Saturday, June 25, 2011

थके हुए बादल...

कल अभिषेक भाई की एक कविता पढ़ी, एकदम निर्मल बारिश के रंगों से सरोबर..बस उसे पढ़कर कुछ टूटी-फूटी मैंने भी लिख डाली....



कुछ थके-हारे बादल मैं भी लाया हूँ,

यूँ ही चलते चलते हथेली पर गिर गए थे...
उन्हें यादों का बिछौना सजा कर दे दिया है

थोडा आराम कर लेंगे...
हर साल ये यूँ ही आते हैं झाँकने को,
तुम्हारी हर खिलखिलाहट के साथ बरसना
शायद इन्हें भी अच्छा लगता था..
अब तो जैसे ये यादें
टूटे पत्तों की तरह हो गयी हैं,
जिन्हें बारिश की कोई चाह नहीं...
शायद इन बादलों को भी
दिल का हाल मालूम है...
तुम्हारा आना अब मुमकिन नहीं
तभी मैं सोचा करता हूँ....
ये बारिश आखिर मेरे कमरे में क्यूँ नहीं होती ...

Sunday, June 19, 2011

पापा, हो सके तो मुझे माफ़ कर दीजियेगा....

             आज फादर्स डे है, कितनी अजीब बात है सारी चीजों के लिए हम महज एक दिन मुक़र्रर कर देते हैं.. उस दिन उन्हें याद कर लिया और बस... सुबह से कई फेसबुक स्टेटस, फोटो टैग्स, और कईं ब्लॉग पोस्ट देखी सभी अपने अपने पिता को याद कर रहे हैं, सब एक दूसरे को हैप्पी फादर्स डे कह रहे हैं कोई खुश है किसी की आँखें नम हैं...क्या ये याद सिर्फ आज के दिन ही आती है... और याद आने पर हम करते ही क्या हैं, थोडा सोचते हैं और दो बूँद आंसू बहा लिए और फिर निकल पड़े अपने कॉलेज, दफ्तर की तरफ... कितने कमजोर हो गए हैं हम, ज़िन्दगी में आगे निकलने की होड़ में उन्हें ही पीछे छोड़ते जा रहे हैं जिनके कारण हमारा वजूद है... कुछ लोग इसे प्रैक्टिकल होना कहते हैं तो कुछ लोग मजबूरी का नाम देकर अपनी जिम्मेदारियों से बचते दिखाई देते हैं | मैं भी तो उसी श्रेणी में हूँ...मजबूर...
             मेरे हर नाज़ुक दौर पर पापा हमेशा मेरे साथ रहे, कभी मुझे कमजोर नहीं पड़ने दिया, मुझे इस दुनिया में जीने और लड़ने के काबिल बनाया.... आज भी जब घर फोन करता हूँ, उनका हाल समाचार पूछता हूँ तो, वो बस यही कहते हैं " हम तो ठीक्के हैं, तुम सुनाओ नौकरी कैसी चल रही है, तबियत ठीक है न, कोई परेशानी तो नहीं..." फिर सारा समय मेरे बारे में ही बातें होती रहती हैं... पापा ने कभी ये नहीं कहा कि वो कैसे हैं उनकी तबियत ठीक है या नहीं, लेकिन आज भी उनकी आँखों में कहीं न कहीं ये उम्मीद ज़रूर दिखती है कि मैं उनके पास ही रहूँ हमेशा, मैंने कोशिश भी तो कि लेकिन ये कमबख्त ज़िन्दगी भी न, न जाने कितने पाप करवाती जाती है |आज जब वो बूढ़े हो चले हैं, बीमार रहते हैं, मैं चाह कर भी उनके पास नहीं हूँ... इस पाप का बोझ हर पल और भारी होता जा रहा है, शायद खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाऊंगा, एक आत्मग्लानि सी मन को खाए जा रही है...
               मैं अपने पापा को कभी मिस नहीं करता बस मन ही मन उनसे माफ़ी मांगता रहता हूँ... पापाजी, हो सके तो मुझे माफ़ कर दीजियेगा...
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बहुत पहले एक कविता लिखी थी....         

                       तुम कहाँ हो....

