम कर दिया ....
                                                            ***
"तुम ढूँढती रहती हो मेरी आँखों में अपने प्यार की निशानियाँ ,
और मुझे रश्क है बस इस बात का कि मैंने तुम्हारी आँखों को देखा है ....
                                                            ***
ये पॉडकास्ट जो बड़े ही प्यार से सलिल चाचू ने रिकॉर्ड करके भेजा था, उसे भी आज ही अपने ब्लॉग पर लगा पा रहा हूँ....

Friday, September 21, 2012

प्यार एक सफ़र है, और सफ़र चलता रहता है...

पार्क में बैठना कितना सुकून देता है, बस थोड़ी देर ही सही... मुझे भी अच्छा लगता है बस यूँ ही बैठे रहो और आस-पास देखते रहो... कई तरह के लोग... हर किसी की आखों से कुछ न कुछ झांकता रहता है... ढलती हुयी शाम है, हल्के हल्के बादल है... ठंडी हवा चल रही है... पास वाली बेंच पर कई बुज़ुर्ग आपस में कुछ बातें कर रहे हैं... ऊपर से तो वो मुस्कुरा रहे हैं लेकिन उनकी आखें सुनसान हैं... उस सन्नाटे को शायद शब्दों में उतारना मुमकिन न हो सके.... उम्र के इस आखिरी पड़ाव पर सभी के जहन में "क्या खोया-क्या पाया...." जैसा कुछ ज़रूर चलता होगा... कितनों के चेहरे पर इक इंतज़ार सा दिखता है... इंतज़ार उस आखिरी मोड़ का... जहाँ के बाद क्या है किसी ने नहीं देखा... किसी ने नहीं जाना...
उसकी ठीक दूसरी तरफ प्ले ग्राउंड में कुछ बच्चे खेल रहे हैं, उनकी दुनिया में कोई परेशानी नहीं है...परेशानियां है भी तो कितनी प्यारी-प्यारी सी... किसी की बॉल किसी दूसरे बच्चे ने ले ली, किसी के पैरों में थोडा सा कीचड लग गया... किसी को आईसक्रीम खानी है... उन छोटे छोटे बच्चों के आस-पास ही तो ज़िन्दगी है... ज़िन्दगी उन्हें दुलार रही है, उन्हें संवार रही है... उन बच्चों के साथ उनके माता-पिता भी ज़िन्दगी ढूँढ़ते रहते हैं... उनको खेलते हुए देखकर मेरे चेहरे पर बरबस ही मुस्कराहट की कई सारी रेखाएं उभर आती हैं....

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सामने की तरफ देखता हूँ तो एक प्रेमी जोड़ा हाथों में हाथ डाले धीमे धीमे टहल रहा है... उन्हें लगता है यूँ धीमे चलने से वक़्त भी धीमा हो जायेगा... लेकिन ये तो उसी रफ़्तार से चलता है... वो बड़े प्यार से एक दूसरे की आखों को देख रहे हैं... अपनी अपनी निजी परेशानियों को थोड़ी देर के लिए भूलकर बस एक दूसरे का साथ इंजॉय कर रहे हैं शायद... दोनों में से कोई कुछ नहीं कह रहा है... या फिर ये वो भाषा है जो मैं नहीं सुन सकता... इन खामोशियों के कोई अलफ़ाज़ भी तो नहीं होते... वो बिना कुछ कहे ही हर कुछ सुन सकते हैं, हर कुछ महसूस कर सकते हैं... इस लम्हें को कोई भी चित्रकार या फोटोग्राफर कैद करना चाहेगा... बादल आसमान को धीरे धीरे ढकते जा रहे हैं... हलकी-हलकी बारिश शुरू हो गयी है.... लेकिन उन्हें कोई फर्क नहीं... वो तो कब के प्यार की बारिश को महसूस कर रहे हैं... बादल गरजने की ज्यादा आवाज़ तो नहीं महसूस की लेकिन बिजली का चमकना साफ़ दिख गया अँधेरे में.... अचानक से बारिश तेज़ हो गयी है... बारिश... उफ्फ्फ क्यूँ होती है ये बारिश... पार्क की सारी बेंच गीली हो गयी हैं... मैं अपनी छतरी निकाल कर अपने कमरे की तरफ बढ़ने लगता हूँ... वो अब भी एक दूसरे का हाथ पकडे एक शेड के नीचे खड़े बारिश के थमने का इंतज़ार कर रहे हैं..

