Sunday, November 17, 2013

ज़िंदगी के धागे पर पड़ी छोटी-छोटी गिरहें...

मेरे कमरे की खिड़की को बंद हुए सालों गुज़र गए... अक्सर हवाएं उस खिड़की से टकराती रहती हैं, जैसे पूछ रही हों ... ऐसा क्या हुआ.... ऐसा क्यूँ हुआ... उन गुज़रे लम्हों को यादो की किताब में कैद कर एक अलमारी में बंद कर दिया है, जब भी आओ वो किताब ले जाना... "वक्त की दीमक" धीरे धीरे उन्हें "खत्म करती जा रही है!!"

**************************

एक बंद अँधेरा सा कमरा, उसमे धीमी धीमी सी नीले रंग की रौशनी....
सीलन भरी दीवारों पर एक तस्वीर ... थोड़ी धुंधली...
अचानक से बहुत तेज़ हवा चलती है, और खिड़की का पल्ला चरचराता हुआ खुल जाता है....
कमरा अचानक से तेज़ रौशनी की चकाचौंध से भर जाता है...
और वो तस्वीर ... पता नहीं किसकी थी... अगर कुछ दिखता भी है तो पानी के धब्बे पड़े ऐनक के पीछे से झांकती एक जोड़ी बूढी आखें....
कुछ सपने भी अजीब होते हैं...

**************************

यूँ ही साथ चलते चलते शाम-ए-हयात आएगी,
हमारे बिछड़ने का पैगाम साथ लाएगी...

क्यूंकि घास पर हमेशा के लिए ओस नहीं रहती.... :( :(

**************************

एक अकेली रात है, आप तारों के साथ बैठे हैं... फिर जैसे ही चलने की कोशिश करते हैं चाँद चुपके से नारियल के पत्तों की ओट से झांकते हुए पूछता है, मेरी परछाईयों पर ये मोहब्बत की चादर किसने चढ़ा दी है... मैं भी चुपके से कह देता हूँ ये परछाईं नहीं, ये तो रौशनी है मेरे प्यार की जो मुझे तब रौशन करती है जब मैं अकेला होता हूँ...

**************************

कोशिश कर रहा हूँ कि ये बंद मुट्ठी खोल दूं, जितनी ही शिद्दत से इसे कैद करने में लगा हूँ, उतनी ही तेजी से रेत हाथों से निकली जा रही है... लेकिन ये हवा इतनी तेज है कि अगर मुट्ठी खोल भी दी तो भी ये हवा सारी रेत उड़ा ले जायेगी...

**************************

मैंने तुम्हारी नींद पर एक पहरेदार लगा रखा है,
तुम्हारे इन सपनो को पलकों पर बिठा रखा है..
बिताता हूँ दिन अपने, तेरी मुस्कराहट के बाग़ में,
खुद के चेहरे को खंडहर बियाबान बना रखा है...

**************************

कितनी बार ही सोचा आखिर जन्मों की गिनती को हम सात तक ही क्यूँ सिमित कर देते हैं, तुम्हारी आखों में गहरे उतर कर देखा तो जाना इनमे न जाने कितने हज़ार जन्मों की ज़िन्दगी छुपी है मेरी...

**************************

Wednesday, November 13, 2013

मैं उसका शहर छोड़ आया था...

कभी जब छुट्टियों में
लौटता हूँ उस शहर को
तो वो नुक्कड़ मुझे
बेबस निगाहों से
ताक लिया करता है...
उस पुरानी इमारत पर
पड़ चुकी काई 
मुझे देख फिसल सी जाती है,
वो गलियां अब मुरझा गयी हैं
वो खिड़की भी अब
अधखुली सी ऊँघती रहती है...
दिल करता है कभी
पूछूँ इस खस्ता सी चाँदनी से
क्या अब भी हर शाम
वो खिड़की खुलती है...
क्या झाँकता है कोई
अब भी उस खिड़की से...

 

Sunday, November 10, 2013

तेरे बिना ज़िंदगी भी लेकिन ज़िंदगी नहीं....