तुम शायद भूल गए वो पल,
जब उन नन्हे हाथों से
मेरी ऊँगली पकड़कर तुमने चलना सीखा था,
अपने पहले लड़खड़ाते कदम मेरी तरफ बढ़ाये थे.....
तुम शायद भूल गए...
जब मैं तुम्हारे लिए घोडा बना करता था
तुम्हारी हर बेतुकी बातें सुना करता था,
परियों कि कहानियां सुनते सुनते
मेरी गोद में सर रख कर न जाने तुम कब सो जाते थे,
जब मेरे बाज़ार से आते ही
पापा कहकर मुझसे लिपट जाते थे,
अपने लिए ढेर सारे खिलोनों कि जिद किया करते थे.
तुम शायद भूल गए...
जब दिवाली के पटाखों से डरकर मेरी गोद में चढ़ जाया करते थे,
जब मेरे कंधे पर सवारी करने को मुझे मनाते थे,
जब दिनभर हुई बातें बतलाया करते थे...
आज जब शायद तुम बड़े हो गए हो,
ज़िन्दगी कि दौड़ में कहीं खो गए हो,
आज जब मैं अकेला हूँ,
वृद्ध हूँ, लाचार हूँ,
मेरे हाथ तुम्हारी उँगलियों को ढूंढ़ते हैं,
लेकिन तुम नहीं हो शायद,
दिल आज भी घबराता है,
कहीं तुम किसी उलझन में तो नहीं ,
तुम ठीक तो हो न ....              

Tuesday, June 14, 2011

आईये सैर करें -१

            पिछले दिनों ऑफिस के काम के सिलसिले में करीब 25 दिनों की दक्षिण भारत की यात्रा पर था | ये अपने आप में एक अनोखा अनुभव था... कभी सोचा नहीं था कि इतने कम समय में इतनी जगह जा पाऊंगा, भले ही वहां ज्यादा घूमने का मौका न मिला हो लेकिन वहां के लोग. रहन सहन, संस्कृति और नयी जगहों को जानने का मौका मिला... तो इसी सफ़र पर आपको भी अपने साथ ले जाने के लिए हाज़िर हूँ... ज्यादातर समय अकेला ही रहा इसलिए ज्यादा तस्वीरें तो नहीं हैं मेरी, लेकिन अनुभव मेरे अपने हैं... 
             आज बात करते हैं केरल में बसे त्रिवेंद्रम से करीब ८५ किलोमीटर दूर एक छोटे से शहर कोल्लम की |
कोल्लम रेलवे स्टेशन 

               25 मई को सुबह करीब ११ बजे कोल्लम पहुंचा | गर्मी इतनी ज्यादा कि पूछिए मत, और उसपर से रहने के लिए होटल भी ढूंढना था, उस कड़ी धूप में आधे घंटे की कड़ी मेहनत के बाद पसीने से तरबतर होकर आखिरकार एक होटल मिल ही गया |
   
                  अब बारी थी पेट पूजा की, पास में ही एक होटल में खाना खाया, [खाना ऐसा कि केवल औपचारिकता ही निभा सका] और आस पास की जगहों के बारे में पता किया | पता चला कि एक किलोमीटर दूर ही कोल्लम बीच है, शाम को जाने का प्रोग्राम बना लिया | कमरे में करने को कुछ था नहीं तो घोड़े बेच दिए...
                   करीब ५ बजे शाम में निकल पड़ा समुन्दर की लहरों का मज़ा लेने | समुद्र हमेशा से ही मुझे आकर्षित करता आया है, इसकी विशालता और इसकी तेज लहरें मुझे रोमांचित कर देती हैं | कितना कुछ समेटे हुए है ये अपने अन्दर... खैर, लोगों से पूछते पूछते पहुँच गया बीच पर | बीच के पास में ही एक विशालकाय मूर्ति बनी थी |
                 ज्यादा भीड़ नहीं थी, अधिकतर लोग बीच के पास ही बने पार्क में स्नैक्स के साथ समुद्र की ठंडी हवा का मज़ा ले रहे थे, यहाँ बीच में नहाने की अनुमति नहीं थी क्यूंकि लहरें बहुत ही ज्यादा तेज और ऊंची थीं | कुछ लोग किनारे किनारे खड़े होकर अपने पैर भिंगो रहे थे, मैं भी उन्ही लोगों में शामिल हो गया |


                 काफी देर तक यूँ ही समुन्दर की ठंडी लहरों के मज़े लेता रहा, और फिर आठ बजे के करीब वापस निकल पड़ा अपने कमरे की तरफ...