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पार्क की एक बेंच पर बैठा आसमान से बातें कर रहा हूँ कि, दो बेंच छोड़कर बैठे दो थोड़े जाने पहचाने चेहरे दिखे.. पिछली बार की ही तरह कोई कुछ नहीं बोल रहा.. एक लम्बी चुप्पी के बाद लड़की ने कुछ कहा, लड़के ने हामी में सर हिला दिया है... और फिर खामोशियाँ बातें करने लगीं... प्यार करने वालों को देखकर अच्छा लगता है... वैसे भी इस भाग दौड़ में यूँ फुरसत के पल कितने कम रह गए हैं... शुक्र है प्यार के इस रास्ते में दोराहे नहीं होते... इंसान उस साथ को जीता रहता है और खुश रहता है... आज मौसम ठीक है लेकिन मुझे कुछ काम है, मैं पार्क के गेट से बाहर निकलते हुए एक बार पलट कर देखता हूँ... वो दोनों अब भी खामोश हैं... वो शाम बहुत मुलायम सी थी और वो दोनों इसे ओढ़कर बड़े प्यार से बैठे थे....

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आज काफी दिनों बाद पार्क आया हूँ, पर सब कुछ पुराना पुराना सा है... वैसे भी चीजें कहाँ बदलती हैं उन्हें देखने का नजरिया बदलता जाता है... बदलना भी एक अजीब शय है, मैं कभी कभी मज़ाक में अंशु से पूछता हूँ कि पिछले १ साल में तुम्हारी ज़िन्दगी में क्या क्या बदला, तो वो खिलखिला कर जवाब देती है "तुम जो आ गए..."  और ऐसा कह कर अपना सर मेरे कंधे पर टिका दिया करती है... उस समय उसकी आखों में अजीब सी चमक होती है... फिर मैं ग़र पूछूं कि मेरे अलावा क्या बदला... फिर वो बोलती है "छोडो न कुछ भी बदला हो मुझे क्या.. बदलने दो जो भी बदलता है..." इन्हीं ख्यालों में खोया खोया मैं यूँ ही मुस्कुरा रहा हूँ... तभी मेरी नज़र एक लड़के पर पड़ी, वही जिसे मैं नहीं जानते हुए भी जानता हूँ... वो आज अकेला है, शायद इंतज़ार कर रहा हो उस लड़की का.... लेकिन आखों में इंतज़ार की कोई झलक नहीं... वो सूनी आखों से पास के गमले की मिटटी को देख रहा है... काफी देर तक कोई हलचल नहीं... उसका अकेलापन मुझे परेशान कर रहा है... मन में कई तरह के प्रश्न घुमड़ रहे हैं.. फिर भी बिना उससे कुछ कहे वहां से उठ जाता हूँ...

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पता नहीं क्यूँ आज उस निश्चित समय पर मैं पार्क आने के लिए बहुत बेचैन हूँ... तेज़ क़दमों से मैंने पार्क के अन्दर कदम रखा, फिर घडी की तरफ निगाह डाली तो आज शायद थोडा पहले आ गया... मैंने इधर उधर निगाह दौड़ाई और एक खाली बेंच पर बैठ गया... नज़र पार्क के गेट पर टिकी हुयी है, भला किसका इंतज़ार है मुझे और क्यूँ... वो लड़का आता हुआ दिख रहा है, लेकिन वो आज भी अकेला है... वो आकर अपनी उसी पूर्वनिर्धारित बेंच पर बैठ गया है... थोड़ी देर इंतज़ार करने के बाद मुझसे रहा नहीं जाता और मैंने उसकी तरफ कदम बढ़ा दिए हैं... मैं उसको जाकर हेलो करता हूँ... वो थोड़ी अजीब सी प्रश्नवाचक निगाहों से मुझे देखता है..
मे आई सिट हियर ???
या स्योर...
डु यू नो हिंदी .. ? (बंगलौर में ऐसा पूछना पड़ता है....)
हाँ.. (इसका जवाब हाँ में होना ज़रूरी था नहीं तो बाकी की पोस्ट इंग्लिश में हो जाती...)
फिर मैं उसको वो बातें बताता हूँ जो मैंने ओबजर्व की थीं... मेरी बातें सुनते सुनते उसकी आखें और सूनी होती जा रही हैं ... वो इसका कोई जवाब नहीं देता, उठ कर जाने लगता है ...
क्या हुआ ??
कुछ नहीं... मेरी ट्रेन है आज रात को, मैं ये शहर छोड़ कर जा रहा हूँ ....
फिर शायद उसे मेरी आखों में उभर आये ढेर सारे प्रश्न दिखने लग गए... काफी सोच कर रूंधे गले से उसने कहा..
कल रात उसकी शादी हो गयी, उसके पापा हमारी शादी को तैयार नहीं थे... और बिना उनकी मर्ज़ी के वो तैयार नहीं थी...
फिर काफी देर तक वहां सन्नाटा छाया रहा, मेरे पास उसे कहने के लिए कुछ नहीं था... थोड़ी देर बाद उसने खुद कहा...
इस शहर ने हमें बहुत कुछ दिया.. हम यहीं मिले, यहीं दोस्त बने और फिर यहीं प्यार भी हो गया... आज जब वो मेरे साथ नहीं है तो इस शहर को यूँ ही छोड़ कर जा रहा हूँ, मैं नहीं चाहता कि इस शहर को मैं उदास निगाहों से कभी देखूं... चाहता हूँ पार्क की इस बेंच पर फिर कोई प्यार करने वाले बैठे, यहाँ अपनी उदासी का रंग नहीं बिखेरना चाहता... इस शहर को अपनी तन्हाई से दूर रखना चाहता हूँ... ताकि कल अगर इस शहर को कभी याद करूँ तो बस अच्छी अच्छी यादें ही मिलें... हमें साथ में जितना वक़्त भी भगवान् ने दिया बस उन्ही लम्हों को समेटे एक नए सफ़र पर निकल रहा हूँ... जानता हूँ उतना आसान नहीं होगा मेरे लिए, लेकिन उतना आसान आखिर दुनिया में है भी क्या भला... ये आखिरी इम्तहान भी देना ज़रूरी है न अपने प्यार को निभाने के लिए... ताकि अगर इस इम्तहान में पास हो गया तो फिर अगले जन्म में उसके साथ हमेशा हमेशा रह सकूं....
वो जा रहा है, मैं चाह कर भी कुछ न बोल सका...
बारिश धीमे धीमे अपनी बूँदें धरती पर फैला रही है... पहली बार मिटटी की सोंधी खुशबू मुझे अच्छी नहीं लग रही... आस-पास का माहौल नम हो गया है, सडकें धुंधली दिखने लगी हैं... छतरी होते हुए भी मैं नहीं खोल रहा और भारी कदमो से पार्क से बाहर निकल रहा हूँ, पलट कर देखता हूँ तो एक प्रेमी जोड़ा एक दूसरे का हाथ पकडे उसी शेड के नीचे खड़े बारिश के थमने का इंतज़ार कर रहा है... सच में प्यार जितनी देर भी रहता है हम बस उसी में रहते है... ये सफ़र चलता रहता है और साथ साथ हमारी ज़िन्दगी भी ...