इन दिनों कुछ अच्छा नहीं लगता.... आँखों में कोई भी लम्हा ढंग से ठहर नहीं पाता, कोई गीत सुनना चाहता हूँ तो सुर इधर के उधर लगने लगते हैं.... कुछ लिखने बैठता हूँ तो शब्द ठहरते ही नहीं कागज पर... ये कोरा कागज मुझे टुकुर-टुकुर ताकने लगता है.... सोचता हूँ थोड़ी देर के लिए धीमी सी आवाज़ में कोई गजल लगा कर शांति से बैठूँ तो ये ख़यालों की उड़ान तुम्हारी तरफ छिटका ले जाती है.... ऐसा नहीं कि तुम्हारे बिना कोई काम रुका है मेरा, लेकिन एक खालीपन ज़रूर छोड़ गयी हो मेरे आस-पास... सच कहूँ तो तुम्हारी बहुत याद आती है, यहाँ इस शहर में एक तुम्हीं तो हो जिससे चार बातें करके ज़िंदा होने का एहसास होता है... वरना तो अधिकतर दुनिया अपना स्वार्थ साधने में जुटी है... ऑनलाइन भी किसी से बात करना चाहो तो सब व्यस्त हैं, फुर्सत ही नहीं किसी एक के पास भी... पुरानी तस्वीरें पलटता हूँ तो आँखों के कोर नम होने लगते हैं, ऐसा लगता है किसी बेगाने से शहर में आकर बस गया हूँ...

सच कहते हैं सुख और सुकून की परिभाषा तो वही बयां कर सकता है जो प्रेम में हो...  सुख तो तभी है जब तुम्हारा सर मेरे कांधे पर टिका हो और हम साथ ज़िंदगी बिताने के खयाल बुन रहे हों... तुम्हारे हाथों में हाथ डाले बैठे रहना सोंधे एहसास सरीखा है... तुमने जाते जाते मुझे जो चॉकलेट दिया था न उसे अभी तक संभाले रखा है, पता नहीं क्यूँ लेकिन कई बार उसे एकटक देखता रहता हूँ, तुम्हारे होने का एहसास दिखता है उसमे मुझे.... वैसे हम प्रेमियों के सपने भी कितने मासूम होते हैं न, साथ बिताए जाने वाले लम्हों के आलावा ज़िंदगी से और कहाँ कुछ चाहिए होता है भला.... मैं भी उन्हीं की तरह बहुत सलीके से ज़िंदगी की नब्ज़ थामे तुम्हारे साथ बढ़ना चाहता हूँ....

मैं हँसना चाहता हूँ , बिना किसी खास वजह के ही खुद से बक-बक करना चाहता हूँ, दिल करता है खूब ज़ोर से चीखूँ-चिल्लाऊँ...  खुद को इस दुनिया की भीड़ में झोंक देना चाहता हूँ, थोड़ी देर के लिए ही सही खुद को भूल जाना चाहता हूँ... अपने चेहरे से जुड़ गए अपने वजूद, अपने नाम को अलग कर देना चाहता हूँ... खुद के मौन से जो दूरी मैंने बना ली थी वही मौन दोबारा मुझे घेरता जा रहा है... तुम्हारी एक झलक इस मौन के काँच को तोड़कर मुझे मेरी साँसों से मिला देगी.... तुम्हारे इंतज़ार की एक पतली सी पगडंडी मेरी आँखों से निकल कर तुम्हारी तलाश कर रही है... कलेंडर की तरफ नज़र जाती है तो दिल बैठ जाता है, कैसे कटेगा ये वक़्त...

Sunday, October 20, 2013

अधूरे खत....

सर में बहुत तेज़ दर्द हो रहा है, लेकिन लिखना है... कुछ तो लिखना है ही... बाहर रात लगभग ठहर चुकी है, हाँ अंदर भले ही एक झंझावात से घिरा होकर लिख रहा हूँ... कई दिनों से ज़िंदगी के प्लेयर पर पौज़ बटन खोजने का दिल कर रहा है, आस-पास एक तरह का कान-फाड़ू संगीत बजता रहता है... इस सब से अलग मैं चाहता हूँ कि थोड़ी देर के लिए ही सही, लेकिन मैं अतीतजीवी हो जाऊँ... या फिर बस थोड़ी देर ठहरकर उन बीती पगडंडियों को निहारूँ, कितना कुछ पीछे छूट गया... मैं कुछ भी पीछे नहीं छोडना चाहता था, लेकिन क्या कुछ समेट कर चलता... काश ऐसी कोई पोटली होती जहां सबको समेट लिए जाता... कई ऐसे लोग, ऐसी बातें हैं जो बहुत याद आती हैं... अब तो वहाँ नहीं लौट सकता कभी भी.... अतीत में जीए हुये लम्हें वर्तमान में आकर अरबी आयत में तब्दील हो जाते हैं, उससे पवित्र और कुछ भी नहीं लगता... 