Thursday, June 02, 2011

एक अकेला इस शहर में...

             पिछले कई दिनों से अधूरा सा कुछ ड्राफ्ट में पड़ा था, उसे वैसे का वैसे ही आपकी नज्र कर रहा हूं...
             दिल्ली, एक शहर जिसमें न जाने कितने सपने पलते हैं, न जाने कितने सपने हर रोज पसीने बन कर बह जाते हैं और न जाने कितने सपने भूखे पेट दम तोड़ देते हैं | कुछ सपनों का बस्ता काँधे पर लटकाए मैं भी दिल्ली आया हूँ, नया शहर, नयी नौकरी, नए लोग और बिलकुल अलग ही तरह का माहौल, दिलवालों की दिल्ली में असल में कितने दिलवाले बचे हैं ये तो नहीं पता लेकिन एक बात तय है कि यहाँ जिंदा रहने की कवायद में दिल से ज्यादा दिमाग से काम लेना पड़ता है....
             यहाँ रास्तों और गलियों में भटकना आसान है और अगर आपमें दम है तो उससे भी ज्यादा आसान है अपनी मंजिल पा जाना... हर सुबह एक नयी जंग के साथ शुरू होती है, और दिन उसी जद्दोजहद में बीत जाता है... यहाँ रातों में सन्नाटा नहीं पसरता, बल्कि रौशनी से नहाई हुयी सड़कों पर चहलपहल बनी रहती है.... यहाँ की ये भागदौड़ आपको और कुछ सोचने का समय भी नहीं देती, ऐसा लगता है जैसे ज़िन्दगी फास्ट फॉरवर्ड मोड में चल रही है .... कभी फुर्सत में ज़िन्दगी बीते लम्हों का हिसाब मांगती है तो हमारे पास कुछ भी तो नहीं होता... 
              यहाँ ज़िन्दगी हर रोज नए सपने दिखाती है, और वो अधूरे पुराने सपने न जाने किस कोने में खो से जाते हैं, जो कभी हमने बड़े प्यार से बोये थे... अब तक जितना भी इस शहर को जान पाया हूँ, यहाँ सबसे ज्यादा मुश्किल है अपनी पुरानी पहचान बनाये रखना... आसपास फैली ये इंसान रुपी मशीनों की भीड़ उस पहचान से बिलकुल परे है जिन्हें लेकर हम इस दुनिया में आये थे...

Saturday, April 23, 2011

कुछ यादें जो समय के साथ धुंधली हो चली हैं .....

          

             दिन और वक़्त तो याद नहीं लेकिन मैं बहुत छोटा था, एक बार जब पापा दाढ़ी बना रहे थे तो मेरा हाथ ब्लेड से कट गया था, पापा का वो परेशान चेहरा और माँ की वो नम आखें... जब तक मेरे चेहरे पर मुस्कराहट वापस नहीं आई थी तब तक उन्हें भी चैन नहीं आया था......
      
              पापा के कन्धों की वो सवारी, जब मैं अपने आपको सबसे लम्बा समझने लगता था.. जैसे कोई राजसिंहासन मिल गया हो... वो ख़ुशी जो अब शायद दुनिया की सबसे महंगी कार में बैठने पर भी न मिले...

              मैं कुछ ७-८ साल का रहा हूँगा, टीवी देख रहा था...मंझले भैया ने कहा टीवी क्या देख रहे हो चलो आज तुम्हें क्रिकेट खेलना सिखाता हूँ... उनका प्रयास मुझे टीवी से दूर करना था, टीवी से तो दूर हो गया लेकिन क्रिकेट का ऐसा चस्का लगा कि बस उन्ही का सिखाया हुआ खेलता आया हूँ...

              बचपन में अपने बड़े भैया से काफी करीब था, उनके साथ खेले हुए वो सारे खेल याद हैं, चाहे उनके पैरों पर झूलना हो या उन्हें गुदगुदी लगाकर भाग जाना... उन्हें गुदगुदी भी तो खूब लगती थी, या ये भी हो सकता है कि मुझे खुश करने के लिए ऐसा दिखावा करते होंगे... पर जो भी था ये खेल बहुत मजेदार था....

             
             
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