Wednesday, April 25, 2012

प्यार तो होना ही था न....

"ए पगली, नींद आ रही है क्या ??? सर सहला दूं... ?"
"हम्म्म्म....."
".... आओ, चलो सो जाओ.. !!!"
"अच्छा एक बात बताओ, तुम्हारा हाथ दर्द नहीं करता ??? यूँ घंटों मेरा सर सहलाते रहते हो, खुद तो एक मिनट के लिए भी नहीं सोते.... !!!"
"ऊंह हूँ......"
"क्यूँ ??? !!!"
"क्यूंकि, विकास अंशु को बहुत प्यार करता है.... और अंशु को इतने सुकून से, इतने प्यार से सोते देख कर उसे खूब ख़ुशी मिलती है...."
"अच्छा.... रियली ?? !!!...."
"ह्म्म्म..... अच्छा अब ऐसे मुझे देखना बंद करो, और आँखें बंद करो और सो जाओ..."
"....."  
"....."
"विकास ?????......"
"ह्म्म्म.... बोलो न...."
"अपना दूसरा हाथ लाओ न, मुझे तकिया बनाना है......"
"हा हा हा.. पगली कहीं की.... ये ले.... अब मुस्कुराना बंद करो और निन्नी कर लो...."
"....."
"....."  
"....." 
"....." 
"विकास, एक बात कहूं....!!!"
"कहो न... !!!"
"....अंशु भी विकास को बहुत प्यार करती है....."
"क्या कहा.... फिर से कहो... !!! ???.... ए अंशु ... सुनो न... क्या कहा.... मैंने सुना नहीं.... प्लीज कहो न.....एक बार और कहो न..."
"ऊंह हूँ......तुमने मिस कर दिया..." 
"अरे बोलो न.. प्लीज.... मैंने सच में नहीं सुना...."
"मैंने कहा..... आई लव यू...."
"सच्ची....??? सच सच कहो..... "
"ह्म्म्म...."
"कब से... कैसे....."
"पता नहीं... मुझे सच में नहीं पता...." 
"पहले क्यूँ नहीं बताया... पगली....." 
"मुझे खुद पता चलता तब न....."
"....."
"....."  
"....." 
"....."  
"विकास ???? ....."
"ह्म्म्मम्म......"
"क्या देख रहे हो...???"
"वो देखो आसमान में वो खूबसूरत से टिमटिमाते तारे, और चाँद देखो कितना सुन्दर लग रहा है... "
"तारे ??? चाँद ??? पागल हो गए हो क्या,  वो तो छत और वहां पंखा घूम रहा है..."
"ओफ्फ्फ हो... तुम देख नहीं पा रही हो अंशु, गौर से देखो... अरे ऐसे नहीं आखें बंद करके देखो... ठंडी हवा है, सामने कित्ती प्यारी सी नदी बह रही है... आवाज़ तो सुनो पानी की....."
"......हे भगवान्, क्या हो गया तुमको.....!!!"
"अरे रे ज्यादा मत सोचो, देखो न, चाँद कितने प्यार से हमें देख रहा है, उसकी इस ठंडी धूप को हम पर पड़ने दो न, तुम्हें पता है जब भी ये ठंडी चांदनी रिश्तों पर पड़ती है, तो अक्सर प्यार हो जाया करता है...."
"मुझे नहीं पता तुम क्या बोलते रहते हो, तुम राईटर लोग भी न, कुछ भी सोच कर कुछ भी बोलते हो और कुछ भी लिख देते हो.... "
"हा हा हा... पगली....ठीक है, चलो सो जाओ...."
"..............अब नींद कहाँ से आएगी बुद्धू..... ऐसे में नींद भी आती है क्या....."
"ये भी सही बात है.... "
"....."  
"....." 
"....." 
"विकास ???...."
"हम्म्म्म...."
"ये कहीं सपना तो नहीं....!!! मुझे सच में तुमसे प्यार हो गया क्या....???"
"हाँ रे..... तुझे तो सच में मेरे से प्यार हो गया.... लेकिन कैसे हो गया रे पगली... मुझे तो लगा था मैं अकेला ही रह जाऊँगा हमेशा...."
"क्यूँ नहीं होता आखिर, विकास अंशु से इतना प्यार करता है.... अंशु को भी एक दिन प्यार तो होना ही था न..... "

