Thursday, December 25, 2014

तू इस तरह से मेरी ज़िंदगी में शामिल है....

कभी अचानक से सुबह जल्दी नींद खुल जाये तो मैं चौंक कर इधर-उधर देखने लग जाता हूँ.... तुम्हारे होने की हल्की सी खुशबू फैली होती है चारो तरफ..... जैसे चुपके से आकर मेरे ख्वाबों को चूमकर चली गयी हो.... आधी -चौथाई या फिर रत्ती भर भी, अब तो जो भी ज़िंदगी महफूज बची है बस यूं ही गुज़रेगी तुम्हारे होने के बीच....


वक़्त के दरख़्त पे
मायूसियों की टहनी के बीच 
कुछ पतझड़ तन्हाईयों के भी थे,
पर इस गुमशुदा दिसंबर में
उम्मीद की लकीरों और 
ओस की नमी के पीछे
दिखती तुम्हारी भींगी मुस्कान…

दिसंबर की सर्दियों के ख्वाब भी
गुनगुने से होते हैं,
रजाईयों में दुबके हुए से,
उसमे से कुछ ख़्वाब फिसलकर
धरती की सबसे ऊंची चोटी पर 
पहुँच गए हैं,
उस चोटी से और ऊपर, बसता है
ढाई आखर का इश्क अपना..

Sunday, December 07, 2014

सरप्राईजेज़ शुड नेवर डाइ...

दिसंबर आ गया है, हर साल आता है कोई नयी बात तो नहीं... दिसंबर से जुड़ी ऐसी कोई खास याद भी नहीं... वैसे भी इन सर्दियों में याद्दास्त थोड़ी कम हो ही जाती है, सिवाय रजाईयों में दुबके रहने के और कुछ याद नहीं रहता... कैसा लगे अगर इन सर्दियों में अचानक से तेज़ धूप निकल आए या खूब तेज़ बारिश होने लगे, चौंक जाएँगे न... ऐसा नहीं कि हमने कभी धूप नहीं देखी या बारिश कोई नयी सी है... बस इस मौसम में ये सब हम एक्सपेक्ट नहीं कर रहे होते न इसलिए... 

सरप्राईज़ देना खूब आता था उसे... सुबह-शाम, दिन-रात जब भी मौका मिलता सरप्राईज़ लेकर खड़ी हो जाती, उसने मुझे सिखाया कि इंसान किसी चीज को यूं ही पाकर उतना खुश नहीं होता जितना कि अचानक मिल जाने से... पहले खत से लेकर पहले फोन कॉल तक सब सरप्राईज़ ही था, और उसका अचानक से चले जाना भी...

खैर, मैं तो बहुत आगे निकल आया हूँ, लोग आज कल मुझे बोरिंग कहते हैं... जब लोग मेरे लिखे के कायल होते थे तो मुझे लगता था मेरा यूं बैठे बैठे डायरियों के पन्ने भर देना निहायत ही बकवास काम है... लेकिन अब लगता है कि ये लिखना ही था जिसने सालों मुझे अकेला चलने की हिम्मत बक्शी थी... अब जब लिखना लगभग छूट  चुका है खुद को बेइन्तहा अकेला पाता हूँ, खुद के साथ बिताए लम्हों ने कई बेहतरीन नज़्में और कहानियाँ निकाली थीं किसी पुराने वक़्त में... खुद का ब्लॉग भी पढ़ूँ तो कभी-कभी बेगाना सा लगता है...

कितनी भी कोशिश कर लें हम अपने आपको सरप्राईज़ नहीं दे सकते न... कभी यूं ही चौंक जाने के लिए कई बार तुम्हारा "आखिरी हर्फ" पढ़ने चला जाता हूँ, कुछ नहीं मिलता एक सन्नाटे के सिवा... सच में वो आखिरी हर्फ बन कर ही रह गया... मुझे पता है तुम्हें लिखना पसंद नहीं, शायद मेरा लिखा पढ़ने की लत से भी अब उबर चुकी हो... न ही पूछती हो, न ही कहती हो कुछ लिखने के लिए.... 

ऐसा लगता है मैं फिर से उसी मूड में हूँ जिसमे अपनी कई डायरियाँ जला दी थीं, इस ब्लॉग को बड़े प्यार से सजाया है इसे कुछ नहीं कर सकता... ये ब्लॉग समंदर के उस किनारे की तरह काम करता है जहां मैं तनहाई में चुपके से शाम बिताने चला आता हूँ...