************
ज़िंदगी की कोई मंजिल नहीं होती, इन्फैक्ट मंजिल नाम की कोई वस्तु जीवन में होती ही नहीं... Exist ही नहीं करती, जो होता है बस रास्ता होता है, अगर आप ज़िंदगी के इन रास्तों पर हड़बड़ी मे गुज़र जाना चाहते हैं तो मंजिल पर पहुँचने के बाद उन रास्तों का हिसाब नहीं दिया जा सकेगा... बस इन्हीं रास्तों पर चलने का सुख लेना चाहता हूँ, सिर्फ तुम्हारे साथ... कोयले की धीमी धीमी आंच पर ज़िंदगी को पकाना चाहता हूँ... 

************

कभी तुमसे वादा लिया था कि तुम साथ चलोगी हमेशा... बड़ी मिन्नत से वो प्यार का बीज इस रिश्ते की ज़मीन पे बोया था, आज तो ये इत्तू सा पौधा निकल आया है इश्क का... शायद अब इस पौधे को और ज्यादा खयाल की ज़रूरत होगी, यकीन मानों उस अतीत में जाकर झांक आया हूँ तुम्हारी आखों को, बला की सी खूबसूरत हैं.... वहीं अतीत के कुछ पन्ने पलटा तो ये नज़र आया कि कभी ये भी कहा था तुमसे... याद तो होगा ही तुम्हें न... 

************

कभी कभी जी करता है, तुम्हें यहाँ इस भीड़ से कहीं दूर ले चलूँ, एक ऐसे जहाँ की तरफ जहाँ अक्सर तुम मेरे सपनों में आती हो.. एक ऐसी पगडण्डी पर जहाँ तुमने कितनी ही बार बेखयाली में मेरे हाथों में हाथ डालकर मुझे प्यार से देखा है... एक परिधि है जहाँ डूबते सूरज की आखिरी किरण मेरे इस प्यारे से चाँद को देखकर सकुचाते हुए दिन को अलविदा कर देती हैं, और एक हसीं सी शाम मेरे नाम कर जाती हैं... एक ऐसी आजादी है जब कलेंडर की तारीखें नहीं बदलती, जब दिन के गुज़र जाने का अफ़सोस नहीं होता... ये एक ऐसा जहाँ है जहाँ मुझे हमेशा से ही ये यकीन है कि मेरी इस गुज़ारिश का लिहाफ़ ओढ़े हुए एक दिन जरूर मेरे साथ चलोगी...

************

कितना कुछ लिखने का सोचा तो था लेकिन, अभी बीते दिनों ही किसी ने मेरी इस तरह की पोस्ट्स को अधूरे खत का नाम दिया था, इसलिए इस पोस्ट को अधूरे खत की ही तरह अधलिखा छोड़ रहा हूँ.... ये पढ़ते हुये अपनी आखें बंद कर लेना, कई अनखुले-अधखुले जज़्बात तुम्हारी आखों पर मेरे होंठों के निशान छोड़े जाएँगे.. और हाँ परेशान मत होना ये पोस्ट लिखते-लिखते सर दर्द भी खत्म हो चुका है.... 

Tuesday, October 15, 2013

इन्सानों की बलि...