Monday, August 01, 2011

मॉडर्न आर्ट की एक तस्वीर भर है ज़िन्दगी...

बहुत दिन हुए कुछ लिखा नहीं, वो अक्सर पूछा करती है नया कब लिख रहे हो... मेरे पास कोई जवाब नहीं होता.. आखिर क्या कहूं, कितनी कोशिश तो करता हूँ लेकिन गीले कागज पर लिखना आसान नहीं होता... और वो स्याही वाली कलम तुमने ही तो दी थी न, उसकी लिखावट बहुत जल्द धुंधली पड़ जाती है...  लेकिन वो ये बात नहीं समझती, और हर रोज यही सवाल पूछती है ...जानती हो उसने कितनी बार ही कहा तुम्हें भूल जाने को, शायद उसे मेरे चेहरे पर ये उदासी अच्छी नहीं लगती ... लेकिन तुम्हारे आने और लौट जाने के बीच मेरे वजूद का एक टुकड़ा गिर गया था कहीं, वो कमबख्त उठता ही नहीं बहुत भारी है... क्या ऐसा मेरे साथ ही होता है कि जो इस पल साथ होता है वो अगले पल नहीं होता...

मैं अब अजीब सी कश्मकश में हूँ, पहले जो शाम काटे नहीं कटती थी... नुकीले चाकू की तरह मुझे चीरने की कोशिश करती थी, अब वो फिर से तितली के पंखों की तरह चंचल हो गयी है... जो शाम तुम्हारे यादों के संग गुज़रती थी उसे अब उसने अपनी खिलखिलाहट से भर दिया है... पता नहीं कैसे... जो कुछ भी मैंने कहीं अपनी सबसे भीतरी तह के नीचे छुपा कर रख दिया था, उसे नीले आकाश की उड़ान भरते देख रहा हूँ...क्या ये वही शहर है जहाँ चाँद ने उगना छोड़ दिया था, कल रात देखा तो चाँद ज़मीन पर उतर आया था...

कितनी बार उसने मुझसे पुछा कि मैं जो तुम्हारे बारे में इतना कुछ लिखता हूँ तुम्हें इसकी कद्र भी है या नहीं, और मैं यही फैसला नहीं कर पाता कि ये मैं तुम्हारे काल्पनिक अस्तित्व के लिए लिखता हूँ या अपनी संतुष्टि के लिए या फिर कलम खुद-ब-खुद अपनी मंजिल ढूँढ लेती है... इन सभी उधेड़बुनों के बीच एक और ख्याल है जो मुझे बेचैन कर जाता है, जबकि उसे पता है मैं उसका नहीं हो सकता, फिर भी हर शाम वो मेरे पास आती है...

ये ज़िन्दगी उस मॉडर्न आर्ट पेंटिंग की तरह होती जा रही है जिसे सिर्फ वही समझ सकता है जिसने उसे बनाया है... मुझे तलाश है बस अपने उस कलाकार की जिसकी बनाई तस्वीर में उलझा हुआ हूँ, ये मॉडर्न आर्ट बनाने वाले तस्वीरों पर अपना नाम भी कम ही लिखते हैं...
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