दिसंबर का महीना भी मेरी तरह ही बोरिंग है, कोई हरकत नहीं.... बाहर हल्की सी सर्द हवा चल रही है, इस ठिठुरती शाम को एक मुट्ठी में सुला कर, तुम्हारी साँसो में खुद की धड़कन को सुनते हुये मैं भी सो जाना चाहता हूँ...

Tuesday, October 14, 2014

कुछ त्योहार सालो भर भी तो होने चाहिए न !!!!

चाहे जेठ की दुपहरी हो
या फिर पूस की रात
सावन की बारिश में भीगते हुये भी
इंतज़ार बैठा रहता था
ओसारे पर, दरख्तों पर ,

एक झलक माँ की,
लौटा देती थी हलक में जान फिर से...

कई त्योहार आते हैं-बीत जाते हैं,
कुछ पल देते हैं याद रखने को
और दिये जाते है साल भर का इंतज़ार....

तुमसे मिलना भी
अब बस एक त्योहार ही है माँ
साल में एक बार ही आता है,
कुछ देर ही ठहरता है, ज्यादा देर नहीं....

इन सादे लफ्जों में,
कुछ-एक त्योहार और मांगता हूँ,
कुछ त्योहार सालो भर भी तो होने चाहिए न !!!!

Monday, October 13, 2014

इस तन्हा शाम का विलोम तुम हो...

इन पेचीदा दिनों के बीच,
आजकल बिना खबर किए ही
अचानक से सूरज ढल जाता है,
नारंगी आसमां भी बेरंग पड़ा है इन दिनों...

इन पतली पगडंडी सी शामों में
जब भी छू जाती है तुम्हारी याद
मैं दूर छिटक कर खड़ा हो जाता हूँ...
क्या करूँ
तुम्हारे यहाँ न होने का एहसास
ऐसा ही है जैसे,
खुल गयी हो नींद
केवल बारह मिनट की झपकी के बाद,
इस बारह मिनट में मैं
तीन रेगिस्तान पार कर आता हूँ,
रेगिस्तान भी कमबख्त
पानी के रंग का दिखता है...

तुम्हारी याद भी एक जादू है,
उन नीले रेगिस्तानों में
मटमैले रंग के बादल चलते हैं....

इससे पहले कि इसे  पढ़ कर
तुम मुझे बावरा मान लो,
चलो इस शाम का
विलोम निकाल कर देख लेते हैं,

इस बारह मिनट की झपकी के बदले
तुम्हारी गोद में मिले सुकून की नींद
जहां बह रहे हैं
ये तीन नीले रेगिस्तान
वहाँ झील हो तुम्हारे आँखों की
और इन मटमैले बादलों के बदले
तुम्हारी उन काली ज़ुल्फों का घेरा हो...

इस तन्हा शाम का विलोम बस तुम हो...
आ जाओ कि,
ज़िंदगी फिर उसी लम्हे से शुरू करनी है
जहां तुम इसे छोड़ कर चली गयी हो...

अब ये मत कहना कि
ये नज़्म मुकम्मल नहीं,
आखिर तुम्हारे बिना कुछ भी
पूरा कहाँ हो पाया है आज तक....

Sunday, October 12, 2014

याद तुम्हारी रुकी हुयी है...

कागज़ के उस मुड़े-तुड़े पन्ने पर
याद तुम्हारी रुकी हुयी है....

न तुमसे मोहब्बत है,
न ही कोई गिला रहा अब,
फिर भी न जाने क्यूँ
नमी तुम्हारे नाम की अब भी
मेरी आखों में रुकी हुयी है....

कुछ दरका, कुछ टूटा जैसे 
दिल का जैसे सुकून गया था,
माज़ी की उस मैली चादर पे
खुशबू उस शाम की अब भी
इन साँसो पे रुकी हुयी है...

जलाए कितने पन्ने
अपनी कहानियों के लेकिन,
वो कसक तेरे अब न होने की,
कितनी नज़मों मे रुकी हुयी है...

कागज़ के उस मुड़े-तुड़े पन्ने पर
याद तुम्हारी रुकी हुयी है....


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