दृश्य 1
********************

गेंदे का पौधा आज बहुत उदास था उसने गुलदावदी से कहा यार तुम्हारी खुशबू मेरी खुशबू से अच्छी है क्या ??? गुलदावदी इतराते हुये बोली, हाँ और नहीं तो क्या.... गेंदे ने बुझे मन से अपना ऑफिस बैग उठाया और दफ्तर की ओर चल पड़ा... पीछे से गुलदावदी ने आवाज़ लगाई आज दफ्तर से जल्दी आना, शाम को मंदिर जाना है... आते वक़्त रास्ते से इन्सानों के कुछ अच्छे बाल तोड़ लाना.... घने देख के ही लेना... और उनमे डैंड्रफ और जुएँ भी न हों.... 
शाम को लौटते वक़्त गेंदे ने देखा सभी इंसान गंजे ही हैं...
"कमबख्त पूजा वाले दिन बालों की बड़ी किल्लत होती है, साले सब सुबह सुबह ही सारे बाल काट ले जाते हैं... "
बड़ी देर बाद खोजने पर एक 4-5 साल की बच्ची दिखी, गेंदे ने सोचा "यार बिना बालों के ये कितनी बेरंग दिखेगी, फिर सोचा अगर इसके बाल नहीं लिए तो आज की पूजा अधूरी रह जाएगी...
फिर फटाफट उसके छोटे-छोटे बाल तोड़कर वो घर की तरफ चल पड़ा... 
"ये बाल चढ़ाने से पूजा ज़रूर सफल हो जाएगी.... "

दृश्य 2
********************
लंच का समय है, कैंटीन की कुर्सियों पर बैठे बकरे, ऊंट और भैंस अपनी अपनी घास खा रहे हैं... भैंसे ने बात शुरू की,  "अरे दोस्तो  **** पूजा आ रही है, कैसे मनाना है, कुछ सोचा है ??? "
"सोचना क्या है..."
"अरे पिछली बार जो हमने **** जाति के इन्सानों की बलि चढ़ाई थी, सब बेकार हुआ... देवी माँ खुश ही नहीं हुईं... गजब सूखा पड़ा था, साली हरी घास खाने को तरस गए थे... इस बार तो **** की ही बलि चढ़ाएँगे, मैंने पढ़ा है वो इंसान की सबसे ऊंची ब्रीड है.... इस बार माँ जरूर प्रसन्न होंगी..."
बकरे ने बात आगे बढ़ाई,
"यार इस बार तो अपने त्योहार पर हमने करीब 10000 हाई ब्रीड इन्सानों को इकट्ठा करके बांध रखा है... "
"वाह, क्या बात है..."
"हाँ, इस बार **** जरूर खुश होगा, जन्नत नसीब होगी हमारे बकरों को...."
ऊंट के चेहरे पर गजब का तेज़ आ गया,
"भाईजान, हमने भी तो 10000 गोरे इंसान मंगवाएँ हैं विदेश से, सुना है उसकी बलि देने पर सारी मिन्नतें पूरी हो जाती हैं...."
"वाह इसका मतलब मरने के बाद हम सबको ही स्वर्ग मिलेगा..."
ये बोलकर तीनों ठहाका लगाते हैं, और पूरा कैंटीन उनकी हंसी से गूंज पड़ता है..

लेखक की चिप्पी ...
********************
क्या किसी भी धर्म में ऐसा कोई त्योहार है जिसमे धार्मिक कारणों से छायादार पेड़ लगाने, फूल-पत्तियों के पौधे लगाने, या फिर पशु-पंछियों को आज़ाद करने की रस्म हो ??? इंसान द्वारा किया गया कोई भी धार्मिक अनुष्ठान बिना फूलों को तोड़े हुआ पूरा नहीं होता.... कई अनुष्ठानों में अलग अलग पशुओं की बलि देने की भी प्रथा है... मैं यहाँ किसी धर्म विशेष को उचित या अनुचित ठहराने के लिए नहीं आया, बस सवाल इतना सा है कि उस ऊपर वाले के नाम की धार्मिक गतिविधियों में हम इसे धरती का भला क्यूँ नहीं कर सकते.... धर्म की पूर्ति के लिए पर्यावरण विध्वंस क्यूँ ???

ये उस युग की बात हो सकती है जब पेड़-पौधे और पशुओं की प्रजातियों की सभ्यता ने विकसित रूप ले लिया होगा... सोचिए अगर भैंस, बकरे और ऊंट भी इतने ही विकसित और धार्मिक होते और वे अपने काल्पनिक इष्ट जनक को खुश करने के लिए इंसानों की बलि दिया करते तब इंसानों तुम्हें कैसा लगता ???
Do you love it? chat with me on WhatsApp
Hello, How can I help you? ...
Click me to start the chat...